Bihar News: बिहार विधानसभा के बजट सत्र की आज से शुरूआत हुई. सेंट्रल हॉल में राज्यपाल का अभिभाषण होगा. वहीं प्रशासन की ओर से आर्थिक सर्वेक्षण पेश किया जाएगा. आम बजट से ठीक पहले पेश हुए आर्थिक सर्वेक्षण ने बिहार की वित्तीय स्थिति को ऐसा आईना दिखाया है, जिसने सत्ता और विपक्ष दोनों को असहज कर दिया है.
सर्वेक्षण के मुताबिक, प्रति व्यक्ति आय के मामले में बिहार देश का सबसे गरीब राज्य साबित हुआ है. इस खुलासे के बाद सवाल सिर्फ आंकड़ों तक सीमित नहीं रहे, बल्कि सीधे 20 साल की नेतृत्वक हुकूमत पर जा टिके हैं.
आर्थिक सर्वेक्षण की दो तस्वीरें
सर्वेक्षण यह भी बताता है कि बिहार पूरी तरह ठहरा हुआ राज्य नहीं है. वर्ष 2024-25 में राज्य का सकल घरेलू उत्पाद वर्तमान मूल्य पर करीब 8 लाख करोड़ रुपये आंका गया है. विकास दर 13.07 फीसदी रही है, जो देश के 22 राज्यों से अधिक है.
लेकिन चिंता की बात यह है कि बिहार अपनी ही पिछली तीन वर्षों की विकास रफ्तार से फिसल गया है. यानी विकास हो रहा है, मगर अपेक्षित गति नहीं पकड़ पा रहा.
इन्हीं आंकड़ों को आधार बनाकर राष्ट्रीय जनता दल ने नीतीश प्रशासन पर तीखा हमला बोला है. राजद प्रवक्ता शक्ति यादव का कहना है कि जब पिछले 20 वर्षों से सत्ता की कमान एक ही नेतृत्व के हाथ में है, तो हर नाकामी का दोष पिछली प्रशासनों पर डालना अब स्वीकार्य नहीं है. अगर दो दशक बाद भी बिहार सबसे गरीब राज्य है, तो इसकी जिम्मेदारी तय होनी चाहिए.
बिहार में प्रति व्यक्ति आय प्रतिदिन मात्र 150 से 190 रुपये है, जो देश में सबसे निचले पायदान पर है। नीतीश जी बताएं कि पिछले 20 वर्षों में कैसा विकास हुआ? शिक्षा और स्वास्थ्य में हम सबसे नीचे हैं और पलायन में सबसे अव्वल। ई-श्रम पोर्टल के आंकड़े गवाह हैं कि लगभग 2 करोड़ 90 लाख…
— Shakti Singh Yadav (@sshaktisinghydv) January 30, 2026
जदयू का बचाव- संदर्भ में देखें आंकड़े
सत्ताधारी जदयू विपक्ष के आरोपों को सिरे से खारिज कर रही है. जदयू प्रवक्ता नीरज कुमार का कहना है कि नीतीश कुमार ने ‘माइंस में पड़े बिहार’ को बाहर निकाला है. उनके मुताबिक, शिक्षा, स्वास्थ्य और सामाजिक सुधारों में बिहार ने बड़ी छलांग लगाई है और आर्थिक सर्वेक्षण के आंकड़ों को व्यापक संदर्भ में देखना चाहिए.
आर्थिक सर्वेक्षण की रिपोर्ट ने बिहार की नेतृत्व को एक बार फिर कठघरे में खड़ा कर दिया है. एक तरफ गरीबी का कठोर सच है, दूसरी ओर विकास की उम्मीदें. सवाल यही है कि क्या ये आंकड़े आने वाले चुनावों में बड़ा मुद्दा बनेंगे, या फिर बहस सिर्फ बयानबाजी तक सीमित रह जाएगी. लेकिन आम जनता के मन में गूंजता सवाल अब और तेज हो गया है. बीस साल में क्या वाकई बिहार की किस्मत बदली?
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