Sawan Barwal Story: हिमाचल प्रदेश के पहाड़ों से निकलकर एशियन गेम्स के पोडियम तक पहुंचने की सावन बरवाल की कहानी किसी फिल्मी कहानी से कम नहीं है. मंडी के जोगिंदरनगर के रहने वाले सावन ने पुरुषों की मैराथन में 2 घंटे 11 मिनट 36 सेकंड के समय के साथ सिल्वर मेडल जीता. इसके साथ ही उन्होंने अपना राष्ट्रीय रिकॉर्ड भी बेहतर किया और एशियन गेम्स में 44 साल से चला आ रहा हिंदुस्तानीय मैराथन का इंतजार खत्म कर दिया.
सावन की यह कामयाबी इसलिए भी खास है क्योंकि उनकी शुरुआत किसी आधुनिक ट्रैक या बड़े स्पोर्ट्स सेंटर से नहीं हुई थी. कार चलाकर परिवार चलाने वाले पिता के बेटे सावन ने पहाड़ों की ऊबड़-खाबड़ पगडंडियों पर दौड़ते हुए अपनी सहनशक्ति तैयार की. कभी सेना में भर्ती होने के लिए शुरू की गई दौड़ आज उन्हें एशियन गेम्स के पोडियम तक पहुंचा चुकी है.
44 साल बाद हिंदुस्तान को मिला मैराथन में पदक
एशियन गेम्स की पुरुष मैराथन में हिंदुस्तान को इससे पहले आखिरी पदक 1982 में मिला था. उस साल एच.के. सीताराम ने कांस्य पदक जीता था. अब 2026 में सावन बरवाल ने सिल्वर मेडल जीतकर इस लंबे इंतजार को खत्म कर दिया.
सावन से पहले एशियन गेम्स की पुरुष मैराथन में हिंदुस्तान के सभी पदक घरेलू जमीन पर आए थे. 1951 में छोटा सिंह ने गोल्ड और सूरत सिंह माथुर ने ब्रॉन्ज जीता था, जबकि 1982 में सीताराम ने कांस्य अपने नाम किया था. सावन अब विदेशी धरती पर एशियन गेम्स मैराथन में पदक जीतने वाले पहले हिंदुस्तानीय बन गए हैं.
शुरुआत से ही आगे रहे सावन
नागोया में हुई मैराथन में सावन ने शुरुआत से ही अपनी रफ्तार बनाए रखी. करीब 10 किलोमीटर के निशान पर उन्होंने बढ़त हासिल कर ली थी. रेस के आधे हिस्से तक भी हिंदुस्तानीय धावक आगे बने रहे.
जापान के धावकों की ओर से लगातार दबाव बनाया गया, लेकिन सावन ने अपनी गति को बनाए रखा. करीब 30 किलोमीटर के आसपास वह थोड़ी देर के लिए पीछे हुए, लेकिन उन्होंने जल्द ही वापसी की और 35 किलोमीटर के बाद फिर से बढ़त हासिल कर ली. हालांकि रेस के अंतिम हिस्से में जापान के इचिटाका यामाशिता ने निर्णायक बढ़त बना ली. यामाशिता ने 2:10:51 के समय के साथ गोल्ड जीता. सावन ने 2:11:36 के समय के साथ सिल्वर मेडल अपने नाम किया.
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सावन ने अपना ही नेशनल रिकॉर्ड तोड़ा
सावन के लिए यह सिर्फ एशियन गेम्स का मेडल नहीं था. उन्होंने रेस के दौरान 2:11:36 का समय निकालकर अपना ही हिंदुस्तानीय राष्ट्रीय रिकॉर्ड बेहतर किया. इससे पहले अप्रैल 2026 में रॉटरडैम मैराथन में सावन ने 2:11:58 का समय निकालकर शिवनाथ सिंह का करीब 48 साल पुराना हिंदुस्तानीय मैराथन रिकॉर्ड तोड़ा था.
एशियाई गेम्स में हिंदुस्तान के मैराथन मेडल विजेता
| वर्ष | खिलाड़ी | पदक | समय |
| 1951 | छोटा सिंह | गोल्ड | 2:42:58.6 |
| 1951 | सूरत सिंह माथुर | ब्रॉन्ज़ | 2:53:49.8 |
| 1982 | होसुर कुकप्पा सीताराम | ब्रॉन्ज़ | 2:25:07 |
| 2026 | सावन बरवाल | सिल्वर | 2:11:36 |
अप्रैल 2026 में सावन ने नीदरलैंड्स की रॉटरडैम मैराथन में हिस्सा लिया. यह उनकी पहली प्रतिस्पर्धी मैराथन थी. रॉटरडैम में भी उनका सफर आसान नहीं रहा था. रेस के अंतिम हिस्से में ठंड और थकान के कारण उनकी स्थिति बिगड़ गई थी. फिनिश लाइन के करीब वह गिर भी पड़े, लेकिन उन्होंने दौड़ जारी रखी और रिकॉर्ड अपने नाम किया. कुछ ही महीनों बाद उन्होंने अपने उसी रिकॉर्ड को और बेहतर कर दिया.
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मंडी के गांव से शुरू हुई सावन की कहानी
सावन बरवाल का जन्म हिमाचल प्रदेश के मंडी जिले के जोगिंदरनगर इलाके में हुआ. उनके पिता ड्राइवर थे और परिवार की आर्थिक स्थिति बहुत मजबूत नहीं थी. बचपन में सावन के पास बड़े शहरों जैसी स्पोर्ट्स सुविधाएं नहीं थीं. न सिंथेटिक ट्रैक और न ही आधुनिक ट्रेनिंग सेंटर. लेकिन उनके पास पहाड़ थे. ऊंची चढ़ाई, कठिन ढलान और पहाड़ी रास्ते ही सावन का रनिंग ट्रैक बन गए.
सेना में जाने के सपने ने बदली जिंदगी
सावन ने शुरुआत में एथलेटिक्स को करियर बनाने के लिए नहीं, बल्कि हिंदुस्तानीय सेना में भर्ती होने के लिए दौड़ना शुरू किया था. 2017 में सेना की भर्ती के दौरान उनकी दौड़ने की क्षमता ने अधिकारियों का ध्यान खींचा. इसके बाद उन्हें पुणे स्थित आर्मी स्पोर्ट्स इंस्टीट्यूट में ट्रेनिंग का मौका मिला.
2019 में वह हिंदुस्तानीय सेना की इंजीनियरिंग कोर में हवलदार के रूप में शामिल हुए. सेना में आने के बाद उनकी स्पोर्ट्स प्रतिभा को व्यवस्थित प्रशिक्षण और बेहतर दिशा मिली. यहीं से पहाड़ों पर खुद से तैयारी करने वाला यह धावक धीरे-धीरे राष्ट्रीय स्तर का एथलीट बनने लगा.
1500 मीटर से शुरू हुआ सफर, मैराथन तक पहुंचा
सावन ने अपने करियर की शुरुआत 1500 मीटर, 5000 मीटर और 10,000 मीटर जैसी ट्रैक स्पर्धाओं से की. राष्ट्रीय स्तर पर भी उन्होंने लंबी दूरी की ट्रैक रेस में अपनी पहचान बनाई. बाद में उन्हें मैराथन में हाथ आजमाने की सलाह मिली. इसके बाद उन्होंने 42.195 किलोमीटर की इस कठिन रेस को अपना लक्ष्य बना लिया.
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