जोहार. आज 27 जुलाई है.
दिल्ली का जंतर-मंतर…
हिंदुस्तान की नेतृत्व का शायद सबसे छोटा, लेकिन सबसे असरदार मंच.
यहां न संसद है, न चुनाव आयोग.
न कोई मुख्यमंत्री बैठता है, न प्रधानमंत्री.
लेकिन कई बार यहीं से ऐसी नेतृत्वक कहानी शुरू होती है, जो चुनावी नतीजों तक पहुंच जाती है.
हालिया छात्र आंदोलन और जंतर-मंतर का प्रदर्शन भी सिर्फ एक विरोध प्रदर्शन नहीं था. अगर इसे ध्यान से देखें, तो इस एक मंच ने तीन अलग-अलग नेतृत्वक दलों को तीन अलग-अलग तरह की पहचान दी.
और सबसे दिलचस्प बात यह है कि सबसे ज्यादा सवाल उसी पार्टी के सामने खड़े हुए, जो आज देश की सबसे ताकतवर नेतृत्वक ताकत है.
कहानी शुरू करते हैं सबसे छोटे खिलाड़ी से.
CJP… एक नया नेतृत्वक प्रयोग?
जंतर-मंतर के मंच पर जिस संगठन की सबसे ज्यादा चर्चा हुई, वह था CJP.
पहली नजर में यह एक छात्र या नागरिक संगठन लगता है. लेकिन नेतृत्व में केवल नाम नहीं, नेटवर्क भी मायने रखते हैं.
CJP से जुड़े कई प्रमुख चेहरे पहले आम आदमी पार्टी (AAP) के साथ काम कर चुके हैं. इसलिए नेतृत्वक गलियारों में इसे सिर्फ एक सामाजिक संगठन नहीं, बल्कि एक संभावित पॉलिटिकल स्टार्टअप के रूप में भी देखा जा रहा है.
क्यों?
क्योंकि आम आदमी पार्टी आज राष्ट्रीय स्तर पर कठिन दौर से गुजर रही है. दिल्ली की सत्ता जा चुकी है. कई बड़े नेता अलग हो चुके हैं. ऐसे समय में पंजाब ही उसका सबसे बड़ा नेतृत्वक आधार बचा है.
ऐसे में यदि कोई नया मंच, नई भाषा और नए चेहरे युवाओं के बीच नेतृत्वक संवाद बनाए रखते हैं, तो इससे पार्टी की विचारधारा और सामाजिक मौजूदगी बनी रह सकती है.
यह जरूरी नहीं कि हर नेतृत्वक प्रयोग चुनाव लड़ने के लिए ही बनाया जाए.
कई बार ऐसे मंच केवल विचार, नेटवर्क और जनसमर्थन को जीवित रखने का काम करते हैं.
और हिंदुस्तानीय नेतृत्व में यह कोई नया मॉडल नहीं है.
कई बड़े आंदोलन पहले सामाजिक मंच के रूप में शुरू हुए और बाद में उन्होंने नेतृत्वक दलों या नेताओं को नई ऊर्जा दी.
इसलिए CJP की सबसे बड़ी उपलब्धि शायद यही रही कि उसने खुद को राष्ट्रीय चर्चा में ला खड़ा किया.
राहुल गांधी… विरोध से नेतृत्व तक
अब आते हैं कांग्रेस पर.
राहुल गांधी लंबे समय तक हिंदुस्तानीय नेतृत्व में ऐसे नेता माने जाते रहे, जिन पर विपक्ष का नेतृत्व करने की क्षमता को लेकर सवाल उठते रहे.
लेकिन जंतर-मंतर के इस आंदोलन में उनकी भूमिका अलग दिखाई दी.
उन्होंने केवल ट्वीट नहीं किया.
वे मंच पर पहुंचे.
छात्रों के बीच बैठे (छात्रों की गूंज, देहरादून में).
उनकी बातें सुनीं.
और प्रशासन पर सीधा नेतृत्वक हमला बोला.
यह केवल एक कार्यक्रम में शामिल होना नहीं था.
यह संदेश था कि कांग्रेस अब केवल संसद के भीतर विपक्ष नहीं रहना चाहती, बल्कि सड़क की नेतृत्व में भी अपनी जगह वापस बनाना चाहती है.
यहां इतिहास की एक दिलचस्प झलक भी दिखाई देती है.
1977 में जब इंदिरा गांधी सत्ता से बाहर हुईं और जनता पार्टी की प्रशासन बनी, तब कांग्रेस पूरी तरह बिखर चुकी थी.
उसी दौर में संजय गांधी ने लगातार संगठन, सड़क और कार्यकर्ताओं के बीच सक्रिय रहकर कांग्रेस को दोबारा खड़ा करने की कोशिश की.
आज परिस्थितियां अलग हैं.
समय बदल चुका है.
लेकिन सड़क पर उतरकर नेतृत्वक संदेश देने की रणनीति कहीं न कहीं उसी परंपरा की याद दिलाती है.
राहुल गांधी ने इस प्रदर्शन के जरिए अपने समर्थकों को यह संदेश दिया कि वे केवल चुनावी भाषण देने वाले नेता नहीं, बल्कि विरोध की नेतृत्व में भी सबसे आगे खड़े हो सकते हैं.
इससे उनकी छवि एक ऐसे नेता की बनती है, जो विपक्ष का सबसे बड़ा चेहरा हैं…
और फिलहाल विपक्ष के भीतर ऐसा कोई दूसरा राष्ट्रीय नेता दिखाई भी नहीं देता, जिसकी मौजूदगी पूरे देश में इतनी व्यापक चर्चा पैदा कर सके.
सबसे कठिन सवाल: बीजेपी
अब आते हैं सबसे महत्वपूर्ण हिस्से पर.
पहली नजर में लग सकता है कि विरोध प्रदर्शन विपक्ष को फायदा पहुंचाते हैं.
लेकिन असली सवाल यह है कि नुकसान किसे होता है?
यहां कहानी सीधे बीजेपी तक पहुंचती है.
पिछले एक दशक में बीजेपी ने केवल संगठन नहीं बनाया.
उसने अपनी नेतृत्व का सबसे बड़ा केंद्र प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की व्यक्तिगत लोकप्रियता को बनाया.
आज बीजेपी का चुनावी अभियान हो…
प्रशासनी योजनाओं का प्रचार हो…
विदेश नीति हो…
या सोशल मीडिया…
हर जगह सबसे प्रमुख चेहरा नरेंद्र मोदी ही होते हैं.
इस मॉडल का सबसे बड़ा फायदा यह है कि एक मजबूत नेता पूरी पार्टी को चुनाव जिता सकता है.
लेकिन इसी मॉडल की सबसे बड़ी कमजोरी भी यही होती है.
अगर नेता की छवि पर सवाल उठते हैं, तो उसका असर पूरी पार्टी पर पड़ सकता है.
हिंदुस्तानीय नेतृत्व इसका उदाहरण पहले भी देख चुकी है.
इंदिरा गांधी का दौर इसका सबसे बड़ा उदाहरण माना जाता है.
जब तक उनकी लोकप्रियता अपने चरम पर रही, कांग्रेस लगभग अजेय दिखाई देती थी.
लेकिन जब आपातकाल के बाद उनकी छवि पर गंभीर सवाल उठे, तो उसी कांग्रेस को ऐतिहासिक हार का सामना करना पड़ा.
हर दौर अलग होता है.
हर परिस्थिति अलग होती है.
इसलिए दोनों घटनाओं की सीधी तुलना करना उचित नहीं होगा.
लेकिन व्यक्तित्व-केंद्रित नेतृत्व का सिद्धांत दोनों मामलों में समझा जा सकता है.
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क्या Gen Z नेतृत्व बदल सकती है?
यह शायद आने वाले चुनावों का सबसे बड़ा सवाल होगा.
हर नई पीढ़ी अपने साथ नई नेतृत्वक भाषा लेकर आती है.
आज का युवा अपने दोस्तों, कॉलेज, सोशल मीडिया और ऑनलाइन समुदायों से भी नेतृत्वक राय बनाता है.
साथियों की चर्चा, ट्रेंडिंग वीडियो और डिजिटल माहौल उसकी सोच को प्रभावित कर सकते हैं.
हालांकि केवल सोशल मीडिया से चुनावी नतीजे तय नहीं होते.
हिंदुस्तान जैसे विशाल लोकतंत्र में जाति, स्थानीय नेतृत्व, संगठन, उम्मीदवार, कल्याणकारी योजनाएं, क्षेत्रीय मुद्दे और बूथ प्रबंधन जैसे कई कारक भी निर्णायक भूमिका निभाते हैं.
फिर भी यह मानना कठिन होगा कि डिजिटल पीढ़ी का असर अब नेतृत्व में महत्वहीन है.
नेतृत्वक दल भी अब इसे समझ चुके हैं.
जंतर-मंतर का असली संदेश
इस प्रदर्शन की सबसे बड़ी कहानी शायद यह नहीं है कि वहां कितनी भीड़ थी.
या किसने सबसे अच्छा भाषण दिया.
असल कहानी यह है कि एक ही मंच से तीन अलग-अलग नेतृत्वक संदेश निकले.
CJP ने खुद को राष्ट्रीय बहस में जगह दिलाने की कोशिश की.
कांग्रेस ने राहुल गांधी के जरिए विपक्षी नेतृत्व का दावा मजबूत करने का प्रयास किया.
और बीजेपी के सामने यह चुनौती फिर सामने आई कि व्यक्तित्व-केंद्रित नेतृत्व में नेता की लोकप्रियता जितनी बड़ी ताकत होती है, उसकी सार्वजनिक छवि उतनी ही महत्वपूर्ण नेतृत्वक पूंजी भी बन जाती है.
जंतर-मंतर का यह मंच छोटा जरूर है.
लेकिन हिंदुस्तानीय नेतृत्व बार-बार दिखा चुकी है कि कई बार इतिहास की सबसे बड़ी बहसें सबसे छोटे मंचों से शुरू होती हैं.
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