Hot News

तेज अर्थव्यवस्था, कमजोर शेयर बाजार,पढ़ें-प्रभु चावला का आलेख

नब्बे साल पहले जॉन मेनार्ड कीन्स ने शेयर बाजार की तुलना अखबार में प्रकाशित होने वाली सौंदर्य प्रतियोगिता से की थी. पाठक जीतता इसलिए नहीं है कि वह सबसे सुंदर चेहरे को चुनता है, बल्कि इसलिए कि वह अनुमान लगा सके कि बाकी सभी लोग किस चेहरे को चुनेंगे. कीन्स समझ गये थे कि कीमतें तथ्यों की सूची नहीं, बल्कि विश्वास पर दिये गये फैसले होती हैं. हिंदुस्तान ने पिछले आठ सप्ताहों में यह सबक बहुत भारी कीमत चुकाकर फिर से सीखा है. अप्रैल से जून में हिंदुस्तानीय वित्तीय स्थिति 7.8 फीसदी की दर से बढ़ी, जो प्रतिद्वंद्वी वित्तीय स्थितिओं से कहीं तेज थी. शेयर बाजार में सूचीबद्ध देश की 50 सबसे बड़ी कंपनियों का मुनाफा 18 फीसदी बढ़ा, जो दस तिमाहियों में सबसे तेज वृद्धि थी. फिर भी पिछले शुक्रवार को सेंसेक्स 71,910 पर बंद हुआ और लगातार आठवें सप्ताह गिरावट दर्ज की गयी.

कोविड के दौर वाले 2020 के बाद यह गिरावट का सबसे लंबा सिलसिला था. पांच अगस्त से अब तक सूचकांक करीब 6,700 अंक गिर चुका है, यानी करीब 8.5 फीसदी की गिरावट. मोटे अनुमान के मुताबिक, 30 से 40 लाख करोड़ रुपये के बीच का बाजार पूंजीकरण खत्म हो चुका है. दो दशक से भी अधिक समय में हिंदुस्तान का प्रदर्शन सबसे कमजोर रहा है. इन आंकड़ों के पीछे वास्तविक लोग खड़े हैं. कानपुर में शेयर बाजार के एक कर्मचारी और कोच्चि की एक नर्स का उदाहरण लें. ये हर महीने कुछ हजार रुपये एसआइपी में लगाते रहे थे. इन्हें भरोसा दिलाया गया था कि धैर्य का फल मिलता है. पर इन्होंने थकाऊ हफ्तों के दौरान अपनी बचत को धीरे-धीरे खत्म होते देखा. इन्हीं हफ्तों में नैस्डैक ने रिकॉर्ड स्तर छुआ, दक्षिण कोरिया का कोस्पी 7,000 के स्तर पर लौट आया और जापान का निक्केई अपने शिखर के आसपास बना रहा.

पूरे 2026 में सियोल का बाजार करीब 68 प्रतिशत, टोक्यो का 29 फीसदी और न्यूयॉर्क का 13 प्रतिशत चढ़ा है. इसके मुकाबले सेंसेक्स रुपये में 12 प्रतिशत से अधिक और डॉलर में करीब 18 फीसदी गिर चुका है. इन सभी देशों ने एक ही युद्ध, कच्चे तेल की समान चुनौती और अमेरिकी फेडरल रिजर्व की समान नीतियों का सामना किया. वे फलते-फूलते रहे, जबकि हिंदुस्तान संघर्ष करता रहा. यह गिरावट तीन चरणों में सामने आयी. अगस्त में होर्मुज के आर-पार तनाव बढ़ने के साथ तेल की कीमतें ऊपर जाने लगीं. सितंबर में अमेरिकी फेडरल रिजर्व ने ब्याज दरें बढ़ायीं, अमेरिकी बांड की प्रतिफल दर 2007 के बाद अपने उच्चतम स्तर पर पहुंच गयी और रुपया डॉलर के मुकाबले 96 के स्तर को पार कर गया. फिर 28 सितंबर को अमेरिकी राष्ट्रपति ने ईरान का शांति प्रस्ताव ठुकरा दिया. उस दिन निफ्टी के 50 में से 47 शेयर गिर गये. हिंदुस्तान ही इतनी बुरी तरह क्यों प्रभावित हुआ? दरअसल, लंबे समय से मरम्मत किये जाते और टाले जाते रहे तीन आर्थिक संकट एक साथ फूट पड़े.

पहला संकट तेल का था. हिंदुस्तान जितना कच्चा तेल इस्तेमाल करता है, उसका अधिकांश आयात करता है. इसलिए तेल की कीमतों में हर उछाल से आयात बिल बढ़ता है, रुपया कमजोर होता है और महंगाई बढ़ती है. अगस्त में महंगाई 4.82 फीसदी तक पहुंच गयी. हिंदुस्तान की आर्थिक वृद्धि पर दांव लगा रही वाहन निर्माता कंपनियां, बंदरगाह और इंजीनियरिंग कंपनियां सबसे अधिक प्रभावित हुईं. दूसरा संकट एआइ का था, जो इस दशक की सोने की दौड़ बन चुकी है. सैमसंग और एसके हाइनिक्स द्वारा डाटा केंद्रों में इस्तेमाल होने वाली मेमोरी चिप की बिक्री के चलते आठ महीनों में दक्षिण कोरिया का चिप निर्यात करीब 170 फीसदी बढ़ गया. हिंदुस्तान दुनिया को इस तरह का हार्डवेयर लगभग नहीं बेचता. इसके बजाय हिंदुस्तान की दिग्गज सूचना प्रौद्योगिकी कंपनियों को स्वचालन के शिकार के रूप में देखा जा रहा है, न कि उसके लाभ उठाने वालों के रूप में. निवेशकों ने कमजोर होती खपत और ऐसे तेल संकट को देखा, जिसका अंत नजर नहीं आ रहा था.

हिंदुस्तानीय रिजर्व बैंक ने भी वृद्धि दर के घटकर 6.4 से 6.8 फीसदी के बीच रहने का अनुमान लगाया था. विदेश मंत्री एस जयशंकर ने पिछले महीने संयुक्त राष्ट्र में ईंधन, खाद्य, उर्वरक और वित्त के संकट की चेतावनी दी थी. अब आगे क्या होगा, यह आंशिक रूप से उन ताकतों पर निर्भर करेगा, जो नयी दिल्ली से बहुत दूर हैं. सात अक्तूबर को रिजर्व बैंक की बैठक में उसे रुपये को संभालने और कर्ज लेने वालों को राहत देने के बीच चुनाव करना होगा. खाड़ी क्षेत्र में युद्धविराम हिंदुस्तानीय शेयरों को बजट से कहीं अधिक तेजी से उबार सकता है. लेकिन असली सवाल यह है कि क्या हिंदुस्तान निवेशकों को वापस लौटने की कोई ठोस वजह दे सकता है. ऐसा संभव है, अगर वह एक साथ तीन स्तंभों पर काम करे. मोदी प्रशासन को घरेलू मांग बढ़ाने के लिए पर्याप्त मात्रा में धन उपलब्ध कराना होगा. हिंदुस्तानीय बचतकर्ताओं ने पहले ही अपनी मजबूती दिखा दी है.

सितंबर के अंतिम सप्ताह में विदेशी निवेशकों ने करीब 11,500 करोड़ रुपये के शेयर बेचे, जबकि घरेलू संस्थागत निवेशकों ने 16,400 करोड़ रुपये के शेयर खरीदे. दूसरा गति देने वाला कारक निवेश है. जून तिमाही में स्थिर पूंजी निवेश में करीब 12 फीसदी की वृद्धि हुई और अब इसे उन कमजोरियों पर सीधे केंद्रित करना होगा, जिन्हें सितंबर ने उजागर किया है. सौर ऊर्जा, ऊर्जा भंडारण और बिजली से चलने वाले परिवहन पर खर्च किया गया हर रुपया कच्चे तेल की कीमत बढ़ने पर हिंदुस्तान द्वारा चुकाये जाने वाले युद्ध-कर को कम करता है. तीसरा प्रोत्साहन भरोसा है, और इसे बनाना सबसे कठिन है. फरवरी में बजट के दिन सट्टेबाजी पर कर में अचानक वृद्धि ने दिखाया कि मनमाने फैसलों से पूंजी कैसे बाहर निकलती है.

स्थिर कर व्यवस्था से निवेशकों द्वारा मांगा जाने वाला अतिरिक्त जोखिम प्रीमियम कम होगा. अमेरिका, यूरोप और खाड़ी देशों के साथ तेज गति से व्यापार समझौते भी मदद करेंगे. इसी तरह ऐसी कूटनीति की जरूरत है, जो ऊर्जा की कीमतों पर अफसोस जताने के बजाय ऊर्जा आपूर्ति को सुरक्षित करे. हिंदुस्तान लंबे समय से दुनिया को बताता आया है कि वह अगला बड़ा बाजार है. अब उसे उसी तरह व्यवहार भी करना होगा. सबक बिल्कुल स्पष्ट है. पिछले आठ सप्ताहों में हिंदुस्तान की वित्तीय स्थिति विफल नहीं हुई, निवेशकों का भरोसा विफल हुआ है. कीन्स की धारणा के अनुसार वही चेहरा जीतता है, जिसके जीतने की उम्मीद भीड़ करती है. अब हिंदुस्तान को खुद को वही चेहरा बनाना होगा. (ये लेखक के निजी विचार हैं.)

The post तेज वित्तीय स्थिति, कमजोर शेयर बाजार,पढ़ें-प्रभु चावला का आलेख appeared first on Naya Vichar.

Spread the love

विनोद झा
संपादक नया विचार

You have been successfully Subscribed! Ops! Something went wrong, please try again.

About Us

नयाविचार एक आधुनिक न्यूज़ पोर्टल है, जो निष्पक्ष, सटीक और प्रासंगिक समाचारों को प्रस्तुत करने के लिए समर्पित है। यहां राजनीति, अर्थव्यवस्था, समाज, तकनीक, शिक्षा और मनोरंजन से जुड़ी हर महत्वपूर्ण खबर को विश्लेषणात्मक दृष्टिकोण के साथ प्रस्तुत किया जाता है। नयाविचार का उद्देश्य पाठकों को विश्वसनीय और गहन जानकारी प्रदान करना है, जिससे वे सही निर्णय ले सकें और समाज में सकारात्मक बदलाव ला सकें।

Quick Links

Who Are We

Our Mission

Awards

Experience

Success Story

© 2025 Developed By Socify

Scroll to Top