Amitabh Bachchan Birthday Special: कभी जिस सुपरस्टार की एक झलक पाने के लिए भीड़ उमड़ पड़ती थी, एक वक्त ऐसा आया जब उनके घर के बाहर कर्जदार खड़े रहते थे. जिस आवाज पर सिनेमाघरों में तालियां गूंजती थीं, उसी आवाज के मालिक को अपना करियर बचाने के लिए काम मांगना पड़ा. राजीव गांधी से दोस्ती, बोफोर्स विवाद, फ्लॉप फिल्मों और फिर करीब 90 करोड़ रुपये के कर्ज तक पहुंची अमिताभ बच्चन की जिंदगी किसी फिल्मी पटकथा से कम नहीं रही. लेकिन उनकी कहानी का सबसे बड़ा मोड़ कोई सुपरहिट फिल्म नहीं, बल्कि वह फैसला था, जब उन्होंने अपने स्टारडम को किनारे रखकर निर्देशक यश चोपड़ा से काम मांगा.
11 अक्टूबर को अमिताभ बच्चन अपना जन्मदिन मनाते हैं. इस मौके पर आइए जानते हैं उस महानायक की कहानी, जिसने शोहरत के शिखर से गिरने के बाद दोबारा उठना सीखा.
जब अमिताभ बच्चन के नाम से चलता था बॉक्स ऑफिस
साल 1970 और 1980 का दशक. हिंदी सिनेमा में अमिताभ बच्चन का ऐसा दौर था, जब उन्हें एंग्री यंग मैन कहा जाने लगा था. ‘जंजीर’, ‘दीवार’, ‘शोले’, ‘डॉन’ और ‘मुकद्दर का सिकंदर’ जैसी फिल्मों ने उन्हें आम आदमी के गुस्से, संघर्ष और बदले की आवाज बना दिया था.
नेतृत्व में उनका सफर ज्यादा लंबा नहीं चला. जुलाई 1987 में उन्होंने लोकसभा की सदस्यता से इस्तीफा दे दिया. सियासत से दूरी बनाकर वह फिल्मों में लौटे, लेकिन अब चुनौतियां कम नहीं थीं. वह दौर पीछे छूट चुका था, जब सिर्फ अमिताभ बच्चन का नाम किसी फिल्म की सफलता की गारंटी माना जाता था. उनकी जिंदगी में अब एक नया संघर्ष इंतजार कर रहा था.
जब फ्लॉप फिल्मों ने हिला दिया सुपरस्टार का सिंहासन
अमिताभ की वापसी के साथ उम्मीदें बहुत थीं. 1988 में ‘शहंशाह’ को सफलता मिली, लेकिन इसके बाद ‘तूफान’, ‘जादूगर’ और ‘गंगा जमुना सरस्वती’ जैसी फिल्मों ने वैसी कामयाबी नहीं दिलाई, जिसकी उनसे उम्मीद की जाती थी.
जिस अभिनेता ने हिंदी सिनेमा में अपनी अलग पहचान बनाई थी, उसके करियर पर सवाल उठने लगे. अमिताभ ने बाद के वर्षों में लगातार काम किया, लेकिन 1990 के दशक में उनकी लोकप्रियता और फिल्मों की कामयाबी में उतार-चढ़ाव जारी रहा.
एक जरूरी तथ्य: अमिताभ के खुद के पुराने इंटरव्यू के मुताबिक, वह यश चोपड़ा के पास जाकर काम मांगने पहुंचे थे. इस घटना को फोन कॉल के रूप में बताने का स्पष्ट आधार नहीं मिलता. इसलिए कहानी का असली और प्रमाणित मोड़ यही है कि उन्होंने खुद पहल की और काम मांगा. स्टारडम का ईगो छोड़ना ही उनकी वापसी की सबसे बड़ी सीख बनी.
फिर टीवी पर उतरे अमिताभ और बदल गई कहानी
साल 2000 में ही अमिताभ बच्चन ने ‘कौन बनेगा करोड़पति’ के साथ टेलीविजन की दुनिया में कदम रखा. उस वक्त यह फैसला भी जोखिम भरा था. बड़े फिल्मी सितारे आम तौर पर टीवी को अपने करियर के लिए जरूरी मंच नहीं मानते थे. लेकिन अमिताभ ने इस मौके को स्वीकार किया.
KBC ने उन्हें दर्शकों के घरों तक पहुंचाया. अब लोग उन्हें सिर्फ पर्दे पर लड़ने वाले नायक के रूप में नहीं, बल्कि सवाल पूछने, लोगों की कहानियां सुनने और उनके संघर्ष से जुड़ने वाले व्यक्तित्व के रूप में भी देखने लगे.
इस शो ने उनकी आर्थिक स्थिति संभालने और करियर को दोबारा मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. अमिताभ ने अपने इंटरव्यू में माना था कि KBC ने उन्हें कर्ज चुकाने में मदद की. उन्होंने अपनी देनदारियों को लौटाने को अपनी जिम्मेदारी बताया. उनकी वापसी किसी एक फिल्म की कामयाबी नहीं, बल्कि लगातार काम करने और जिम्मेदारियों से पीछे न हटने का नतीजा थी.
अमिताभ बच्चन की कहानी का सबसे बड़ा सबक
अमिताभ बच्चन की जिंदगी में शोहरत भी आई, विवाद भी आए, असफलताएं भी मिलीं और आर्थिक संकट भी. बोफोर्स विवाद ने उनकी सार्वजनिक छवि को प्रभावित किया, ABCL की नाकामी ने उन्हें भारी कर्ज में डाल दिया और फिल्मों के उतार-चढ़ाव ने उनके स्टारडम को चुनौती दी.
लेकिन उन्होंने काम से मुंह नहीं मोड़ा. यश चोपड़ा से काम मांगना और KBC को स्वीकार करना दो ऐसे फैसले थे, जिन्होंने उनके करियर को नई दिशा दी.
आज अमिताभ बच्चन का नाम सिर्फ ‘एंग्री यंग मैन’ या ‘सदी के महानायक’ के रूप में नहीं लिया जाता. उनकी कहानी इस बात की भी मिसाल है कि सफलता के बाद असफलता आना अंत नहीं होता. कभी-कभी आगे बढ़ने के लिए सबसे जरूरी कदम यही होता है कि इंसान अपने पुराने रुतबे को भूलकर फिर से काम शुरू करे.
जिस अमिताभ बच्चन को कभी दुनिया महानायक कहती थी, उन्होंने मुश्किल वक्त में खुद को एक बार फिर कलाकार बनकर साबित किया. शायद यही उनकी जिंदगी का सबसे बड़ा कमबैक है.
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