सोमवार को मुख्य चुनाव आयुक्त (ECE) ज्ञानेश कुमार के खिलाफ दाखिल याचिका पर सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट की एक टिप्पणी ने इस पूरे मामले को और गंभीर बना दिया है. दरअसल, मामले की सुनवाई के दौरान चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया सूर्यकांत ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने फॉर्म-6 में किए गए किसी भी बदलाव को मंजूरी नहीं दी है, और अदालत चुनाव आयोग के रिकॉर्ड देखकर यह भी जानना चाहती है कि फॉर्म-6 में बदलाव आखिर किसके फैसले से किया गया.
कोर्ट की इस टिप्पणी के बाद विपक्ष ने चुनाव आयोग पर सवाल उठाए हैं. कांग्रेस ज्ञानेश कुमार पर झूठ बोलने का आरोप लगाते हुए कहा कि CEC ने खुद जानबूझकर फॉर्म 6 में बदलाव किया ताकि जेन Z वोटरों का नाम हटाए जा सके. वहीं कॉकरोच जनता पार्टी ने भी मामले को लेकर ज्ञानेश कुमार पर निशाना साधा है.
अब सवाल है कि फॉर्म-6 क्या है? इसमें ऐसा क्या जोड़ा गया, जिस पर सुप्रीम कोर्ट ने सवाल उठाया है? आसान भाषा में समझते हैं.
फॉर्म-6 क्या है?
- फॉर्म-6 वह आवेदन है जिसके जरिए कोई पात्र हिंदुस्तानीय नागरिक मतदाता सूची में पहली बार अपना नाम जुड़वाने के लिए आवेदन करता है.
- आसान भाषा में कहें तो अगर कोई व्यक्ति 18 साल की उम्र पूर कर चुका है और वोटर बनना चाहता है, तो वह फॉर्म-6 भरकर नए वोटर के लिए रजिस्ट्रेशन करा सकता है.
फॉर्म-6 को लेकर क्या है विवाद
- फॉर्म-6 को लेकर विवाद स्पेशल इंटेंसिव रिविजन(SIR) के दौरान जोड़े गए एक अतिरिक्त डिक्लेरेशन को लेकर है.
- फॉर्म-6 भरने वाले नए वोटर से यह जानकारी मांगी गई कि उसका नाम या उसके माता-पिता अथवा दादा-दादी का नाम पिछली बार हुई SIR वाली मतदाता सूची में दर्ज था या नहीं.
- चुनाव आयोग का कहना है कि फॉर्म-6 में कोई बदलाव नहीं किया गया, बल्कि SIR की जरूरत के हिसाब से उसके साथ एक अतिरिक्त डिक्लेरेशन जोड़ा गया. जानकारी के लिए बता दें आयोग के पोर्टल पर भी फॉर्म-6 और SIR डिक्लेरेशन को अलग-अलग दिखाया गया है. इसी अतिरिक्त जानकारी को लेकर विपक्ष चुनाव आयोग से सवाल कर रहा.
- सुप्रीम कोर्ट में दायर याचिका में भी याचिकाकर्ताओं ने सवाल उठाया कि अगर यह सिर्फ अतिरिक्त घोषणा थी, तो इसे लागू करने का कानूनी और प्रशासनिक फैसला किसने लिया और किस प्रक्रिया के तहत लिया?
सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को अपने फैसले में क्या कहा?
- सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को CEC ज्ञानेश कुमार के खिलाफ दायर याचिका पर सुनवाई के बाद मुख्य चुनाव आयुक्त को निलंबित करने का अंतरिम आदेश देने से इनकार कर दिया. हालांकि कोर्ट ने चुनाव आयोग से उन पर लगे आरोपों पर जवाब मांगा है.
- सुनवाई के दौरान वरिष्ठ वकील मेनका गुरुस्वामी ने अदालत के सामने फॉर्म-6 में जोड़ी गई नई शर्तों का मुद्दा उठाया. इस पर सीजेआई सूर्यकांत ने साफ किया कि अदालत ने किसी बदले हुए फॉर्म-6 को मंजूरी नहीं दी है.
- सीजेआई ने यह भी कहा कि जब यह रिकॉर्ड अदालत के सामने आएंगे, तब वह देखना चाहेंगे कि फॉर्म-6 में बदलाव किसने किया और अगर फैसले बिना सहमति के लिए पाए गए, तो उन्हें रद्द कर दिया जाएगा.
- मामले में सुप्रीम कोर्ट केंद्र प्रशासन, चुनाव आयोग, CEC ज्ञानेश कुमार, चुनाव आयुक्त डॉ. सुखबीर सिंह संधू और डॉ. विवेक जोशी, डिप्टी इलेक्शन कमिश्नर मनीष गर्ग और DG (IT) सीमा खन्ना को नोटिस जारी कर 4 हफ्ते में जवाब मांगा है.
- जानकारी के लिए बता दें कि 24 सितंबर को जारी एक प्रेस नोट में चुनाव आयोग ने कहा था कि एसआईआर के दौरान फॉर्म-6 के साथ जोड़ा गया डिक्लेरेशन सुप्रीम कोर्ट की मंजूरी के बाद इस्तेमाल किया गया था.
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क्या गलत तरीके से हो रहा है SIR
- यहां यह सवाल आता है कि क्या सुप्रीम कोर्ट ने एसआईआर को गलत ठहरा दिया है? तो इसका जवाब है नहीं. यह अंतर समझना बहुत जरूरी है.
- दरअसल, 27 मई 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने बिहार में चुनाव आयोग द्वारा कराए जा रहे SIR प्रक्रिया को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर फैसला सुनाया था.
- अदालत ने बिहार में किए गए SIR को वैध माना था और कहा था कि चुनाव आयोग को मतदाता सूची की विशेष गहन समीक्षा करने की शक्ति है. अदालत ने यह भी माना था कि मतदाता सूची में शामिल होने की पात्रता से जुड़े सीमित स्तर पर नागरिकता की जांच चुनाव आयोग कर सकता है.
- लेकिन सोमवार की सुनवाई का सवाल अलग है. यहां सवाल यह है कि एसआईआर के दौरान इस्तेमाल किए गए फॉर्म-6 के साथ अतिरिक्त डिक्लेरेशन किस प्रक्रिया के तहत जोड़ी गई और उसे किसने लागू किया.
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कोर्ट क्यों मांग रहा है फॉर्म-6 का रिकॉर्ड?
- दरअसल, मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार के खिलाफ दाखिल याचिका में सिर्फ फॉर्म-6 को लेकर ही सवाल नहीं उठाए गए हैं. याचिका में चुनाव आयोग के फैसले लेने के तरीके और एसआईआर से जुड़े दूसरे अहम सवाल भी उठाए गए हैं. सुप्रीम कोर्ट इन्हीं सवालों पर चुनाव आयोग का पक्ष और उससे जुड़े रिकॉर्ड देखना चाहता है.
- यानी अदालत के सामने विवाद सिर्फ इस बात का नहीं है कि फॉर्म-6 में क्या बदला गया. कोर्ट यह भी जानना चाहती है कि एसआईआर से जुड़े अहम फैसले आखिर लिए कैसे गए और उन्हें लेने की प्रक्रिया क्या थी.
- अदालत खास तौर पर यह देखना चाहती है कि ये फैसले सिर्फ मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार ने लिए थे या चुनाव आयोग के सभी सदस्यों की इसमें भूमिका थी. अगर किसी फैसले पर सभी सदस्य एकमत नहीं थे, तो क्या उसे बहुमत के आधार पर मंजूरी दी गई थी?
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