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जब नाना पाटेकर पर भारी पड़ा ‘बिहारी’ किरदार, 14 महीने तक रहे परेशान, कहते थे- ‘ज्यादा दिन नहीं जी सकता’

बिहार की मिट्टी, वहां की ठेठ बोली और बात-बात में झलकता दबदबा. फिल्मों में जब किसी किरदार की जुबान में बिहार उतरता है तो सिर्फ उसका लहजा नहीं बदलता, पूरा व्यक्तित्व बदल जाता है. नाना पाटेकर ने भी एक ऐसे ही किरदार को पर्दे पर उतारा था, जिसकी भाषा में ठसक थी, बातों में हुक्म और अंदाज में ऐसा रौब कि सामने वाला संभलकर खड़ा रहे. यह था ‘अपहरण’ का तबरेज आलम.

नाना पाटेकर को पर्दे पर आपने कई रंगों में देखा है. कभी गुस्से में आग उगलता पुलिस अफसर, कभी सिस्टम से लड़ता आम आदमी और कभी ऐसा किरदार, जिसकी सिर्फ आवाज सुनकर ही माहौल बदल जाता है. लेकिन तबरेज एक किरदार था, जिसे निभाते-निभाते खुद नाना पाटेकर उसके असर से परेशान हो गए थे.

बिहार की नेतृत्व, अपराध और अपहरण के धंधे की पृष्ठभूमि पर बनी इस फिल्म में नाना ने ऐसा नेतृत्वक किरदार निभाया था, जिसे देखकर दर्शकों को लगा कि वह किसी एक शख्स की कहानी नहीं, बल्कि उस दौर के पूरे सिस्टम का चेहरा है.

दिलचस्प बात यह है कि नाना खुद भी इस किरदार से लंबे वक्त तक दूर नहीं रह पाए. उन्होंने एक इंटरव्यू में बताया था कि वह जिस किरदार को निभाते हैं, उसे फिल्म की शूटिंग के दौरान जीने लगते हैं. उसका असर उनके हावभाव और सोच पर भी पड़ता है. ‘अपहरण’ में तबरेज आलम का किरदार इतना जटिल था कि नाना ने निर्देशक प्रकाश झा से फिल्म जल्द खत्म करने को कहा था. उनका कहना था कि इस किरदार को लगातार दिमाग में रखना परेशान करने वाला हो रहा था.

कौन था तबरेज आलम, जिसे निभाना नाना के लिए इतना मुश्किल था?

‘अपहरण’ में तबरेज आलम कोई साधारण विलेन नहीं था. वह एक ताकतवर नेतृत्वक शख्सियत था, जो नेतृत्व के साथ अपहरण के कारोबार से भी जुड़ा हुआ था. प्रकाश झा ने इसे बिहार में उस समय मौजूद अपहरण उद्योग और अपराध-नेतृत्व के रिश्ते की पृष्ठभूमि में रखा था.

फिल्म की कहानी अजित यानी अजय देवगन के इर्द-गिर्द घूमती है. अजित एक पढ़ा-लिखा बेरोजगार युवक है, जो पुलिस में जाना चाहता है. लेकिन परिस्थितियां उसे धीरे-धीरे उस दुनिया में पहुंचा देती हैं, जहां तबरेज आलम की तूती बोलती है. अजित के लिए तबरेज शुरुआत में ताकत और सफलता का प्रतीक नजर आता है. लेकिन धीरे-धीरे उसे समझ आने लगता है कि इस ताकत की कीमत कितनी बड़ी है.

निर्देशक प्रकाश झा ने फिल्म के लिए बिहार में अपहरण के कारोबार को करीब से समझने की कोशिश की थी. उन्होंने लोगों से बातचीत की, जेल जाकर इस धंधे से जुड़े लोगों से बात की और अपहरण का शिकार हुए लोगों से भी बातचीत की. इसी अनुभव को फिल्म की पृष्ठभूमि बनाया गया.

यानी तबरेज आलम का संसार सिर्फ फिल्मी कल्पना नहीं था. उसके पीछे बिहार के उस दौर का सामाजिक और नेतृत्वक माहौल था, जिसे प्रकाश झा करीब से समझना चाहते थे.

असली राजनेता से प्रेरणा थी, लेकिन नकल नहीं की नाना ने

तबरेज आलम को लेकर एक दिलचस्प बात खुद नाना पाटेकर ने बताई थी. उन्होंने कहा था कि प्रकाश झा ने उन्हें बताया था कि यह किरदार एक वास्तविक राजनेता से मॉडल्ड है. लेकिन नाना ने उस नेता का अध्ययन करके उसकी नकल नहीं की.

उन्होंने साफ कहा था कि उन्होंने किरदार को वैसे निभाया, जैसा प्रकाश झा उसे पर्दे पर देखना चाहते थे. नाना के मुताबिक तबरेज के किरदार को आकार देने में करीब 80 फीसदी योगदान निर्देशक का था. वह सिर्फ निर्देशक के विजन को समझकर उसे अपने अभिनय से पर्दे पर उतार रहे थे.

प्रकाश झा ने भी उस समय साफ किया था कि फिल्म में किसी वास्तविक बिहारी राजनेता के नाम पर कोई किरदार नहीं रखा गया था. यानी तबरेज आलम को किसी एक नेता की हूबहू कॉपी मानना सही नहीं होगा.

यही बात इस किरदार को और दिलचस्प बनाती है. वह किसी एक व्यक्ति की बायोपिक नहीं था. बल्कि सत्ता, अपराध और अपने किए को सही ठहराने वाली मानसिकता का फिल्मी रूप था.

‘गलत’ काम करता था, फिर भी खुद को सही मानता था

तबरेज आलम की सबसे खतरनाक बात सिर्फ उसका अपराधी होना नहीं था. उसकी असली ताकत यह थी कि वह अपने फैसलों को गलत मानता ही नहीं था.

नाना ने खुद तबरेज को ऐसा नेतृत्वक व्यक्ति बताया था, जिसे पूरा विश्वास था कि वह जो भी कर रहा है, वह ऊपर वाले की इच्छा के मुताबिक कर रहा है. उसके लिए सही और गलत का फैसला नैतिकता से ज्यादा उसकी अपनी सोच तय करती थी. यही वजह थी कि नाना इसे सामान्य विलेन नहीं मानते थे.

यहीं से किरदार में वह डर पैदा होता है, जो किसी चीखते-चिल्लाते गुंडे से नहीं बल्कि एक ऐसे ताकतवर आदमी से पैदा होता है, जिसे अपने गलत काम में भी कोई गलती नजर नहीं आती.

और शायद यही वजह थी कि नाना को यह किरदार निभाना इतना भारी लगा.

नाना ने कहा था- ज्यादा दिन तक इसे जीना मुश्किल है

नाना पाटेकर का अभिनय करने का तरीका हमेशा से थोड़ा अलग रहा है. वह किरदार को सिर्फ कैमरे के सामने नहीं निभाते, बल्कि शूटिंग के दौरान उसके बारे में लगातार सोचते रहते हैं. ‘अपहरण’ के समय यही तरीका तबरेज आलम पर भारी पड़ गया.

करीब 14 महीने के लंबे शूटिंग शेड्यूल के दौरान नाना लगातार इस किरदार के बारे में सोचते रहे. उन्होंने बताया था कि वह फिल्म में निभाए जाने वाले किरदार को जीने लगते हैं और उसका असर उनके हावभाव तक पहुंच जाता है. तबरेज का किरदार उनके लिए इतना परेशान करने वाला हो गया कि उन्होंने प्रकाश झा से फिल्म जल्दी पूरी करने को कहा.

सोचिए, पर्दे पर जिस किरदार को देखकर दर्शक डर रहे थे, उस किरदार से बाहर निकलने की बेचैनी खुद उसे निभाने वाले अभिनेता में पैदा हो गई थी.

यही वजह है कि ‘अपहरण’ में नाना का तबरेज आलम सिर्फ एक विलेन बनकर नहीं रह गया. उसकी आवाज, ठहराव, बोलने का अंदाज और सत्ता पर भरोसा करने वाली बॉडी लैंग्वेज ने उसे नाना पाटेकर के सबसे यादगार किरदारों में शामिल कर दिया.

नाना ने इस किरदार का श्रेय भी खुद तक सीमित नहीं रखा. उन्होंने साफ कहा था कि तबरेज जैसा किरदार पर्दे पर जिस तरह दिखाई दिया, उसमें प्रकाश झा की बड़ी भूमिका थी.

आज ‘अपहरण’ को याद किया जाता है तो अजय देवगन के संघर्ष के साथ तबरेज आलम भी याद आता है. लेकिन इस किरदार की सबसे दिलचस्प कहानी कैमरे के सामने नहीं, कैमरे के पीछे छिपी है.

एक ऐसा किरदार, जिसे नाना पाटेकर ने इतनी शिद्दत से जिया कि उसे निभाने वाला अभिनेता खुद कह बैठा कि इसे ज्यादा दिन तक जीना मुश्किल है.

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विनोद झा
संपादक नया विचार

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