पलामू से शिवेंद्र कुमार की रिपोर्ट
Palamu lac Cultivation From Palash Tree : पलामू का मनातू प्रखंड कभी अति नक्सल प्रभावित क्षेत्र रहा था. लेकिन अब यहां की तस्वीर बदल रही है. इलाके के लोग वन समिति का गठन कर पलाश के पेड़ों पर लाह उत्पादन के जरिये लाखों की कमाई कर रहे हैं. विभाग ने वन समिति का गठन किया. विभाग के देखरेख में यहां बड़े पैमाने पर लाह की खेती शुरू की गयी है. वर्तमान में वन समिति द्वारा सेवती के जंगलों में पलाश के 300 पेड़ों पर लाह की खेती की जा रही है. इससे समिति प्रत्येक वर्ष लगभग 12 लाख रुपये की आमदनी हो रही है.
पेड़ काटने पर 200 रुपया जुर्माना, सूचना देने वाले को 100 रुपया
मनातू के जंगलों में पेड़ों को बचाने के लिए वन विभाग के द्वारा वन समिति का गठन किया गया है. वनों की सुरक्षा के लिए समिति ने बेहद कड़े नियम बनाये हैं. इस क्षेत्र में यदि कोई भी व्यक्ति पेड़ काटते हुए पकड़ा जाता है, तो उससे प्रति पेड़ 200 रुपया जुर्माना के रूप में वसूला जाता है. जंगलों की अवैध कटाई रोकने के लिए ग्रामीणों की भागीदारी भी तय की गयी है. जो भी व्यक्ति पेड़ काटने की सूचना समिति को देता है, उसे वन समिति की ओर से 100 रुपया इनाम के रूप में दिया जाता है. उल्लंघन पर आजीवन प्रतिबंधआम लोगों के साथ-साथ वन समिति के पदाधिकारियों और सदस्यों के लिए भी कड़े अनुशासन के नियम बनाये गये हैं. यदि वन समिति का कोई सदस्य खुद पेड़ काटते हुए पकड़ा जाता है, तो उसके खिलाफ दोगुनी सख्ती बरती जाती है. ऐसे सदस्यों पर न सिर्फ आर्थिक जुर्माना लगाया जाता है, बल्कि उन्हें तुरंत वन समिति की सदस्यता से बाहर कर दिया जाता है. इसके साथ ही, उन पर आजीवन वन समिति का सदस्य बनने पर पूरी तरह रोक लगा दी जाती है.
साल में दो बार होती है लाह की खेती
वन समिति के अध्यक्ष सुरेंद्र पासवान ने बताया कि सेवती, सरईडीह और सिकनी क्षेत्र में काफी संख्या में पलाश के पेड़ हैं, जहां लाह की खेती हो रही है. उन्होंने बताया कि साल में दो बार लाह की फसल ली जाती है. फरवरी में पेड़ों की टहनियों की छंटाई होती है. इसके बाद मार्च में पेड़ों पर लाह का बीज चढ़ाया जाता है, जो अक्टूबर में तैयार हो जाता है. दूसरी बार नवंबर में बीज चढ़ाया जाता है और फरवरी महीने में लाह निकाली जाती है.
एक पेड़ से 10 किलो उत्पादन, बाजार में अच्छी मांग
अध्यक्ष के अनुसार, एक पेड़ से करीब 10 किग्रा लाह तैयार होता है, जिसे बाजार में 200 रुपए प्रति केजी की दर से बेचा जाता है. इस प्रकार 300 पेड़ों से एक साल में लगभग छह हजार केजी लाह का उत्पादन होता है, जिससे करीब 12 लाख की आमदनी होती है. अगले वर्ष से बैर के पेड़ों पर होगी रंगीन लाह की खेतीसमिति ने अपनी योजनाओं का विस्तार करते हुए बताया कि अगले वर्ष से बैर के पेड़ में भी लाह की खेती की जायेगी. बैर के पेड़ से दो तरह का उत्पादन होता है – एक रंगीन लाह व दूसरा साधारण लाह. रंगीन लाह की बाजार में काफी ऊंची कीमत मिलती है. यह बाजार में डेढ़ से दो हजार रुपए प्रति किग्रा तक बिकता है. जंगल में लगाए जा रहे औषधीय व छायादार पौधेवन समिति सिर्फ कमाई ही नहीं, बल्कि जंगलों को समृद्ध करने में भी जुटी है. समिति द्वारा बीज से आंवला, इमली, पीपल, बरगद, जामुन, महुआ, बांस और जंगल जलेबी के पौधे तैयार किए जा रहे हैं. बरसात शुरू होते ही इन पौधों को जंगल की खाली जमीनों पर लगाया जाएगा.
lपलामू: कभी नक्सल प्रभावित रहा मनातू अब लाह की खेती से नई पहचान बना रहा है. 300 पलाश के पेड़ों पर लाह उत्पादन से ग्रामीणों को हर साल करीब 12 लाख रुपये की आमदनी हो रही है. वन समिति की पहल से जंगल भी बच रहे हैं और रोजगार भी बढ़ रहा है.#Palamu #PrabhatKhabarJharkhand pic.twitter.com/scgDiRnG4p
— Naya Vichar Jharkhand (@jharkhand_pk) July 6, 2026
लोगों को प्रेरित करने से जंगल बचेगा और रोजगार मिलेगा : डीएफओ
मेदिनीनगर वन प्रमंडल पदाधिकारी सत्यम कुमार ने बताया कि सुदूर इलाके के लोगों को जंगल बचाने के प्रति जागरूक करना होगा, तभी जंगल बच पाएगा. मनातू जैसे अति नक्सल प्रभावित क्षेत्र के जंगली इलाकों में रहने वाले लोगों को प्रेरित किया गया. इससे जंगल भी बच रहा है और लोगों को रोजगार भी मिल रहा है. लाह का उत्पादन शुरू कराया गया है. लोगों को अच्छी मुनाफा भी हो रहा है. लोगों को रोजगार के लिए बाहर नहीं जाना पड़ेगा.
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