आखिर सारी ताकतों और सारे संसाधनों को लगा देने के बाद भी भाजपा को शिकस्त खानी पड़ी. बांकीपुर और दतिया के उपचुनाव में भाजपा के हाथ से ये दोनों सीटें यूं फिसल गयीं, जैसे मुट्ठी से रेत फिसल जाती है. पटना लोकसभा के अंदर पड़ने वाले बांकीपुर विधानसभा उपचुनाव पर पूरे देश की निगाहें टिकी थीं. वजह यह है कि यह भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन की सीट है जिसे उन्होंने अभी-अभी राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने और राज्यसभा जाने पर खाली किया.
जाहिर है, राष्ट्रीय अध्यक्ष की प्रतिष्ठा यहां दांव पर लगी थी, इसलिए पूरी भाजपा नेतृत्व की प्रतिष्ठा भी दांव पर लगी थी. यह बेवजह नहीं है कि नितिन नवीन लगातार बांकीपुर में कैंप कर रहे थे. 1995 से लगातार भाजपा इस सीट पर काबिज रही है और नितिन नवीन 2006 से लगातार बांकीपुर से विधानसभा चुनाव जीतकर विधानसभा पहुंचते रहे. यह कायस्थ बहुल क्षेत्र है और बांकीपुर में अन्य सवर्णों के साथ कायस्थ भाजपा के पक्ष में मतदान करते आये थे और अन्य सवर्णों में कुछ खिसकते भी रहे, तो भी कायस्थ का मत शत–प्रतिशत भाजपा के पक्ष में जाता रहा. इसलिए यहां से कायस्थ उम्मीदवार ही खड़े होते रहे हैं और यह भाजपा की सुरक्षित सीट मानी जाती रही है.
अब सवाल यह है कि आखिर इस सेफ जोन से एनडीए उम्मीदवार और खासकर भाजपा मात क्यों खायी? पहली बात तो यह है कि भाजपा का उम्मीदवार नीरज सिन्हा बेहद कमजोर उम्मीदवार था. प्रशांत किशोर उस मुकाबले बड़े कद्दावर उम्मीदवार थे. प्रशांत किशोर पढ़े–लिखे हैं, जुझारू हैं और संघर्ष करते रहे हैं. नीरज सिन्हा को कोई नहीं जानता था. एक कार्यकर्ता के तौर पर भी नीरज सिन्हा की कोई पहचान नहीं थी. बांकीपुर के मतदाताओं में इस बात को लेकर रोष था कि कई अच्छे दावेदारों की जगह भाजपा ने नीरज सिन्हा पर दांव क्यों लगाया?
इसके पहले अभिषेक बंटी नाम के उम्मीदवार का चयन हुआ और वो भी खुद नितिन नवीन के द्वारा. लेकिन आनन-फानन में उसकी उम्मीदवारी को रद्द किया गया और यह संदेश गया कि उसकी छवि अच्छी नहीं थी और उसके मां-बाप चारा घोटाला में सजायाफ्ता रहे हैं. भाजपा ने पहली गलती वहीं पर की. जब नीरज सिन्हा को लाया गया तो मतदाताओं में यह बात उठी कि इसकी छवि कौन-सी अच्छी है.
एक भाजपा नेता के कथित बयान – हम किसी कुत्ते-बिल्ली को भी खड़ा करेंगे तो जीत जायेंगे- ने भी बांकीपुर के मतदाताओं में नाराजगी ला दी थी. नीट पेपर लीक को लेकर युवाओं में रोष था ही, उस पर से यह बयान आग में घी का काम किया. यह चुनाव भी इत्तफाकन उसी समय पड़ा जब नीट पेपर लीक को लेकर पूरे देश में युवाओं का रोष उफान पर था और जंतर-मंतर पर जो हुुआ, उसे पूरे देश-दुनिया ने देखा.
आखिर प्रशासन को इन युवाओं की मांगों के आगे झुकना पड़ा और शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान को इस्तीफा देना पड़ा और शिक्षा प्रणाली में मूलभूत सुधार के लिए हाई टास्क फोर्स का गठन और लोक परीक्षा सुधार बिल लाना पड़ा. बांकीपुर उपचुनाव में लोग भाजपा से नाराज थे, और खासकर युवा वर्ग. इसकी एक वजह और भी है कि कानून–व्यवस्था को लेकर लोगों में असंतोष है. भोजपुर में भरत तिवारी नाम के एक युवा का एनकाउंटर होता है और वो भी गलत ढंग से. बहुत दिनों तक उसपर पर्दा ढांकने की कोशिश की गयी.
लेकिन अंतत: प्रशासन एक्सपोज हुई. फिर मुख्यमंत्री का यह बयान कि कुशवाहा की तरफ कोई आंख उठाकर देखेगा तो बख्शा नहीं जाएगा और लोगों में गलत संदेश गया कि क्या सम्राट चौधरी सिर्फ कुशवाहा के मुख्यमंत्री हैं? एक तो यूजीसी बिल को लेकर लोगों में नाराजगी पहले से थी, जिसमें सवर्णों के साथ भेदभाव की बात आयी और केंद्र प्रशासन ने सवर्णों की उस नाराजगी की अनदेखी की. यूपी के तर्ज पर जब यहां भी बुलडोजर न्याय की प्रक्रिया शुरू हुई तो मुसलमानों में एक संदेश गया कि जल्द ही यूपी के तर्ज पर यहां भी उन्हें बुलडोजर न्याय से नवाजा जाएगा. मुसलमान मतदाताओं में एक डर व्याप्त हुआ जो नीतीश कुमार के समय में नहीं था.
सम्राट चौधरी को मुख्यमंत्री बनाये जाने को लेकर भी लोगों में अच्छा प्रभाव नहीं था. आखिरी बात, अब नीतीश कुमार का प्रभाव भी खत्म हो चुका है. नीतीश कुमार से बांकीपुर उपचुनाव में मतदाताओं को वीडियो संदश दिलवाया गया. लेकिन उसका कोई असर नहीं पड़ा. एक तो नीतीश कुमार संदेश देने में ही इतने कमजोर लग रहे थे कि उसका बेअसर होना लाजिमी था. भाजपा ने पवन सिंह से लेकर मनोज तिवारी तक को उतारा. लेकिन मतदाताओं ने खारिज किया और खासकर जेन जी ने. इसलिए हुकूमत को अब जेन जी के मूड को समझना होगा. युवाओं ने ही मोदी जी को सत्ता में पहंुचाया था, इसलिए युवाओं के मूड और नाराजगी को समझना पड़ेगा. दतिया में भाजपा की हार से अगर कोई सबसे ज्यादा खुश होगा तो वो होंगे नरोत्तम मिश्रा, जिन्हें भाजपा आनाकमान ने दूध में पड़ी मक्खी की तरह अलग कर दिया. अब इसका असर नितिन नवीन और सम्राट चौधरी के भविष्य पर क्या पड़ेगा, यह देखना शेष है. (ये लेखक के निजी विचार हैं)
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