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DU: सीयूईटी के कारण डीयू में दाखिले की प्रक्रिया हुई है पारदर्शी

DU: दिल्ली विश्वविद्यालय(डीयू) देश के छात्रों के लिए पसंदीदा संस्थान है. हर साल डीयू में दाखिले के लिए लाखों छात्र आवेदन करते है. पहले कट ऑफ के आधार पर डीयू के कॉलेजों में दाखिला होता था. लेकिन सीयूईटी के जरिये दाखिला प्रक्रिया की केंद्रीकृत व्यवस्था अपनाने के बाद यह अधिक पारदर्शी और जवाबदेह हुई है. दिल्ली विश्वविद्यालय के कुलपति प्रोफेसर योगेश सिंह ने कहा कि सीयूईटी आने के बाद विश्वविद्यालय की दाखिला प्रक्रिया में सभी हितधारकों को हर सीट की स्थिति के बारे में पता होता है. डीयू सीएसएएस एडमिशन सिस्टम में हर सीट आवंटन को सार्वजनिक किया जाता है और इसके लिए वैज्ञानिक तरीका अपनाया जाता है. कुलपति ने कहा कि कम से कम राउंड में सीटों के बेहतर आवंटन के लिए कॉलेजों को अपनी सीट मैट्रिक्स पर फिर से विचार करने की सलाह दी गयी है. 

डीयू के कुछ कॉलेजों में स्नातक प्रोग्रामों में खाली सीटों को लेकर कहा कि इसकी वजह सीयूईटी नहीं है. सीयूईटी से पहले जब डीयू में दाखिला 12वीं कक्षा में मिले अंकों के आधार पर होता था, तब भी कुछ सीटें खाली रह जाती थीं. उन्होंने वर्ष 2018, 2019 (सीयूईटी से पहले/कोविड से पहले) और वर्ष 2024, 2025 (कोविड के बाद) के दाखिले को आंकड़ों के साथ बताया कि वर्ष 2019 में मेरिट आधारित दाखिलों के समय डीयू में स्नातक की कुल उपलब्ध 70735 सीटों में से 68213 ही भर सकी थी और और 3.56 फीसदी सीटें खाली रह गयी थी. इस बार वर्ष 2025 में सीयूईटी आधारित दाखिलों के समय कुल उपलब्ध 71642 सीटों के मुकाबले 72229 दाखिला हुआ और इसमें  प्रकार 0.65 फीसदी की वृद्धि हुई है. 

कोर्स कांबिनेशन में बदलाव के लिए कॉलेज भेज सकते हैं प्रस्ताव 

हाल में दिनों में देखा गया है कि कई कोर्स में दाखिला लेने वाले छात्रों की संख्या काफी कम हुई है. ऐसे में डीयू प्रशासन ने सभी कॉलेज को ऐसे कोर्स को बेहतर बनाने के लिए कोर्स कांबिनेशन में बदलाव के लिए प्रस्ताव भेजने को कहा है. डीयू प्रशासन की कोशिश छात्रों के हिसाब से कोर्स का संचालन करना है. कुलपति ने कहा कि सीयूईटी से पहले दाखिलों को अनिश्चित कट-ऑफ के कारण नियंत्रित नहीं किया जा सकता था. कई ऐसे भी मामले सामने आए जहां 11 सीटों की क्षमता पर 203 छात्रों को दाखिला दिया गया और यह तय सीटों से 1745 फीसदी अधिक था. नए सिस्टम से अब अधिक और कम दाखिलों की समस्या नियंत्रित और प्रबंधित की जा सकती है. 

अब कॉलेज तय करते हैं कि वे हर कोर्स में कितनी अतिरिक्त सीटें देना चाहते हैं. यह डेटा सिस्टमैटिक प्रोसेस के लिए एल्गोरिदम में डाला जाता है. उन्होंने कहा कि आगामी शैक्षणिक सत्र को लेकर सभी कॉलेजों को यह सलाह भी दी गई है कि वे अपनी सीट मैट्रिक्स पर फिर से विचार करें और कई राउंड के आवंटन के बाद भी खाली रह गई सीटों को भरने के लिए प्रस्ताव दें. जहां तक, कॉलेज यदि अपने बीए प्रोग्राम कॉम्बिनेशन में बदलाव की संभावनाएं देखते हैं, तो डीयू यह साफ कर चुका है कि कोई भी कोर्स बंद नहीं होगा, सिर्फ कोर्स कांबिनेशन में बदलाव होगा. इसका मकसद छात्रों के हित को सुरक्षित रखना है.

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विनोद झा
संपादक नया विचार

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