अक्सर लोगों के मन में यह सवाल आता है कि नेशनल हाईवे पर पूरी सड़क के किनारे-किनारे लाइटें क्यों नहीं लगी होती हैं. लंबे और चौड़े हाईवे को देखकर कई लोगों को लगता है कि इन पर हर समय पूरी रोशनी होनी चाहिए. लेकिन NHAI का कहना है कि यह सिर्फ एक मिथ है. दरअसल, हाईवे पर लाइटिंग को लेकर कुछ तय मानक और नियम हैं, जिनके आधार पर ही अलग-अलग जगहों पर लाइटें लगाई जाती हैं.
क्या है नियम?
हर किलोमीटर पर रोशनी करना न तो जरूरी माना जाता है और न ही मुमकिन है. हिंदुस्तान में सड़कों के डिजाइन और इंफ्रास्ट्रक्चर से जुड़े मानक तय करने वाली संस्था IRC (इंडियन रोड्स कांग्रेस) इसके लिए साफ-साफ गाइडलाइन देती है. इन्हीं गाइडलाइन के तहत हाईवे पर लाइटिंग सिर्फ उन जगहों पर लगाई जाती है, जहां सेफ ड्राइविंग के लिए बेहतर विजिबिलिटी सबसे ज्यादा जरूरी होती है. यानी रोशनी वहीं दी जाती है जहां इसकी असल में जरूरत हो, ताकि यात्रियों की सेफ्टी भी बनी रहे और संसाधनों का बेवजह खर्च भी न हो.
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हाईवे पर लाइटें किन-किन जगहों पर लगाई जाती हैं?
- टोल प्लाजा के आसपास
- जहां दो या उससे ज्यादा सड़कें आपस में मिलती हैं
- फ्लाईओवर और अंडरपास पर
- शहरों, कस्बों या आबादी वाले इलाकों में
- बस स्टॉप, बस बे और ट्रकों के रुकने वाली जगहों पर
- ऐसे हिस्सों में जहां दुर्घटनाओं का खतरा ज्यादा हो या ट्रैफिक काफी अधिक रहता हो
हाईवे पर हर जगह लाइटें क्यों नहीं लगाई जातीं?
हजारों किलोमीटर लंबे हाईवे नेटवर्क पर हर जगह लाइट लगाना न सिर्फ बेहद महंगा काम है, बल्कि इससे बिजली की खपत और रखरखाव का खर्च भी काफी बढ़ जाएगा. इसी वजह से जरूरत वाले हिस्सों, जैसे शहरों के पास, इंटरचेंज और टोल प्लाजा एरिया में ही लाइटिंग पर ज्यादा ध्यान दिया जाता है. वहीं बाकी हिस्सों में ड्राइवरों की सेफ्टी के लिए रिफ्लेक्टिव साइनबोर्ड, चमकदार रोड मार्किंग्स और कई एडवांस्ड सेफ्टी फीचर्स लगाए जाते हैं, ताकि रात के समय भी सफर सेफ और आसान बना रहे.
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