ग्राउंड रिपोर्ट: पेड़ की छांव, जमीन पर बिछी चटाई और लोहे की रॉड से बना जुगाड़ का ब्लैकबोर्ड, यही व्यवस्था मुजफ्फरपुर के औराई प्रखंड स्थित महुआरा गांव के प्राथमिक विद्यालय की पहचान बन गई है.
पिछले 10 वर्षों से भूमिहीन और भवनहीन यह विद्यालय खुले आसमान के नीचे संचालित हो रहा है. इसके बावजूद चार शिक्षक कक्षा एक से पांच तक के करीब 60 बच्चों को पढ़ाने में जुटे हैं.
बुनियादी सुविधाओं के अभाव के बीच यहां के शिशु रोजाना पढ़ने पहुंचते हैं और शिक्षक सीमित संसाधनों के बावजूद उनके भविष्य को संवारने की कोशिश कर रहे हैं.
आम के पेड़ की छांव में चलती हैं कक्षाएं
विद्यालय में पर्याप्त कमरे नहीं होने के कारण बच्चों की कक्षाएं खुले में आम के पेड़ की छांव में लगती हैं. ब्लैक बोर्ड के लिए भी स्थायी व्यवस्था नहीं है. लोहे के रॉड से तैयार जुगाड़ के बोर्ड के सहारे शिक्षक बच्चों को पढ़ाते हैं. फर्नीचर और अन्य शैक्षणिक सामग्री की कमी के कारण विद्यार्थी जमीन पर चटाई बिछाकर बैठते हैं.
विद्यालय में पढ़ने वाले शिशु अल्पसंख्यक और दलित समुदाय से आते हैं. शिक्षकों का कहना है कि सीमित संसाधनों में नियमित पढ़ाई कराना चुनौतीपूर्ण है, लेकिन बच्चों की शिक्षा प्रभावित न हो, इसके लिए शिक्षक लगातार प्रयास करते हैं.
शौचालय नहीं, बच्चों को भेजना पड़ता है घर
विद्यालय की प्रधान शिक्षिका अफसाना खातून के अनुसार, सबसे बड़ी समस्या शौचालय की है. स्कूल में शौचालय नहीं होने के कारण बच्चों को जरूरत पड़ने पर घर भेजना पड़ता है. कई बार शिशु घर जाने के बाद वापस स्कूल नहीं लौटते. ऐसी स्थिति में शिक्षकों को खुद उनके घर जाकर बच्चों को वापस लाना पड़ता है.
शिक्षकों का कहना है कि स्कूल में मूलभूत सुविधाएं उपलब्ध हों तो बच्चों की पढ़ाई और उपस्थिति दोनों बेहतर हो सकती हैं.
बाढ़ के बाद 10 साल से अस्थायी संचालन
शिक्षक मो अनीश, विश्वजीत कुमार और अहमद रजा ने बताया कि विद्यालय पहले बागमती बांध के अंदर संचालित होता था. बाढ़ के कारण विस्थापन के बाद करीब 10 वर्षों से यह दक्षिणी बांध के पास एक ग्रामीण की जमीन पर अस्थायी रूप से चल रहा है.
ग्रामीण मतीन अशरफ ने बताया कि बच्चों की परेशानी को देखते हुए ग्रामीणों ने विद्यालय के लिए जमीन दान भी की है. इसके बावजूद कुछ कागजी अड़चनों के कारण अब तक भवन निर्माण शुरू नहीं हो सका है.
कागजी अड़चन दूर होने का इंतजार
विद्यालय भवन का निर्माण नहीं होने से बच्चों को मौसम की मार भी झेलनी पड़ती है. गर्मी, बारिश और अन्य परिस्थितियों में खुले में पढ़ाई करना शिक्षकों और विद्यार्थियों दोनों के लिए मुश्किल हो जाता है.
सीओ धीरज कुमार ने मामले की जांच कर जल्द समाधान निकालने का आश्वासन दिया है. अब ग्रामीणों और विद्यालय परिवार को उम्मीद है कि कागजी प्रक्रिया पूरी होगी और बच्चों को जल्द अपना स्कूल भवन मिल सकेगा. दस साल से अस्थायी व्यवस्था में चल रहे इस विद्यालय के बच्चों को आखिर कब स्थायी छत मिलेगी, यह सवाल अब भी बना हुआ है.
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