झारखंड हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए कहा है कि किसी भी कर्मचारी को मात्र इस कारण से सेवा से पृथक करना कि उसने अपने संवैधानिक अधिकारों की रक्षा हेतु न्यायालय का दरवाजा खटखटाया, पूर्णतः मनमाना, दुर्भावनापूर्ण एवं विधि-विरुद्ध है. हाईकोर्ट के जस्टिस दीपक रोशन की पीठ ने रिट याचिका धरो उरांव एवं अन्य की ओर से दायर याचिका में यह महत्वपूर्ण निर्णय पारित करते हुए स्पष्ट किया कि “किसी नागरिक को अपने संवैधानिक अधिकारों की सुरक्षा हेतु न्यायालय की शरण में जाने के कारण किसी भी प्रकार के प्रतिकूल परिणाम भुगतने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता. न्यायालय जाने का अधिकार स्वयं में एक संवैधानिक अधिकार है तथा इस अधिकार के प्रयोग के प्रतिशोध में की गई कोई भी कार्यवाही विधि के शासन की जड़ पर प्रहार करती है.”
क्या था मामला?
याचिकाकर्ताओं की ओर से अधिवक्ता अमृतांश वत्स ने अदालत में पक्ष रखा. याचिकाकर्तागण को वर्ष 2004-2005 से स्वास्थ्य, चिकित्सा शिक्षा एवं परिवार कल्याण विभाग, राज्य प्रशासन की अभियंत्रण कोषांग में लिपिक, टाइपिस्ट, चालक, पंप ऑपरेटर आदि पदों पर संविदा के आधार पर नियुक्त किया गया था. वर्ष 2016 में विभाग के विलय के पश्चात इन कर्मचारियों को जनवरी 2017 तक नियमित रूप से कार्य करने दिया गया, किंतु तत्पश्चात बिना किसी औपचारिक आदेश अथवा कारण बताओ नोटिस के उन्हें सेवा से पृथक कर दिया गया. पूर्व में समन्वय पीठ द्वारा चार फरवरी 2017 को याचिकाकर्ताओं की सेवा नियमित करने का आदेश पारित किया गया था, जिसे राज्य द्वारा अपील याचिका दायर कर चुनौती दी गयी, परंतु वह भी 25,000 रुपये के हर्जाने के साथ खारिज कर दी गई. इसके बावजूद विभाग द्वारा दिनांक 14 अगस्त 2024 के आदेश से याचिकाकर्ताओं के सेवा नियमितीकरण के दावे को अस्वीकृत कर दिया गया.
कोर्ट का महत्वपूर्ण अभिनिर्धारण
जस्टिस दीपक रोशन की पीठ ने पाया कि याचिकाकर्ता 10 वर्षों से अधिक समय तक बिना किसी अवकाश अथवा शिकायत के स्वीकृत पदों पर कार्यरत रहे तथा उनकी नियुक्ति सक्षम प्राधिकारी द्वारा अनुमोदित थी. पीठ ने राज्य के इस तर्क को अस्वीकार कर दिया कि याचिकाकर्ता स्वीकृत पदों पर नियुक्त नहीं थे. सुप्रीम कोर्ट के जग्गो बनाम हिंदुस्तान संघ जैसे नजीरी निर्णयों का उल्लेख करते हुए पीठ ने कहा कि जहां कार्य की प्रकृति सतत एवं संस्थान के लिए अपरिहार्य हो, वहां मात्र “संविदा” अथवा “अस्थायी” के नामकरण मात्र से नियुक्ति को अनियमित घोषित नहीं किया जा सकता.
कोर्ट का निष्कर्ष एवं आदेश
जस्टिस रोशन ने यह भी टिप्पणी की कि “राज्य एवं उसकी अभिकरणों द्वारा वादियों को उनके संवैधानिक उपचारों के प्रयोग मात्र के लिए दंडित करने की प्रथा तत्काल समाप्त होनी चाहिए.” पीठ ने दिनांक 14 अगस्त 2024 के प्रशासन के तर्कयुक्त आदेशों को रद्द कर दिया. राज्य प्रशासन को निर्देश दिया कि याचिकाकर्ताओं को समस्त परिणामी लाभों के साथ छह सप्ताह के भीतर सेवा में पुनर्स्थापित कर नियमितीकरण का औपचारिक आदेश जारी किया जाये.
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