रांची : झारखंड में कैसर अस्पताल मरीजों से दवाइयों के नाम पर मनमाना पैसा वसूल कर रहे हैं. दवा कंपनियों से अस्पतालों को कैंसर की दवाइयां 900 से 1,050 रुपये (वास्तविक कीमत) में मिल जाती हैं. लेकिन इसके बाद वही दवाइयां मरीजों को 9,000 रुपये (एमआरपी) पर दी जाती हैं.
यानी कि वास्तविक कीमत से छह से 10 गुना ज्यादा पैसा कैसर मरीजों के परिजनों से भुगतान करावा जाता है. अस्पतालों और डॉक्टरों को मुनाफा पहुंचाने के लिए कंपनियों के बीच सांठगांठ रहती है. इस स्पोर्ट्स में आम लोग पिस रहे हैं.
नया विचार ने की अस्पतालों की पड़ताल
मामले की तह तक जाने के लिए नया विचार संवाददाता ने कैंसर अस्पतालों में पहुंच कर पड़ताल की. वहां पर दवाइयां उपलब्ध कराने पर अस्पताल राजी तो हुए, लेकिन डॉक्टर की पर्ची मांगने लगे. जब सिर्फ दवाइयों को दिखाने का आग्रह किया गया, तो अस्पतालों द्वारा दवाइयां उपलब्ध करायी गयीं.
इसके बाद कीमतों की जानकारी मिली. फिर कैंसर दवाओं के स्टॉकिस्ट के पास जाकर अस्पतालों को उपलब्ध करानेवाली कीमतों का पता लगाया गया, तो छह से 10 गुना ज्यादा पैसा वसूले जाने की जानकारी मिली. नया विचार के पास इससे संबंधित दस्तावेज मौजूद हैं.
बोले रोगी के परिजन : लोग दवाइयां खरीद कर बन रहे कर्जदार
रांची के कांके रोड स्थित एक कैंसर रोगी के परिजन ने बताया कि कैंसर का पता चलने के बाद परिवार पर आर्थिक बोझ बढ़ जाता है. इंश्योरेंस कंपनियां भी पीछा छुड़ाने लगती है. लोग दवाइयां खरीद कर ही कर्जदार हो जाते हैं. हम तो थोड़े सक्षम हैं, तो अभी तक चल रहा है. कीमत में बहुत मार्जिन है, लेकिन अस्पताल कुछ भी नहीं छोड़ते हैं. जांच से लेकर इलाज तक की प्रक्रिया में परिवार बिक जाता है.
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बोले जिम्मेदार
हिंदुस्तान प्रशासन के राष्ट्रीय औषध मूल्य निर्धारण प्राधिकरण (NPPA) में निदेशक अमर हिंदुस्तानी बताते हैं कि वर्ष 2019 में 45 कैसर की दवाओं को शेड्यूल दवाओं की श्रेणी में लाया गया था, लेकिन एक साल बाद ही कंपनियों ने ब्रांड का नाम बदलकर दवाइया बनानी शुरू कर दी. इससे एनपीपीए में आने की अधिसूचना बेकार हो गयी. 81% नॉन-शेड्यूल दवाओं पर प्रशासन का नियंत्रण नहीं है, हमारे नियंत्रण में सिर्फ 19% दवाइयां ही है.
एमआरपी से अधिक नहीं लेते, इसलिए बच जा रहे अस्पताल
अस्पताल एमआरपी से अधिक कीमत नहीं वसूलते हैं, इसलिए वह नेशनल फार्मास्युटिकल प्राइसिंग अथॉरिटी के दायरे में नहीं आते हैं. ऐसे में राज्य औषधि निदेशालय इन पर कार्रवाई नहीं करता है.
औषधि निदेशालय को पूरी जानकारी, पर नियम के बाहर अधिकार
दवाइयां ड्रग प्राइस कंट्रोल ऑर्डर (डीपीसीओ) में आती हैं. पहली शिड्यूल दवाइयां (ड्रग्स एंड कॉस्मेटिक्स एक्ट 1945), दूसरी नॉन शिड्यूल दवाइयां (दवाइयों की वार्षिक कीमत 10% से अधिक नहीं बढ़नी चाहिए), तीसरी नयी दवाइयां (निर्माता कंपनी को चार साल का एकाधिपत्य रहरता है) जिसे चार साल के बाद दूसरी कंपनी बना सकती है. औषधि निरीक्षक सिर्फ इसी नियम के तहत काम करते हैं.
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