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देश की अजेय आस्था का संकल्प सोमनाथ, पढ़ें केंद्रीय मंत्री अन्नपूर्णा देवी का आलेख

Somnath: भगवान श्रीकृष्ण के ये कालजयी वचन, ‘नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावकः’ (आत्मा को न शस्त्र काट सकते हैं, न अग्नि जला सकती है) केवल मनुष्य की देह पर ही नहीं, बल्कि हिंदुस्तान की उस सांस्कृतिक परंपरा पर भी खरे उतरते हैं, जिसका हृदय सोमनाथ है. हिंदुस्तान की चेतना इतिहास के धूल-धूसरित पन्नों में दबी हुई कोई याद नहीं है, बल्कि यह हमारे तीर्थों की पवित्रता और जन-जन की सांसों में धड़कता हुआ जीवंत सत्य है. सोमनाथ मंदिर इसी सत्य का वह सूर्य है, जिसने सदियों के घोर अंधकार, बर्बर आघातों और इतिहास के झंझावातों को सहा है, लेकिन अपनी आभा को इसने कभी धूमिल नहीं होने दिया. यह मंदिर इसका साक्षी है कि पंथ और मत बदल सकते हैं, सत्ताएं आ और जा सकती हैं, परंतु हिंदुस्तान की सनातन चेतना का प्रवाह कभी नहीं रुकता.

सोमनाथ मात्र एक मंदिर नहीं है, बल्कि यह हिंदुस्तान के स्वाभिमान का वह हिमालय है, जो झुकना नहीं जानता. इसके पुनरोद्धार की 75वीं वर्षगांठ उस राष्ट्रीय संकल्प की सिद्धि है, जिसकी नींव लौह पुरुष सरदार वल्लभभाई पटेल ने रखी थी. यशस्वी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जब सोमनाथ को हिंदुस्तान की ‘अपराजेय आत्मा’ कहा, तब उन्होंने वास्तव में उस ‘नव-हिंदुस्तान’ का ही आह्वान किया, जो अपनी विरासत के बल पर आधुनिकता के अनंत आकाश को छूने का सामर्थ्य रखता है. यह पुनर्जागरण आत्म-ग्लानि को त्याग कर आत्म-गौरव को अपनाने की यात्रा है, उस ‘अमृत काल’ की घोषणा है, जिसमें स्वतंत्र हिंदुस्तान ने अपनी विस्मृत जड़ों की ओर गौरव के साथ लौटने का संकल्प लिया है. जैसा कि देश के प्रथम राष्ट्रपति डॉ राजेंद्र प्रसाद ने कहा था, ‘सोमनाथ इस बात का प्रतीक है कि अद्वितीय श्रद्धा और विश्वास को कभी नष्ट नहीं किया जा सकता.’

झारखंड की इस पावन धरा का प्रतिनिधित्व करते हुए, जहां की माटी के कण-कण में ‘धरती आबा’ भगवान बिरसा मुंडा का त्याग और जनजातीय अस्मिता का गौरव रचा-बसा है, मैं सोमनाथ की इस चेतना को अपने परिवेश से गहराई से जुड़ा हुआ महसूस करती हूं. जिस प्रकार सोमनाथ ने बाहरी आक्रांताओं के सामने अपना मस्तक नीचा नहीं होने दिया, उसी प्रकार हमारे झारखंड के वीरों और फूलो-झानो जैसी वीरांगनाओं ने जल, जंगल और जमीन की रक्षा के साथ-साथ हिंदुस्तानीय जीवन-मूल्यों की रक्षा के लिए ‘उलगुलान’ किया.

सोमनाथ की लहरों की गर्जना और झारखंड के जंगलों में गूंजते स्वाभिमान का स्वर एक ही है. यह हमें सिखाता है कि जब तक हमारी जड़ें और प्रकृति के प्रति हमारा सम्मान सुरक्षित है, तब तक राष्ट्र का वृक्ष सदैव पल्लवित होता रहेगा. सोमनाथ का पत्थर-पत्थर संघर्ष की गाथा कहता है, तो झारखंड का पर्वत-पर्वत अदम्य साहस की कहानी सुनाता है. आज जब हम ‘भव्य काशी, दिव्य अयोध्या और वैभवशाली सोमनाथ’ के साक्षी बन रहे हैं, तब यह स्पष्ट है कि हिंदुस्तान का वास्तविक उत्थान उसकी जड़ों को सींचने से ही संभव है. प्रधानमंत्री का विजन ‘विरासत भी, विकास भी’ केवल एक नीतिगत वक्तव्य नहीं है, बल्कि एक युग-परिवर्तनकारी सांस्कृतिक दर्शन है.

जिस प्रकार सोमनाथ का पुनर्निर्माण हिंदुस्तान के खोए हुए सांस्कृतिक आत्मविश्वास की पुनर्स्थापना थी, ठीक उसी प्रकार आज ‘विकसित हिंदुस्तान @2047’ का संकल्प हमारे आर्थिक, सामाजिक और नैतिक पुनरोद्धार का वह सांस्कृतिक महायज्ञ है, जिसमें हर नागरिक अपनी कर्मठता से योगदान देने को तत्पर है. प्रधानमंत्री के विजन के अनुरूप-यह आधुनिक कनेक्टिविटी और सुविधाओं के माध्यम से स्थानीय वित्तीय स्थिति, आजीविका और ‘एक हिंदुस्तान, श्रेष्ठ हिंदुस्तान’ की भावना को सशक्त करने की एक राष्ट्र-साधना है.

एक स्त्री और जनसेवक के रूप में मैं सोमनाथ की स्थिरता और हिंदुस्तानीय नारी के मौन धैर्य में एक अद्भुत साम्य देखती हूं. समय साक्षी है कि हिंदुस्तान की सांस्कृतिक निरंतरता को अक्षुण्ण रखने में हमारी मातृशक्ति का योगदान अतुलनीय रहा है. जब सोमनाथ पर संकट के बादल छाये थे और मंदिर उपेक्षित था, तब पुण्यश्लोक देवी अहिल्याबाई होलकर ने ही साहस दिखाया और मुख्य मंदिर के समीप शिव अर्चना के लिए एक नवीन मंदिर का निर्माण करवाया, ताकि भक्ति की अखंड ज्योति कभी बुझने न पाये. उन्होंने सोमनाथ के गौरव को पुनर्स्थापित करने का जो संकल्प लिया था, वही हमारी नारी शक्ति की असली पहचान है. सोमनाथ को कितनी ही बार खंडित करने का प्रयास किया गया, परंतु वह हर बार पहले से अधिक भव्य और दिव्य होकर खड़ा हुआ. ठीक वैसे ही, हिंदुस्तान की मातृशक्ति ने-चाहे वह झारखंड के सुदूर वनांचलों की श्रमशील बहनें हों या महानगरों के कॉरपोरेट जगत में नेतृत्व करती बेटियां- सदियों के संघर्षपूर्ण कालखंड में भी हमारे संस्कारों की लौ को अपनी आस्था के आंचल में सुरक्षित रखा है.

नारी ही इस राष्ट्र की ‘सांस्कृतिक रीढ़’ है. हमारी संस्कृति में ‘शक्ति’ की उपासना के बिना शिव का स्वरूप भी पूर्ण नहीं माना जाता. आज ‘बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ’ से लेकर ‘नारी शक्ति वंदन अधिनियम’ जैसे युगांतरकारी निर्णय इसी सत्य की पुष्टि करते हैं कि जब मां स्वस्थ और बेटी शिक्षित तथा सशक्त होगी, तभी राष्ट्र की नींव वज्र के समान सुदृढ़ होगी. हम केवल स्त्रीओं का विकास ही नहीं कर रहे, बल्कि स्त्रीओं के नेतृत्व में राष्ट्र का विकास भी सुनिश्चित कर रहे हैं. सोमनाथ जैसे तीर्थ उपासना के साथ-साथ स्वावलंबन और आत्म-गौरव की जीवंत पाठशालाएं हैं. आज जब हम ‘विकसित हिंदुस्तान’ के संकल्प के साथ आगे बढ़ रहे हैं, तब हमारी सफलता का मूलमंत्र यह है कि हम एक हाथ में उपनिषदों का शाश्वत ज्ञान रखें और दूसरे हाथ में आधुनिक तकनीक का अजेय सामर्थ्य. हमारी सफलता की उड़ान की शक्ति हमारी जड़ों से ही आती है.

सोमनाथ का वैभव हमें यह शाश्वत संदेश देता है कि हिंदुस्तान की आत्मा अमर है, सनातन है. यह वही राष्ट्र है, जिसने हर संघर्ष से उत्कर्ष तक की यात्रा अपनी आस्था के बल पर तय की है. सोमनाथ के विशाल समुद्र तट से सम्मेद शिखर (पारसनाथ पहाड़ी) की शांत ऊंचाइयों तक और कच्छ के रण से लेकर कोडरमा के अभ्रक अंचलों तक-हिंदुस्तान की चेतना एक है, अखंड है. सोमनाथ की यह पावन धरा आने वाली पीढ़ियों को सदैव यह मंत्र देती रहेगी कि राष्ट्र की वास्तविक शक्ति उसके पत्थरों या भौगोलिक सीमाओं में ही नहीं, बल्कि उसके चरित्र, उसकी अजेय नारीशक्ति और उसके सामूहिक प्राण-तत्व में निहित है. यही हमारी पहचान है, यही हमारी साझा विरासत है और यही ‘विकसित हिंदुस्तान’ का अचल आधार भी है. जय सोमनाथ! जय जोहार! जय हिंद!

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विनोद झा
संपादक नया विचार

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