हिंदुस्तान में जब भी बिजली की बात होती है तो कोयले का जिक्र जरूर होता है. बहुत कम लोग जानते होंगे कि हिंदुस्तान में सबसे पहले कोयले के व्यवसायीकरण या कहें कि कमर्शियल यूज शुरू करने का श्रेय टैगोर परिवार को जाता है. उन्होंने लगभग दो सदी पहले ही समझ लिया था कि कोयले का खनन करना तो बस आधा काम है. असली चुनौती तो उसे एक जगह से दूसरी जगह तक पहुंचाने में है, जो आज के समय में सप्लाई चेन की बनी मुसीबत के लिए सीख है, क्योंकि खदानों के मुहाने पर कोयले का ढेर लगाने से कुछ नहीं होगा जब तक उसे इंडस्ट्री तक ना पहुंचा दिया जाए…
कोयले का व्यवसायीकरण करने वाली हिंदुस्तान की पहली कंपनी कौन सी थी?
जहां नोबेल पुरस्कार विजेता रवींद्रनाथ टैगोर ने हिंदुस्तानीय साहित्य को एक नई दिशा दी, वहीं उनके दादा, प्रिंस द्वारकानाथ टैगोर ने हिंदुस्तानीय कॉर्पोरेट पूंजीवाद की नींव रखी. साल 1835 में, द्वारकानाथ ने अपनी कंपनी ‘कार, टैगोर एंड कंपनी’ के जरिए रानीगंज में कोयला निकालने का काम संभाला. 1843 में, यह कंपनी ‘गिलमोर, होमफ्रे एंड कंपनी’ के साथ मिलकर ‘बंगाल कोल कंपनी लिमिटेड’ बनी, जो हिंदुस्तान का पहला जॉइंट-स्टॉक कोयला उद्यम था. रानीगंज हिंदुस्तान के पश्चिम बंगाल राज्य के पश्चिम बर्धमान जिले में एक इलाका और औद्योगिक शहर है, जो आसनसोल नगर निगम में आता है. ऐतिहासिक रानीगंज कोलफील्ड के केंद्र में स्थित है.
टैगोर परिवार का यह कारोबार इसलिए सफल नहीं हुआ कि वे जमीन से कोयला निकालते थे, बल्कि इसलिए कि उन्होंने उस दौर में परिवहन के क्षेत्र में आए बड़े बदलावों जैसे स्टीमशिप (भाप से चलने वाले जहाज) और हिंदुस्तानीय रेलवे के बढ़ते नेटवर्क का पूरा फायदा उठाया. आज, खदानों से कोयला निकलने और उसे एक जगह से दूसरी जगह पहुंचाने (लॉजिस्टिक्स) के बीच का यह 191 साल पुराना रिश्ता, हिंदुस्तान की व्यापक आर्थिक व्यवस्था (मैक्रोइकॉनॉमिक सिस्टम) के लिए सबसे बड़ी रुकावट बन गया है.
एक सदी से भी अधिक समय तक, घरेलू खपत की जरूरतों को पूरा करने के लिए इस क्षेत्र में निजी उद्यमों का दबदबा रहा. हालांकि, जैसे-जैसे हिंदुस्तान का लौह और इस्पात उद्योग तेजी से बढ़ा, निजी खदान मालिकों के लिए व्यवस्थित और वैज्ञानिक तरीके से खनन करने के लिए जरूरी पूंजी निवेश जुटाना मुश्किल हो गया.
दुनिया की सबसे बड़ी कोयला कंपनी
अवैज्ञानिक खनन तरीकों और मजदूरों की खराब स्थितियों को लेकर पैदा हुई चिंताओं के कारण, केंद्र प्रशासन ने 1971 और 1973 के बीच दो चरणों में कोयला क्षेत्र का राष्ट्रीयकरण कर दिया. इस बड़े बदलाव के परिणामस्वरूप 1975 में ‘कोल इंडिया लिमिटेड’ (CIL) का गठन हुआ.
आज, CIL दुनिया की सबसे बड़ी कोयला उत्पादक कंपनी है. यह अपनी आठ सहायक कंपनियों (जिनमें ईस्टर्न कोलफील्ड्स सैंक्टोरिया और सेंट्रल कोलफील्ड्स रांची शामिल हैं) के माध्यम से देश के कुल कोयला उत्पादन के 85% हिस्से को नियंत्रित करती है.
हिंदुस्तान के पास दुनिया का पांचवां सबसे बड़ा कोयला भंडार है और वैश्विक स्तर पर बिजली उत्पादन का 42% हिस्सा कोयले से ही आता है फिर भी, टैगोर परिवार द्वारा 191 साल पहले सामने लाई गई. हिंदुस्तान अपनी विशाल ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने की कोशिश कर रहा है, लेकिन कोयले के परिवहन की बुनियादी चुनौती जिसे 1843 में बंगाल कोल कंपनी ने पहली बार पार किया था. आज भी देश के बिजली बुनियादी ढांचे के लिए सबसे बड़ी बाधा बनी हुई है.
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