इतिहास और हालिया हटनाओं पर नजर डालें तो हम पाएंगे कि जब भी किसी आंदोलन और प्रदर्शन में अनशन किया गया, प्रशासनें झुकी हैं. बात चाहे आजादी के आंदोलन की हो या फिर जुलाई में नीट पेपर लीक के खिलाफ हुए प्रदर्शन की.
देश में अक्टूबर महीने की शुरुआत ही एक तरह से प्रदर्शन और धरनों के साथ हुई है. बावजूद इसके इस बार का प्रदर्शन वो प्रभाव नहीं छोड़ पा रहा है, जैसा कि जुलाई में छात्रों के प्रदर्शन ने छोड़ा था. हालांकि इस बार काॅकरोच जनता पार्टी के साथ-साथ कांग्रेस और उनके सहयोगी और कई स्टूडेंट यूनियन भी सड़क पर हैं. इन प्रदर्शनों पर अगर नजर डालें तो हम पाएंगे कि यहां नैतिकता का अभाव है. प्रदर्शनों में जब अनशन का प्रयोग होता है तो उसके साथ नैतिकता जुड़ती है, क्योंकि इस बार के प्रदर्शनों में नैतिकता की कमी की खूब चर्चा मीडिया और सोशला मीडिया में हुई है.
जुलाई के प्रदर्शन में सोनम वांगचुक अनशन पर थे और उन्होंने शिक्षा मंत्री के इस्तीफे के लिए 26 दिनों तक लगातार अनशन किया. सोनम वांगचुक के अनशन की वजह से ही प्रशासन ने छात्रों पर कोई केस दर्ज नहीं किया और उनके खिलाफ कोई कार्रवाई भी नहीं की. सवाल यह है कि इस बात से तो तमाम विपक्ष भी वाकिफ है और सीजेपी के नेता भी, फिर क्यों कोई अनशन का हथियार ज्ञानेश कुमार के खिलाफ इस्तेमाल नहीं कर रहा है?
हिंदुस्तान में अनशन का प्रयोग महात्मा गांधी, विनोबा भावे, पोट्टिश्रीरामुलु, इरोम शर्मिला, मेधा पाटकर, अन्ना हजार और सोनम वांगचुक जैसे नेताओं और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने किया और प्रशासन को झुकाया भी है. महात्मा गांधी ने तो अनशन के जरिए ना सिर्फ अंग्रेजों को झुकाया, बल्कि सांप्रदायिक हिंसा की आग में चल रहे देश को भी नफरत के रास्ते से सामाजिक सौहार्द के रास्ते पर लेकर आए. कांग्रेस पार्टी जो खुद को महात्मा गांधी का सच्चा अनुयायी मानती है, वो भी अनशन के रास्ते पर चलती नहीं दिख रही है, जबकि उनके पास राहुल गांधी जैसा फिट और विपश्यना करने वाला नेता हैं.
सीजेपी के युवा और ऊर्जावान नेता जो यह मानते हैं कि उन्होंने संविधान की रक्षा का बागडोर उठाया है, उनमें से भी कोई एक सामने नहीं आया है, जो यह कह सके कि वह अनशन के जरिए प्रशासन को झुकाएंगे और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार से इस्तीफा लेंगे और एसआईआर की गड़बड़ियों को दूर करेंगे.
यह बात भी एक सच्चाई है कि अनशन हमेशा कारगर साबित होगा, ऐसा जरूरी नहीं है, लेकिन इस बात से भी इनकार नहीं किया जा सकता है कि अनशन के साथ लोगों की सहानुभूति होती है और प्रशासन भी कहीं ना कहीं दबाव में आ जाती है. अनशन के जरिए विपक्ष मीडिया का ध्यान आकर्षित कर सकता है, जनसमर्थन जुटा सकता है और सबको एकमंच पर ला सकता है. बदलते दौर में बेशक आंदोलनों का स्वरूप बदला है और अनशन से ज्यादा अन्य तरीके प्रभावी और मारक हो गए हैं.
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