पाकिस्तान में कैसे ‘जिहाद’ बना State Policy? General Zia ने 1979 में बदली रणनीति, तैयार हुआ ‘Proxy War’ का मॉडल
कभी-कभी इतिहास में कोई एक साल ऐसा आता है, जिसके असर को समझे बिना आने वाले दशकों की नेतृत्व समझना मुश्किल हो जाता है. पाकिस्तान के मामले में वह साल था- 1979 एक ही साल में तीन बड़े घटनाक्रम हुए- सोवियत संघ ने अफगानिस्तान में सैनिक भेजे. ईरान में इस्लामिक क्रांति हुई. मक्का की ग्रैंड मस्जिद पर हथियारबंद लोगों ने कब्जा कर लिया. इन तीनों घटनाओं का आपस में सीधा संबंध नहीं था. लेकिन इनका असर उस समय के मुस्लिम विश्व, शीत युद्ध (cold war) और दक्षिण एशिया की नेतृत्व पर पड़ा. खासकर अफगानिस्तान में सोवियत हस्तक्षेप ने पाकिस्तान को अमेरिका, सऊदी अरब और अफगान मुजाहिदीन के बीच एक महत्वपूर्ण रणनीतिक कड़ी बना दिया. यहीं से वह प्रक्रिया तेज हुई, जिसमें ‘जिहाद’ की धार्मिक अवधारणा को राज्य की सुरक्षा और विदेश नीति के उद्देश्यों से जोड़ने की कोशिश की गई. पाकिस्तान पर मेरी किताब पढ़ें यहां से 1979: जब अफगानिस्तान शीत युद्ध का नया मैदान बना दिसंबर 1979 के आखिर में सोवियत सैनिक अफगानिस्तान में दाखिल हुए. सोवियत नेतृत्व काबुल की कम्युनिस्ट प्रशासन को बचाए रखना चाहता था और उसे डर था कि अफगानिस्तान में चल रहा विद्रोह उसके लिए रणनीतिक खतरा बन सकता है. अमेरिकी विदेश विभाग के ऐतिहासिक रिकॉर्ड के अनुसार, सोवियत सेना ने दिसंबर के अंत में अफगानिस्तान में बड़े पैमाने पर प्रवेश किया और काबुल समेत महत्वपूर्ण इलाकों पर नियंत्रण स्थापित किया. अमेरिका के लिए यह सिर्फ अफगानिस्तान की कहानी नहीं थी. यह Cold War था. वॉशिंगटन के सामने सवाल था- क्या सोवियत संघ से सीधे भिड़ा जाए? या फिर- ऐसी ताकत तैयार की जाए जो अफगानिस्तान में सोवियत सेना को लगातार चुनौती देती रहे? अमेरिका ने दूसरा रास्ता चुना. यहीं से शुरू हुआ वह गुप्त अभियान, जिसे बाद में Operation Cyclone के नाम से जाना गया. अमेरिका का पैसा, पाकिस्तान की ISI और अफगान मुजाहिदीन यहां एक महत्वपूर्ण बात समझना जरूरी है. अमेरिका ने अफगानिस्तान में सीधे अपनी सेना उतारकर सोवियत संघ से युद्ध नहीं किया. उसने अफगान विद्रोहियों को समर्थन देने का रास्ता अपनाया. CIA के ऐतिहासिक दस्तावेज बताते हैं कि जुलाई 1979 में ही अमेरिकी प्रशासन ने अफगान विद्रोहियों के लिए गुप्त सहायता को मंजूरी दी थी- यानी सोवियत सेना के बड़े पैमाने पर प्रवेश से पहले ही. शुरुआती सहायता सीमित थी, लेकिन बाद में यह अभियान काफी बड़ा हुआ. और यहां पाकिस्तान की भूमिका महत्वपूर्ण हो गई. ISI यानी Inter-Services Intelligence अफगान लड़ाकों और बाहरी सहायता के बीच प्रमुख माध्यम बनी. सरल भाषा में समझें- अमेरिका → धन और हथियारों का समर्थन सऊदी अरब → आर्थिक और वैचारिक समर्थन पाकिस्तान/ISI → प्रशिक्षण, वितरण और नेटवर्किंग में प्रमुख भूमिका अफगान मुजाहिदीन → सोवियत सेना के खिलाफ लड़ाई इस व्यवस्था ने पाकिस्तान को अचानक ऐसी रणनीतिक अहमियत दे दी, जो 1979 से पहले उसके पास इस स्तर पर नहीं थी. पाकिस्तान को क्या मिला? सोवियत-अफगान युद्ध के दौरान पाकिस्तान सिर्फ एक पड़ोसी देश नहीं रहा. वह Cold War की एक frontline state बन गया. अफगान सीमा के पास प्रशिक्षण शिविर, शरणार्थी शिविर, हथियारों की आवाजाही और विभिन्न militant factions के बीच नेटवर्क विकसित होने लगे. दुनिया के अलग-अलग हिस्सों से स्वयंसेवक भी अफगान युद्ध में शामिल होने पहुंचे. यहीं एक नया बदलाव आया. स्थानीय युद्ध धीरे-धीरे अंतरराष्ट्रीय स्वरूप लेने लगा. धर्म, भू-नेतृत्व, पैसा, हथियार और anti-Soviet नेतृत्व एक ही संघर्ष में मिल गए. यही वह ecosystem था जिसने आगे चलकर transnational jihadist networks के लिए जमीन तैयार की. लेकिन क्या अमेरिका ने ‘अल-कायदा’ बनाई थी? यहां इतिहास को बहुत सरल बनाकर देखने से बचना जरूरी है. यह कहना सही नहीं होगा कि CIA ने सीधे अल-कायदा बनाई. अफगान जिहाद के दौरान विभिन्न देशों और संगठनों से आए लड़ाकों के अलग-अलग नेटवर्क बने. अल-कायदा का गठन 1988 के आसपास हुआ, जब सोवियत-अफगान युद्ध अपने अंतिम चरण में था. इसलिए ज्यादा सटीक बात यह है कि- अफगान जिहाद के लिए बनाया गया अंतरराष्ट्रीय militant ecosystem बाद में उन नेटवर्कों के लिए महत्वपूर्ण आधार बना, जिनमें अल-कायदा भी शामिल थी. यानी यह कहानी किसी एक संस्था की बनाई हुई योजना से ज्यादा कई नेटवर्कों, विचारधाराओं और राज्य-हितों के मिलन की कहानी है. मदरसों और विचारधारा की भूमिका युद्ध सिर्फ बंदूक से नहीं लड़ा जाता. उसके लिए कहानी और विचारधारा भी चाहिए. अफगान युद्ध के दौरान पाकिस्तान में धार्मिक संस्थानों और मदरसों की भूमिका बढ़ी. सऊदी अरब से आने वाली धार्मिक और आर्थिक सहायता ने भी इस प्रक्रिया को प्रभावित किया. Brookings के अनुसार, 1970 के दशक से पाकिस्तान के Ahl-e-Hadith और Deobandi मदरसों में सऊदी प्रभाव और निजी वित्तीय सहायता बढ़ी थी. अफगान मुजाहिदीन को प्रशिक्षित करने वाले कई मदरसे इसी व्यापक नेटवर्क से जुड़े थे. यहां एक और सावधानी जरूरी है. हर मदरसा militant training center नहीं था और न ही हर धार्मिक छात्र militant बना. लेकिन कुछ संस्थानों, संगठनों और militant networks के बीच जो संबंध विकसित हुए, उन्होंने पाकिस्तान-अफगानिस्तान क्षेत्र की नेतृत्व पर लंबे समय तक असर डाला. उधर ईरान में हो रही थी इस्लामिक क्रांति 1979 का दूसरा बड़ा घटनाक्रम था ईरानी क्रांति. अयातुल्लाह खुमैनी के नेतृत्व में ईरान में राजशाही समाप्त हुई और इस्लामिक रिपब्लिक की स्थापना हुई. इसका संदेश पूरे क्षेत्र के लिए महत्वपूर्ण था- धार्मिक विचारधारा सिर्फ सामाजिक या आध्यात्मिक शक्ति नहीं; वह नेतृत्वक सत्ता को भी चुनौती दे सकती है. हालांकि ईरान की क्रांति शिया नेतृत्वक आंदोलन की अपनी विशिष्ट ऐतिहासिक पृष्ठभूमि से निकली थी और इसे अफगान जिहाद या सुन्नी militant networks के साथ सीधे जोड़ना गलत होगा. लेकिन इसने पूरे पश्चिम एशिया और मुस्लिम दुनिया में धर्म और नेतृत्व के संबंध पर बहस को जरूर बदल दिया. और फिर मक्का की ग्रैंड मस्जिद पर हमला 20 नवंबर 1979 को हथियारबंद लोगों ने मक्का की ग्रैंड मस्जिद पर कब्जा कर लिया. यह घटना सऊदी शासन के लिए बेहद बड़ा झटका थी. सऊदी नेतृत्व को यह एहसास हुआ कि कट्टर धार्मिक विचारधारा केवल विदेश नीति का साधन नहीं है- वह खुद सत्ता के लिए चुनौती भी बन सकती है. इसके बाद सऊदी धार्मिक नीति और वैश्विक धार्मिक प्रभाव को लेकर कई बदलाव हुए. पाकिस्तान में धार्मिक संस्थानों को मिलने वाली सऊदी सहायता का इतिहास हालांकि 1979 से पहले का भी है और 1980 के दशक के अफगान जिहाद

