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Analysis : सीएम नीतीश का मास्टर प्लान! पहले राज्यसभा, फिर निशांत की एंट्री का ऐलान… एक तीर से साधे कई निशाने?

समाचार के ये खास

बिहार की नेतृत्व में एक नए अध्याय की शुरुआत होती दिख रही है. मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के पुत्र निशांत कुमार की अब सक्रिय नेतृत्व में एंट्री हो चुकी है. इस बात का ऐलान 6 फरवरी को ही हो गया. आज पार्टी के वरिष्‍ठ नेता संजय झा ने यह बात कह दी कि निशांत को किसी सदस्‍यता की जरूरत नहीं है. वो किसी दूसरी पार्टी में थे. अब समाचार है कि उनके लिए युवा नेताओं की एक खास टीम तैयार की जा रही है, जो नेतृत्वक गतिविधियों में उनका सहयोग करेगी.

निशांत की टीम में होंगे ये लोग

इस टीम में निशांत के करीबी मित्र रुहेल रंजन, शुभानंद मुकेश, कोमल सिंह और चेतन आनंद जैसे युवा नेता शामिल होंगे. खास बात ये है कि इस टीम में जो भी लोग हैं, उन सभी की लगभग एक जैसी ही पहचान है. ये सभी प्रभावशाली नेतृत्वक परिवारों से आते हैं और नेतृत्व में उनकी एंट्री भी पारिवारिक पृष्ठभूमि की वजह से ही आसान रही है.

नेतृत्वक परिवारों की बढ़ती पकड़

बिहार की नेतृत्व के लगभग डेढ़ दशक पर निगाह डाली जाए पिछले कुछ वर्षों में यह ट्रेंड रहा है कि बड़े नेताओं के बेटे-बेटियों को सीधे नेतृत्व में जगह मिल गई है. ऐसे में अब उन युवाओं के लिए नेतृत्व का रास्ता कठिन है, जो छात्र नेतृत्व या सामाजिक आंदोलनों से निकलकर प्रदेश की नेतृत्व में जगह बनाना चाहते हैं. यह रास्‍ता अब लगभग नामुमकिन सा हो गया है.

छात्र नेतृत्व से आने वाले नेताओं के लिए बंद रास्ते

बिहार की नेतृत्व में एक दौर वो भी था. जब नेता छात्र नेतृत्व और आंदोलन से निकल कर आते थे. बिहार के कॉलेजों से ऐसे कई छात्र नेता उभरे. जेपी आंदोलन ने भी बिहार को कई नेता दिए. एक वो भी दौर था. जब सामान्‍य घरों से निकला अनजान युवा भी धीरे धीरे प्रदेश की नेतृत्व में पहचान बना लेता था. लालू, नीतीश, सुशील मोदी, प्रेम चंद मिश्रा, शकील अहमद खान, विक्रम कुंवर जैसे नेताओं के रूप में ऐसे नेताओं की लंबी लिस्‍ट रही है.

मगर अब बदल चुका है माहौल

लेकिन बिहार की नेतृत्व का माहौल अब बदल चुका है. पटना विश्वविद्यालय में 2012 से दोबारा चुनाव शुरू हुए. मगर छात्र संघ चुनावों के बाद भी छात्र नेताओं को मुख्यधारा की नेतृत्व में जगह नहीं मिली. अब तक छात्र संघ के पदाधिकारी रहे युवा नेता किसी बड़े दल से चुनावी टिकट हासिल नहीं कर सके. हाल के दिनों में देखा जाए पिछले 15 -16 सालों में ऐसा नाम नहीं मिलेगा. जो छात्र नेतृत्व से इलेक्‍ट्रोरल पॉलिटिक्‍स का हिस्‍सा बना हो.

आसान नहीं टिकट की राह

नेतृत्वक दलों के टिकट पाने वालों की दौड़ अब सामान्‍य परिवार के बच्‍चे नहीं रहे. अब आपको अक्सर वही लोग आगे दिखेंगे, जो बड़े नेतृत्वक परिवारों से आते हैं या जिनके पास आर्थिक और प्रशासनिक ताकत का मजबूत बैकअप है. कई बार बड़े अधिकारी या कारोबारी भी नौकरी छोड़कर नेतृत्व में आते हैं, बावजूद इसके उन्हें भी लंबे समय तक इंतजार करना पड़ता है. इसके उदाहरण भी मौजूद है. आरसीपी सिंह, मनीष वर्मा, आनंद मिश्रा जैसे उदाहरण सामने हैं. टिकट पाने की इच्‍छा में पूर्व डीजीपी गुप्‍तेश्‍वर पांडे बाबा बन गए. मगर उन्‍हें टिकट नहीं मिला. कुछ को लंबा इंतजार करना पड़ा.

निशांत की इंट्री के लिए रचा गया चक्रव्‍यूह?

हालांकि नेतृत्वक विश्लेषकों का ये भी आकलन है कि बिहार की नेतृत्व में अभी जो हो रहा है वह सीएम नीतीश की इच्‍छा के अनुसार ही हो रहा है. ये बात बिहार की नेतृत्व पर निगाह रखने वाले नहीं मान रहे बल्कि खुद पार्टी के वरिष्‍ठ नेता भी कह रहे हैं. पार्टी के वरिष्‍ठ नेताओं का कहना है कि नीतीश राज्‍यसभा जाएंगे. मगर राज्‍यसभा जाकर भी केवल संसदीय काम के लिए दिल्‍ली जाएंगे. नीतीश बिहार में ही रहेंगे और पार्टी का काम देखेंगे. ऐसे में ये अंदाजा लगाया जा रहा है कि बिहार की नेतृत्व में अभी जो भी घटना क्रम हो रहा है वह नीतीश कुमार की नेतृत्व का हिस्‍सा है. बेटे निशांत कुमार की बिहार की नेतृत्व में इंट्री के लिए सेफ जोन तैयार करना और पार्टी की कमान उनके हाथ में सौंपने की रणनीति चाल! ऐसे सवाल उठना लाजमी है.

वंशवाद का आरोप लगाए बिना निशांत की इंट्री फिक्‍स!

नेतृत्वक गलियारे में इस बात की भी चर्चा है कि नीतीश कुमार के राज्‍यसभा जाने के फैसले और निशांत की कार्यकर्ताओं की मांग पर बिहार की नेतृत्व में इंट्री से सीएम नीतीश कुमार की मजबूत समाजवादी नेता की छवि बरकरार रहेगी और सीएम नीतीश जेडीयू को भी अपने हिसाब से चला सकेंगे. यदि सीएम नीतीश राज्‍यसभा जाए बिना ही निशांत को पार्टी में शामिल कराते तो उन पर भी लालू यादव की तरह परिवारवाद का दाग लगता. जो सीएम के बिहार के विकास पुरुष के विशाल व्‍यक्त्वि को बौना कर देता. अब निशांत की भावनात्‍मक और राजनैतिक इंट्री आसान हो जाएगी. इस एंट्री बाद यह सवाल और तेज हो सकता है कि क्या बिहार की नेतृत्व में वंशवाद की पकड़ और मजबूत हो रही है?

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विनोद झा
संपादक नया विचार

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