Iran War Crisis : पूरे विश्व की नजर 10 अप्रैल की शांतिवार्ता पर टिकी है, पूरा विश्व यह चाहता है कि ईरान, अमेरिका और इजरायल के बीच जारी जंग समाप्त हो जाए, ताकि वैश्विक ऊर्जा संकट का समाधान हो जाए. शांतिवार्ता, युद्ध रोकने की दिशा में अहम कूटनीतिक पहल है, लेकिन बड़ा सवाल यह है कि यह वार्ता युद्ध रोकने की दिशा में कारगर कदम साबित होगी या फिर यह वार्ता फिसड्डी साबित होगी?
सीजफायर की शर्तों पर है विवाद
ईरान युद्ध में दो हफ्ते का सीजफायर तो हुआ है, लेकिन इसकी शर्तें ऐसी है, जिसे लेकर विवाद बना हुआ है. अमेरिका यह चाहता है कि ईरान पूरी तरह से यूरेनियम की गुणवत्ता बढ़ाने और उसे जमा करने पर रोक लगाए, जबकि ईरान का कहना है कि एक स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में यह उसका अधिकार है, क्योंकि उसे अपने देश की रक्षा भी करनी है. यह एक ऐसा मुद्दा है, जिसे लेकर दोनों पक्ष आमने सामने हैं. अयातुल्ला खामेनेई के 40वें के अवसर पर ईरान की परमाणु एजेंसी के प्रमुख मोहम्मद इस्लामी ने कहा कि यूरेनियम संवर्धन के तेहरान के अधिकार की रक्षा करना अमेरिका के साथ किसी भी युद्धविराम वार्ता के लिए बहुत जरूरी है. यह मुद्दा केवल तकनीकी नहीं, बल्कि नेतृत्वक और वैचारिक भी है. अमेरिका इसे विश्व की सुरक्षा में बाधा मानता है और ईरान के परमाणु कार्यक्रमों को रोकना चाहता है. इन हालात में दोनों पक्ष को अपने रुख में लचीलापन लाना होगा.
शांति की राह में बाधा है लेबनान पर हमला
शांतिवार्ता से ठीक पहले लेबनान पर इजरायल का हमला और उसकी बढ़ती सैन्य गतिविधियां वार्ता की सफलता पर सवालिया निशान खड़े करती हैं. यदि जमीनी स्तर पर हमले जारी रहते हैं, तो कूटनीतिक बातचीत का असर कमजोर पड़ेगा. लेबनान, जहां पहले से ही नेतृत्वक और आर्थिक संकट गहरा है, इस युद्ध का क्षेत्र बनता जा रहा है. इससे यह स्पष्ट होता है कि युद्ध केवल ईरान और अमेरिका के बीच सीमित नहीं है, बल्कि इसमें कई क्षेत्रीय शक्तियां भी शामिल हैं.
अगर शांतिवार्ता सफल नहीं हुई, तो क्या होगा?
ईरान युद्ध को रोकने के लिए जो शांति वार्ता आयोजित की गई है, अगर वह सफल नहीं होती है, तो इसका विश्व पर गहरा प्रभाव दिखेगा. शांतिवार्ता के असफल होने का सबसे बड़ा प्रभाव विश्व पर यह पड़ेगा कि ऊर्जा संकट बढ़ेगा. युद्ध जारी रहा, तो ईरान होर्मुज स्ट्रेट से जहाजों का आना-जाना बंद कर सकता है और तेल के उत्पादन पर भी असर होगा.
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