वांगचुक की भूख हड़ताल से बदल सकती है संसद की सियासत, क्या विपक्ष जोड़ पाएगा बिखरी कड़ियां?
Monsoon Session 2026 : पिछले एक दशक में हिंदुस्तानीय नेतृत्व में विपक्ष की भूमिका और उसकी एकजुटता को लेकर यदि आप किसी नेतृत्वक विश्लेषक से सवाल करेंगे, तो संभव है कि उनका जवाब सीधे शब्दों में न मिले. इसका सबसे बड़ा कारण ये है कि अखबारों की सुर्खियां और कागजी दस्तावेज भले ही विपक्षी गठबंधन के होने का सबूत देते हो, लेकिन राज्यों की नेतृत्व, चुनावी समीकरण, दलों के बीच बढ़ती दूरियां और नेताओं द्वारा एक-दूसरे पर लगाए जाने वाले आरोप,अक्सर इस एकजुटता पर सवाल उठाते हैं. ऐसे में 20 जुलाई (सोमवार) से शुरू हो रहे संसद के मानसून सत्र से पहले सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक की भूख हड़ताल और उसके बाद प्रशासन की कार्रवाई विपक्ष के लिए एक ऐसा मुद्दा लेकर आई है, जिस पर लगभग सभी विपक्षी दल सुर में सुर मिलाते नजर आ रहे हैं. कांग्रेस, तृणमूल कांग्रेस, समाजवादी पार्टी, आम आदमी पार्टी, शिवसेना (यूबीटी) और वाम दलों ने केंद्र प्रशासन पर लोकतांत्रिक आवाज को दबाने का आरोप लगाया है. जिसको लेकर नेतृत्वक विश्लेषकों का मानना है कि मानसून सत्र में यह मुद्दा विपक्ष की साझा रणनीति का अहम हिस्सा बन सकता है. हालांकि, सवाल यह भी है कि, क्या सोनम वांगचुक का मुद्दा संसद के भीतर विपक्ष को एक बार फिर एकजुट कर पाएगा? या पहले से बिखरी हुई विपक्षी एकता, बिखरी हुई ही नजर आएगी? इसे समझने के लिए चलते है एक दिन पीछे यानी कि शनिवार (18 जुलाई 2026) को. संसद के मानसून सत्र से पहले उठे इस सवाल की पूरी कहानी दरअसल बात ये है कि शिक्षा व्यवस्था में सुधार, पेपर लीक पर रोक और केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग…को लेकर सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक 28 जून से दिल्ली के जंतर-मंतर पर आमरण अनशन पर बैठे थे. 21 दिनों तक सबकुछ शांतिपूर्ण चल रहा था लेकिन प्रदर्शनकारियों को दिक्कत इस बात से थी कि प्रशासन उनकी सुन नहीं रही.लगातार भूखे रहने के कारण वांगचुक की तबीयत बिगड़ रही थी, प्रदर्शन स्थल से आने वाली तस्वीर उनकी हालात बयां कर रहा थी. सोशल मीडिया से लेकर हाईकोर्ट तक मामले को लेकर चर्चा हो रही थी. लोग वांगचुक से अनशन खत्म करने की अपील कर रहे थे, लेकिन उनका कहना था कि प्रशासन जब तक उनकी मांगें नहीं मान लेती, उनका भूख हड़ताल जारी रहेगा. इन सब के बीच सेलिब्रिटीज और दूसरे चर्चित चेहरों के साथ नेतृत्वक पार्टियों की गाड़ियां भी जंतर मंतर आंदोलन की तरफ मुड़ने लगी थी. आम आदमी पार्टी, कांग्रेस सहित कई विपक्षी दल तो वांगचुक का हाल लेने जंतर मंतर भी पहुंच गए. जिसके बाद शनिवार को दिल्ली हाईकोर्ट के निर्देश पर दिल्ली पुलिस वांगचुक को जंतर-मंतर से सफदरजंग अस्पताल ले आई, ताकि उनका इलाज किया जा सके. यहीं से यह मामला सिर्फ एक आंदोलन तक सीमित नहीं रहकर नेतृत्वक बहस का विषय बन गया. प्रशासन की कार्रवाई पर विपक्ष क्यों भड़का हुआ ये कि दिल्ली पुलिस के जवान शनिवार सुबह- सुबह जंतर- मंतर पहुंच गए और वांगचुक को उठाकर अस्पताल ले गए. पुलिस सादे लिबास में आई थी और सफेद पर्दे के पीछे वे वांगचुक को उठाकर ले गए. सोनम वांगचुक को अस्पताल ले जाने के कुछ ही घंटों के भीतर लगभग पूरा विपक्ष केंद्र प्रशासन पर हमलावर हो गया. कोई प्रशासन को तानाशाह बताने लगा तो कोई इसे प्रशासन की मनमानी बता रहा था. संसद के मानसून सत्र से इसका क्या लेना-देना है? आप सोच रहे होंगे कि सोनम वांगचुके के साथ जो कुछ और उसके बाद देश में जो कुछ चल है वो तो सबको मालूम है…इसमें नया क्या है ? और तो और संसद के मानसून सत्र से इसका क्या लेना-देना ? दरअसल, पूरी कहानी इसी पर टिकी है और यही इस कहानी का सबसे दिलचस्प हिस्सा है. सोमवार से संसद का मानसून सत्र शुरू हो रहा है और ऊपर हमने आपको ये भी बता दिया कि कैसे वांगचुक को लेकर प्रशासन की कार्रवाई सियासी मुद्दा बन गई है. जिस तरह बजट सत्र केे दौरान मजबूती से विपक्ष ने प्रशासन को जवाब दिया था, उसी एकजुटता की जरूरत फिर आन पड़ी है. आम आदमी पार्टी के सात राज्यसभा सांसदों ने पार्टी छोड़कर भाजपा का दामन थाम लिया तो तृणमूल कांग्रेस और कुछ अन्य दलों के सांसदों ने भी पाला बदला. बजट सत्र के बाद कैसे कमजोर हुआ विपक्ष परिस्थितियों पर अगर गौर करें तो बजट सत्र की एकता बदलते नेतृत्वक परिदृश्य में बदल गई थी. विपक्ष की नेतृत्वक एकजुटता कमजोर पड़ती दिखाई देने लगी थी और संख्या के लिहाज से भी उनकी ताकत कम हुई है. वैसे तो संसद में संख्या ही सर्वोपरि है लेकिन मौजूदा जो स्थिति है उसमें सिर्फ संख्या ही नहीं, नेतृत्वक एकजुटता भी कमजोर हुई. तमिलनाडु, पश्चिम बंगाल और दूसरे राज्यों के चुनाव नतीजों के बाद कांग्रेस, टीएमसी और डीएमके जैसे सहयोगी दलों के बीच मतभेद खुलकर सामने आए. जिस परिसीमन को लेकर प्रशासन को घेरा जा रहा था, उसको लेकर इरादे बदलने लगे और एक देश-एक चुनाव जैसे दूसरे मुद्दों पर भी विपक्षी दलों की राय अलग-अलग दिखाई देने लगी . जिसका मतलब था कि विपक्ष एकजुट नहीं है. यानी संसद सत्र शुरू होने से पहले विपक्ष के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही थी, क्या वह किसी एक मुद्दे पर एकजुट होकर प्रशासन को घेर पाएगा? सोनम वांगचुक का आंदोलन बन सकता है विपक्ष का कॉमन ग्राउंड अब इस सवाल को लेकर जो विश्लेषकों की राय है, वो फिलहाल सकारात्मक नजर आ रही है. जिसका कारण भी साफ है. दरअसल वांगचुक जिस मुद्दे को लेकर अनशन पर हैं, वो मुद्दा किसी एक राज्य, किसी एक जाति, किसी एक धर्म या किसी एक क्षेत्र से जुड़ा नहीं है. यह सीधे छात्रों, शिक्षा व्यवस्था, पेपर लीक और लोकतांत्रिक विरोध जैसे राष्ट्रीय मुद्दों से जुड़ा हुआ है और हर पार्टी इन मुद्दों को लेकर खुद को जनता का हितैषी मानती है. जिसको लेकर नेतृत्वक विश्लेषकों का मानना है कि यह मुद्दा विपक्ष के लिए साझा नेतृत्वक आधार बन सकता है. कांग्रेस हो या आम आदमी पार्टी…तृणमूल कांग्रेस हो या समाजवादी पार्टी… शिवसेना (यूबीटी), वाम दल या शरद पवार की एनसीपी…सभी ने प्रशासन की कार्रवाई पर सवाल उठाए. हां, शब्द अलग अलग जरूर है, लेकिन आरोप एक ही है. मामले को लेकर प्रशासन क्या

