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टैरिफ मुक्त डिजिटल व्यापार से ग्लोबल साउथ को नुकसान, पढ़ें डॉ अश्विनी महाजन का आलेख

Digital Trade: वर्ष 1998 में, विश्व व्यापार संगठन (डब्ल्यूटीओ) के सदस्य देशों ने वैश्विक इलेक्ट्रॉनिक कॉमर्स की घोषणा को अपनाया था और इलेक्ट्रॉनिक ट्रांसमिशन पर कस्टम ड्यूटी न लगाने की प्रथा को जारी रखने पर सहमति जतायी थी. हालांकि यह रोक अगली मंत्रिस्तरीय बैठक शुरू होने तक के लिए एक अस्थायी प्रावधान थी. पर डब्ल्यूटीओ की हर मंत्रिस्तरीय बैठक में इस रोक को अगली बैठक तक के लिए बढ़ाया जाता रहा है. इस बार भी इस पर सहमति नहीं बन पायी. डब्ल्यूटीओ का 14वां मंत्रिस्तरीय सम्मेलन, जिसका आयोजन कैमरून में (26-29 मार्च तक) हुआ, इ-ट्रांसमिशन पर कस्टम ड्यूटी पर रोक को लेकर बिना सर्वसम्मति के ही समाप्त हो गया. डब्ल्यूटीओ में इलेक्ट्रॉनिक ट्रांसमिशन पर लगी रोक एक ऐसा प्रावधान है, जो देशों को इंटरनेट के जरिये इलेक्ट्रॉनिक रूप से भेजे जाने वाले डिजिटल उत्पादों पर टैरिफ लगाने से रोकता है. जब डब्ल्यूटीओ शुरू हुआ था, तब इलेक्ट्रॉनिक उत्पादों का व्यापार सीमित था. सो, इलेक्ट्रॉनिक उत्पादों के व्यापार पर लगने वाले टैरिफ को कुछ समय के लिए रोक दिया गया था.

वर्ष 1998 में डब्ल्यूटीओ के दूसरे मंत्रिस्तरीय सम्मेलन में यह तय किया गया कि विकासशील देशों की विकास संबंधी जरूरतों को ध्यान में रखते हुए वैश्विक इलेक्ट्रॉनिक व्यापार से जुड़े मुद्दों का अध्ययन किया जाये. यह प्रस्ताव भी रखा गया कि इलेक्ट्रॉनिक उत्पादों पर लगने वाले टैरिफ को अगले मंत्रिस्तरीय सम्मेलन तक के लिए टाल दिया जाये. पर अमेरिका, यूरोपीय संघ और चीन जैसे देश, इलेक्ट्रॉनिक ट्रांसमिशन पर लगने वाले सीमा शुल्क पर डब्ल्यूटीओ की इस रोक को स्थायी (या अनिश्चित काल के लिए) बनाये रखने की लगातार कोशिश कर रहे हैं. डिजिटल उत्पादों के आयात के लिए सबसे ज्यादा माना जाने वाला पैमाना है डिजिटल रूप से दी जाने वाली सेवाएं, जैसे सॉफ्टवेयर, क्लाउड, ओटीटी, डाटा, डिजाइन, फिनटेक आदि. नीति आयोग के अनुमानों के मुताबिक, हिंदुस्तान ने 2024 में 116.9 अरब डॉलर की डिजिटल सेवाएं आयात कीं, जो पिछले वर्षों के 41.4 अरब डॉलर से बहुत अधिक है.

इ-ट्रांसमिशन पर डब्ल्यूटीओ की रोक का राजस्व पर बहुत असर पड़ रहा है, क्योंकि इलेक्ट्रॉनिक ट्रांसमिशन, जैसे सॉफ्टवेयर डाउनलोड, इ-बुक्स, फिल्में, क्लाउड सेवाएं आदि, पर कोई कस्टम ड्यूटी नहीं लगती. वर्ष 2017 में राजस्व के इस नुकसान का अनुमान 50 करोड़ डॉलर लगाया गया था, लेकिन अब स्ट्रीमिंग, डिजिटल फिल्में, किताबें, एआइ टूल्स, गेमिंग आदि के आयात में जबरदस्त वृद्धि के कारण यह नुकसान कहीं अधिक होने की संभावना है. उधर अमेरिका यूरोपीय संघ और जापान के साथ मिलकर टैरिफ मुक्त डिजिटल व्यापार को बनाये रखने के लिए इस रोक को स्थायी रूप से अपनाने की पैरवी भी कर रहा है. अमेरिका की ओर से पहला तर्क यह है कि डिजिटल टैरिफ वैश्विक डिजिटल व्यापार में बाधा डालेंगे. दूसरा, इससे व्यवसायों और उपभोक्ताओं के लिए लागत बढ़ सकती है. तीसरा, यह वैश्विक डिजिटल वित्तीय स्थिति को खंडित कर देगा.

इ-ट्रांसमिशन पर कस्टम ड्यूटी पर रोक समाप्त होना इसलिए जरूरी है, क्योंकि इससे राजस्व का भारी नुकसान होता है, क्योंकि हिंदुस्तान सहित विकासशील देश इ-प्रोडक्ट्स (डिजिटल प्रोडक्ट्स) के नेट इंपोर्टर है. दूसरा, हमारे स्टार्ट-अप और सॉफ्टवेयर कंपनियां कई तरह के इलेक्ट्रॉनिक प्रोडक्ट्स बनाने में सक्षम हैं. हम अपने ही देश में फिल्में और दूसरे मनोरंजन प्रोडक्ट्स बना सकते हैं. पर जब ऐसे सभी प्रोडक्ट्स बिना किसी रोक-टोक के, बिना टैरिफ के आयात किये जाते हैं, तो उन्हें देश में बनाने का प्रोत्साहन कम हो जाता है. इ-प्रोडक्ट्स पर टैरिफ लगाने पर लगी रोक असल में ‘आत्मनिर्भर हिंदुस्तान’ के प्रयासों को खत्म कर रही है.

तीसरा, स्वास्थ्य, फिनटेक, सार्वजनिक सेवाओं और कई अन्य क्षेत्रों में अनेक डिजिटल उत्पाद, जिनमें एआइ आदि शामिल हैं, इन सेवाओं की मांग के तरीकों को बदल रहे हैं. यदि इन पर नये तरीकों से टैक्स नहीं लगाया गया, तो इसका प्रशासन के वित्त पर बुरा असर पड़ सकता है. साथ ही, इन डिजिटल उत्पादों को देश के अंदर बनाने में भी रुकावटें आ सकती हैं. चौथा, कुछ डिजिटल उत्पाद हैं, जो तेजी से भौतिक उत्पादों की जगह ले रहे हैं. थ्री-डी प्रिंटिंग के बड़े पैमाने पर इस्तेमाल से ऑटो पार्ट्स, मेडिकल डिवाइस, खिलौने और मशीनरी के पुर्जों जैसे उत्पादों का व्यापार, सामान के बजाय डिजाइन फाइलों के रूप में किया जा सकता है. राजस्व नुकसान के अतिरिक्त यह हमारी मैन्युफैक्चरिंग क्षमता को भी घटा सकता है. इसलिए यह मुद्दा ‘ग्लोबल साउथ’ (विकासशील देशों) के नजरिये से बहुत अहम है. क्योंकि विकसित देश इन डिजिटल उत्पादों के मुख्य निर्यातक हैं, जबकि विकासशील देश इनके मुख्य आयातक. (ये लेखक के निजी विचार हैं.)

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विनोद झा
संपादक नया विचार

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