Naya Vichar Special on Gandhi Jayanti: सत्य और अहिंसा के पुजारी महात्मा गांधी की जयंती हर वर्ष 2 अक्टूबर को मनायी जाती है. गांधी जी केवल हिंदुस्तान के स्वतंत्रता आंदोलन के नेता नहीं थे, बल्कि उनके विचारों और आंदोलनों का प्रभाव देश के अलग-अलग हिस्सों में देखने को मिला. झारखंड से भी उनका खास जुड़ाव रहा. आजादी की लड़ाई के दौरान महात्मा गांधी करीब 12 बार झारखंड पहुंचे. उन्होंने यहां के अलग-अलग इलाकों का दौरा किया, लोगों से संवाद किया और स्वतंत्रता आंदोलन को गति देने का प्रयास किया. झारखंड में पहले से मौजूद अंग्रेज विरोधी चेतना को गांधी जी के आंदोलनों ने नया आधार दिया.
झारखंड की धरती पर आंदोलन को मिली नयी ऊर्जा
झारखंड में अंग्रेजी शासन के खिलाफ संघर्ष गांधी जी के आने से पहले भी जारी था. यहां आदिवासी समाज और स्थानीय लोगों ने अलग-अलग समय में अंग्रेजी शासन, जमींदारी व्यवस्था और शोषण के खिलाफ संघर्ष किया था. गांधी जी ने इसी संघर्षशील जमीन पर सत्याग्रह, स्वदेशी, असहयोग और अहिंसा जैसे विचारों को मजबूत किया. उनके झारखंड दौरों ने स्वतंत्रता आंदोलन को गांवों और कस्बों तक पहुंचाने में भूमिका निभायी. इस लिहाज से कहा जा सकता है कि गांधी जी ने झारखंड की आजादी की लड़ाई को खाद और बीज देने का काम किया, जो आगे चलकर बड़े जनआंदोलन के रूप में सामने आया.
1917 में चंपारण आंदोलन के दौरान पहली बार रांची पहुंचे
महात्मा गांधी का झारखंड से महत्वपूर्ण जुड़ाव वर्ष 1917 में शुरू हुआ. चंपारण आंदोलन के सिलसिले में गांधी जी पहली बार 4 जून 1917 को रांची पहुंचे थे. 29 मई 1917 को उन्हें बिहार-ओडिशा के तत्कालीन लेफ्टिनेंट गवर्नर एडवर्ड अलबर्ट गेट से मिलने के लिए प्रशासनी पत्र मिला था. उस समय ऐसी आशंका भी जतायी जा रही थी कि गांधी जी को नजरबंद किया जा सकता है. उनकी पत्नी और छोटे पुत्र को भी रांची बुलाया गया था.
तीन दिन चली थी गवर्नर से बातचीत
4 जून 1917 को गांधी जी की मुलाकात एडवर्ड अलबर्ट गेट से हुई. चंपारण के किसानों की स्थिति और वहां चल रहे आंदोलन से जुड़े मुद्दों पर बातचीत हुई. यह वार्ता तीन दिनों तक चली. इसके बाद 7 जून को गांधी जी पटना लौट गये. इस दौरे ने रांची को राष्ट्रीय आंदोलन की गतिविधियों से जोड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी.
1917 में तीन बार और रांची आये बापू
चंपारण आंदोलन से जुड़े सिलसिले में गांधी जी इसके बाद भी रांची पहुंचे. 11 जुलाई 1917 को वे एक बैठक में शामिल होने रांची आये. 22 सितंबर 1917 को भी आंदोलन के सिलसिले में उनका रांची आगमन हुआ. इसके बाद 4 अक्टूबर 1917 को भी गांधी जी रांची में मौजूद थे. इस दौरान उन्होंने एडवर्ड अलबर्ट गेट को रांची से एक पत्र भी लिखा था. इन लगातार दौरों से साफ होता है कि उस समय रांची राष्ट्रीय आंदोलन से जुड़े महत्वपूर्ण विचार-विमर्श का केंद्र बन चुका था.
1920 में रांची में जलाई गयी विदेशी कपड़ों की होली
असहयोग आंदोलन के दौर में गांधी जी का झारखंड से रिश्ता और मजबूत हुआ. वर्ष 1920 में वे फिर रांची पहुंचे. उस समय वे भीमराज वंशीधर मोदी धर्मशाला में ठहरे थे. विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार के आह्वान के बीच इसी धर्मशाला के बाहर लंकाशायर और मैनचेस्टर के कपड़ों की होली जलायी गयी. स्वदेशी और विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार के गांधीवादी अभियान का यह प्रभाव रांची में भी देखने को मिला.
टाना भगतों से गांधी जी का हुआ विशेष जुड़ाव
झारखंड के टाना भगत समुदाय पर गांधी जी का विशेष प्रभाव पड़ा. टाना भगतों ने भी सत्य, अहिंसा, स्वदेशी और नशामुक्ति जैसे विचारों को अपने आंदोलन से जोड़ा. गांधी जी टाना भगतों के अनुशासन और उनकी जीवनशैली से प्रभावित थे. झारखंड में स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान टाना भगतों की सक्रियता ने गांधीवादी विचारों को ग्रामीण और आदिवासी समाज तक पहुंचाने में भूमिका निभायी.
1921 में पहली बार धनबाद पहुंचे
महात्मा गांधी 5 फरवरी 1921 को पहली बार धनबाद पहुंचे थे. समय की कमी के कारण वहां कोई बड़ा कार्यक्रम नहीं हो सका. हालांकि धनबाद और कोयलांचल क्षेत्र से उनका संपर्क आगे भी बना रहा. 12 जनवरी 1927 को उन्होंने दोबारा धनबाद का दौरा किया. इसके बाद 1934 में भी वे झरिया पहुंचे. झरिया दौरे के दौरान राष्ट्रीय विश्वविद्यालय कोष के लिए उन्हें 60 हजार रुपये की राशि दी गयी थी. इससे पता चलता है कि गांधी जी के आंदोलन के लिए झारखंड के औद्योगिक क्षेत्रों से भी आर्थिक सहयोग मिला.
1925 में चाईबासा और खूंटी पहुंचे गांधी
झारखंड के आदिवासी इलाकों से गांधी जी का संवाद भी उनके दौरों का महत्वपूर्ण हिस्सा रहा. 15 सितंबर 1925 को उन्होंने चाईबासा का दौरा किया. यहां वे हो आदिवासी समाज के लोगों से मिले. गांधी जी स्थानीय समाज की परंपराओं और जीवनशैली को करीब से समझना चाहते थे. चाईबासा से रांची लौटते समय उन्होंने खूंटी में मुंडा समाज के लोगों से भी बातचीत की. आदिवासी समाज की आत्मनिर्भरता और अपनी परंपराओं से जुड़े रहने की भावना ने उन्हें प्रभावित किया.
हजारीबाग में छात्रों को किया संबोधित
चाईबासा और खूंटी के बाद गांधी जी हजारीबाग भी पहुंचे. 18 सितंबर 1925 को उन्होंने संत कोलंबा कॉलेज में छात्रों को संबोधित किया. युवाओं के बीच राष्ट्रीय आंदोलन और देश की स्थिति को लेकर उन्होंने संवाद किया. उस समय विद्यार्थी और युवा स्वतंत्रता आंदोलन के महत्वपूर्ण आधार बन रहे थे. गांधी जी की यात्राओं का एक उद्देश्य युवाओं को राष्ट्रीय आंदोलन से जोड़ना भी था. वर्ष 1932 में भी उनका हजारीबाग आगमन हुआ था.
देवघर में मंदिर की परंपरा की तारीफ
वर्ष 1925 में गांधी जी देवघर भी पहुंचे. बाबाधाम की यात्रा के दौरान उन्होंने स्थानीय लोगों और मंदिर की परंपराओं को करीब से देखा. बाद में अपनी पत्रिका ‘यंग इंडिया’ में उन्होंने देवघर के पंडों और वहां की परंपरा की चर्चा की. उन्होंने विशेष रूप से इस बात की सराहना की कि अन्य कई मंदिरों के विपरीत यहां छुआछूत को लेकर अपेक्षाकृत अलग परंपरा थी और मंदिर सभी लोगों के लिए खुला था. गांधी जी सामाजिक बराबरी और छुआछूत के खिलाफ लगातार आवाज उठाते रहे थे.
देवघर के साथ मधुपुर और गिरिडीह भी पहुंचे
देवघर दौरे के दौरान गांधी जी ने मधुपुर का भी दौरा किया. उन्होंने स्थानीय टाउन हॉल का उद्घाटन किया था. 7 अक्टूबर 1925 को देवघर से खड़गडीहा जाते समय गांधी जी गिरिडीह भी पहुंचे. इस तरह उनके झारखंड दौरे केवल बड़े शहरों तक सीमित नहीं रहे, बल्कि उन्होंने रास्ते में आने वाले कस्बों और स्थानीय क्षेत्रों में भी लोगों से संपर्क किया.
गोमिया में संथाल समाज की आत्मनिर्भरता की तारीफ
वर्ष 1934 का छोटानागपुर दौरा गांधी जी की झारखंड यात्रा का महत्वपूर्ण अध्याय रहा. 28 अप्रैल 1934 को उन्होंने गोमिया में सभा की. उन्हें सुनने के लिए बड़ी संख्या में संथाल आदिवासी भी पहुंचे थे. गांधी जी ने संथाल समाज की जीवनशैली और आत्मनिर्भरता की सराहना की. उन्होंने लोगों के खुद सूत कातने और अपने पहनने के कपड़े स्वयं बुनने की आदत को अच्छी परंपरा बताया. गांधी जी के लिए स्वावलंबन स्वतंत्रता आंदोलन का महत्वपूर्ण आधार था.
1934 में देवघर में गांधी जी की कार पर हमला
1934 में गांधी जी दूसरी बार देवघर पहुंचे थे. इस दौरान जसीडीह में उनकी कार पर हमला किया गया. इस घटना में गांधी जी को चोट नहीं लगी और वे सुरक्षित बच गये. यह घटना उस दौर के नेतृत्वक और सामाजिक तनाव को भी सामने लाती है. इसके बाद उनके छोटानागपुर दौरे में गोमिया, कतरास, झरिया समेत कई स्थान शामिल रहे. गांधी जी लगातार सामाजिक सुधार और हरिजन सेवा से जुड़े कार्यक्रमों को भी आगे बढ़ा रहे थे.
रांची में निवारण आश्रम की रखी नींव
1934 के इसी दौरे में गांधी जी 29 अप्रैल को रांची पहुंचे. 3 मई को उन्होंने हरिजन इंडस्ट्रियल स्कूल की स्थापना की. इसी दौरान निवारण आश्रम की नींव भी रखी गयी. 2 और 3 मई को उन्होंने रांची के नेताओं के साथ सविनय अवज्ञा आंदोलन से जुड़े मुद्दों पर विचार-विमर्श किया. इसके बाद 4 मई को वे ओडिशा के लिए रवाना हो गये. रांची में उनके इस प्रवास ने सामाजिक सुधार और राष्ट्रीय आंदोलन के बीच संबंध को मजबूत किया.
1927 में डालटनगंज पहुंचे, पुस्तकालय भी देखा
11 जनवरी 1927 को गांधी जी डालटनगंज भी पहुंचे थे. वे काशी से रेलगाड़ी के माध्यम से यहां आये थे. स्थानीय लोगों ने उनके लिए 525 रुपये की राशि एकत्र कर उन्हें दी. डालटनगंज प्रवास के दौरान वे मारवाड़ी सार्वजनिक पुस्तकालय भी गये. गांधी जी शिक्षा और पढ़ने की संस्कृति को समाज में जागरूकता का महत्वपूर्ण माध्यम मानते थे. इस दौरे ने पलामू क्षेत्र को भी उनके राष्ट्रीय अभियान से जोड़ा.
धनबाद, कतरास और झरिया से भी बना संबंध
गांधी जी के झारखंड दौरों में कोयलांचल क्षेत्र का विशेष स्थान रहा. धनबाद के अलावा उन्होंने कतरास और झरिया का भी दौरा किया. औद्योगिक क्षेत्र होने के कारण यहां मजदूरों और प्रबंधन के बीच संबंध तथा श्रमिक सवाल महत्वपूर्ण थे. गांधी जी का मानना था कि संघर्षों का समाधान संवाद और अहिंसक तरीके से किया जाना चाहिए. झरिया और धनबाद के उनके दौरे इसी व्यापक दृष्टिकोण से जुड़े थे.
जमशेदपुर की तीन यात्राएं और मजदूरों का सवाल
जमशेदपुर से भी गांधी जी का गहरा संबंध रहा. वर्ष 1922 में टाटा प्रबंधन और मजदूरों की यूनियन के बीच हड़ताल को लेकर संबंध तनावपूर्ण हो गये थे. दीनबंधु एंड्रयूज के आग्रह पर गांधी जी जमशेदपुर पहुंचे और प्रबंधन तथा मजदूरों के बीच समझौता कराने की कोशिश की. इसके बाद उन्होंने 1934 और 1940 में भी जमशेदपुर की यात्रा की. इस तरह वे कुल तीन बार जमशेदपुर पहुंचे. औद्योगिक श्रमिकों के मुद्दों को लेकर उनकी भूमिका झारखंड के सामाजिक-नेतृत्वक इतिहास का महत्वपूर्ण हिस्सा रही.
1940 में रामगढ़ अधिवेशन में आखिरी बड़ा दौरा
वर्ष 1940 गांधी जी के झारखंड दौरे का अंतिम महत्वपूर्ण पड़ाव माना जाता है. मार्च 1940 में वे रामगढ़ में आयोजित कांग्रेस के 53वें वार्षिक अधिवेशन में शामिल होने पहुंचे. इससे पहले वे रांची आये और निवारण बाबू से मिलने निवारणपुर गये थे. रांची से लगभग 45 किलोमीटर दूर रामगढ़ में आयोजित कांग्रेस अधिवेशन राष्ट्रीय आंदोलन के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण था. इस अधिवेशन ने झारखंड को देश की राष्ट्रीय नेतृत्व के केंद्र में ला दिया.
रामगढ़ अधिवेशन में दूसरे विश्वयुद्ध को लेकर प्रस्ताव
रामगढ़ अधिवेशन में 20 मार्च 1940 को कांग्रेस ने दूसरे विश्वयुद्ध में हिंदुस्तान की भागीदारी के विरोध में प्रस्ताव पारित किया. उस समय ब्रिटिश प्रशासन ने हिंदुस्तान को हिंदुस्तानीय नेतृत्व की सहमति के बिना युद्ध में शामिल कर दिया था. कांग्रेस के भीतर इस फैसले को लेकर तीखा विरोध था. रामगढ़ अधिवेशन इसी नेतृत्वक परिस्थिति के बीच आयोजित हुआ. गांधी जी की मौजूदगी ने अधिवेशन के महत्व को और बढ़ाया.
गांधी जी की यात्राओं ने झारखंड को आंदोलन से जोड़ा
1917 में चंपारण आंदोलन के सिलसिले में रांची आने से लेकर 1940 के रामगढ़ अधिवेशन तक गांधी जी का झारखंड से लगातार संपर्क बना रहा. इस अवधि में उन्होंने रांची, जमशेदपुर, धनबाद, झरिया, देवघर, मधुपुर, गिरिडीह, हजारीबाग, चाईबासा, खूंटी, गोमिया, डालटनगंज, रामगढ़ समेत कई क्षेत्रों का दौरा किया. उन्होंने विद्यार्थियों, मजदूरों, आदिवासी समाज, व्यापारियों और आम लोगों से संवाद किया. उनके इन दौरों ने राष्ट्रीय आंदोलन को झारखंड के अलग-अलग सामाजिक समूहों से जोड़ने का काम किया.
आदिवासी परंपराओं और आत्मनिर्भरता से थे प्रभावित
गांधी जी ने झारखंड में केवल नेतृत्वक सभाएं नहीं कीं, बल्कि स्थानीय समाज को समझने का भी प्रयास किया. चाईबासा के हो समाज, खूंटी के मुंडाओं और गोमिया के संथालों के साथ उनका संवाद इसका उदाहरण है. उन्होंने स्थानीय समाज की आत्मनिर्भरता, अपनी मेहनत से कपड़ा तैयार करने और परंपराओं से जुड़े रहने की सराहना की. देवघर में मंदिर की परंपरा की चर्चा और आदिवासी समाज की जीवनशैली की प्रशंसा उनके झारखंड प्रवास के अलग-अलग पहलुओं को सामने लाती है.
झारखंड की धरती पर गांधी विचारों की मजबूत जमीन
महात्मा गांधी ने झारखंड में स्वतंत्रता आंदोलन के साथ सामाजिक सुधार, स्वदेशी, नशामुक्ति, छुआछूत के विरोध और आत्मनिर्भरता जैसे मुद्दों को भी आगे बढ़ाया. उनके विचारों को स्थानीय आंदोलनों और समुदायों से जुड़ने का अवसर मिला. टाना भगतों के आंदोलन से लेकर मजदूर संगठनों और विद्यार्थियों तक गांधीवादी विचारों की पहुंच बनी. यही वजह है कि झारखंड के स्वतंत्रता आंदोलन के इतिहास में गांधी जी की यात्राओं को केवल उनके आगमन और सभाओं की सूची के रूप में नहीं देखा जा सकता.
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12 दौरों की विरासत आज भी इतिहास का हिस्सा
1917 से 1940 के बीच गांधी जी के झारखंड के लगभग 12 दौरों ने यहां के स्वतंत्रता आंदोलन को राष्ट्रीय आंदोलन की मुख्यधारा से जोड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी. उन्होंने यहां के लोगों के संघर्ष को समझा और अपने संदेशों के माध्यम से आंदोलन को व्यापक आधार देने का प्रयास किया. झारखंड की धरती पर पहले से मौजूद अंग्रेज विरोधी चेतना को गांधीवादी आंदोलन से नया संदर्भ मिला. चंपारण से शुरू हुआ उनका झारखंड से जुड़ाव अंततः रामगढ़ के ऐतिहासिक कांग्रेस अधिवेशन तक पहुंचा. इस लंबी यात्रा में गांधी जी ने नेतृत्व के साथ समाज को बदलने के सवालों को भी बराबर महत्व दिया. यही झारखंड से उनके रिश्ते की सबसे बड़ी ऐतिहासिक पहचान है.
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