Narasimha Avatar Story: क्या आप जानते हैं किस युग में भगवान विष्णु को आधे मनुष्य और आधे सिंह के रूप में प्रकट होना पड़ा? हिरण्यकश्यप किस ऋषि का पुत्र था और दिन-रात, जमीन-आसमान में न मरने का वरदान किसने दिया था? पढ़िए भगवान विष्णु के अंश नरसिंह अवतार की पौराणिक कथा.
किस युग में हुआ था नरसिंह अवतार?
श्रीमद्भागवत महापुराण और पौराणिक कथा के अनुसार, सतयुग में भगवान विष्णु के चार अवतार हुए. नरसिंह, भगवान विष्णु के 10 प्रमुख अंशावतारों में से एक है. भगवान विष्णु ने इस अवतार में राक्षस हिरण्यकश्यप का वध किया. विष्णु पुराण के अनुसार, सतयुग में राजा दक्ष की पुत्री दिति की कोख से हिरण्यकश्यप का जन्म हुआ था. उनके पिता महर्षि कश्यप 7 ऋषियों (वसिष्ठ, कश्यप, अत्रि, जमदग्नि, गौतम, विश्वामित्र और ऋषि भरद्वाज) में एक थे.
पहाड़ से फेंके जाने पर प्रहलाद को किसने बताया
पौराणिक कथा के अनुसार, हिरण्यकश्यप का बेटा प्रहलाद भगवान विष्णु का परम (सबसे बड़ा) भक्त था. उसके पिता नहीं चाहते थे कि प्रहलाद भगवान विष्णु की भक्ति करे. पिता के मना करने के बावजूद भी प्रहलाद हमेशा भगवान विष्णु की भक्ति में लगा रहता था. प्रहलाद भगवान विष्णु की भक्ति न करे, इसके लिए उसके पिता ने उसे पहाड़ से गिरा दिया. रास्ते में भगवान विष्णु ने अदृश्य शक्ति से भक्त प्रहलाद के लिए फूलों का बिस्तर बना दिया, जिससे उसे एक खरोंच भी नहीं आई. वह भगवान विष्णु नाम का नाम जपते हुए सुरक्षित धरती पर पहुंच गया.
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धधकती आग में कैसे सुरक्षित बचे प्रहलाद
जब हिरण्यकश्यप को पता चला कि उसका बेटा प्रहलाद सुरक्षित है, तो उसने उसे मारने का दूसरा तरीका निकाला. हिरण्यकश्यप ने अपनी बहन होलिका को आदेश किया कि वह प्रहलाद को गोद में लेकर जलती आग में बैठ जाए. श्रीमद्भागवत महापुराण 7वें स्कंध में वर्णित कथा के अनुसार, ब्रह्मा जी ने होलिका को विशेष वस्त्र (चादरनुमा) दिया, जिसे ओढ़ने के बाद वह आग में जल नहीं सकती थी.
होलिका ने अपने भाई के कहने पर उस चादर को ओढ़ लिया. इसके बाद प्रहलाद को अपनी गोद में लेकर धधकती हुई आग में बैठ गई. भक्त प्रहलाद भीषण आग में भी भगवान विष्णु के नाम का जाप करता रहा. इस बीच हवा का एक झोंका आया, जिससे होलिका की चादर प्रहलाद के शरीर से पलट गई. इस तरह भगवान विष्णु की कृपा से प्रहलाद दूसरी बार भी जिंदा रहा.
खंभे से कैसे हुआ नरसिंह अवतार
प्रहलाद को जिंदा देख हिरण्यकश्यप क्रोधित हो उठा और उसे खंभे में बांधकर पूछा- “बताओ तुम्हारे भगवान कहां हैं?” तब प्रहलाद ने कहा हर जगह. फिर हिरण्यकश्यप ने पूछा क्या खंभे में भी? इस प्रश्न के जवाब में प्रहलाद ने कहा- “हां, इसमें भी उनका वास है.” हिरण्यकश्यप ने ताने मारते हुए प्रहलाद से बोला अगर तुम्हारा भगवान इस खंभे में है, तो दिखता क्यों नहीं. इसके बाद हिरण्यकश्यप ने जैसे ही प्रहलाद को मारने के लिए खंभे पर वार किया, तो भगवान विष्णु नरसिंह रूप में प्रकट हुए. विष्णु अंश ‘नरसिंह’ इस अवतार में आधे इंसान और आधे सिंह के रूप में प्रकट हुए.
हिरण्यकश्यप ने ब्रह्मा जी से कौन-कौन से वरदान मांगे थे
पौराणिक कथा के अनुसार, हिरण्यकश्यप ने तपस्या से प्रसन्न कर वरदान मांगा था कि उसको न तो कोई दिन में मार सके और न ही रात में. इसके अलावा उसको न तो कोई मनुष्य मारे और न ही पशु. हिरण्यकश्यप ने ब्रह्मा जी से यह भी वरदान मांग लिया था कि उसे न तो कोई जमीन पर मारे और न ही दिन या आसमान में और न अंदर मारे न बाहर.
कहा जाता है कि इसी वरदान के अहंकार में आकर उसने पहले इंद्र का राज छीना, फिर तीनों लोक में रहने वाले लोगों पर अत्याचार करने लगा. साथ ही, लोगों को कहने लगा कि वे भगवान की भक्ति न करके उसकी पूजा करें.
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