Adhik Masik Durgashtami 2026: हिंदू पंचांग के अनुसार, प्रत्येक माह के शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि को ‘मासिक दुर्गाष्टमी’ मनाई जाती है. यह पावन दिन शक्ति की अधिष्ठात्री देवी मां दुर्गा को समर्पित होता है. ज्येष्ठ माह में अधिकमास (पुरुषोत्तम मास) के संयोग के कारण इस पर्व को ‘अधिकमासिक दुर्गाष्टमी’ कहा जाएगा. धार्मिक मान्यता है कि जो भी भक्त इस दिन सच्चे मन से मां दुर्गा की पूजा करता है, उसके जीवन से दुख-कष्ट दूर होते हैं और सुख-समृद्धि आती है. पूजा के दौरान व्रत कथा का पाठ करना अत्यंत शुभ माना जाता है. कहा जाता है कि कथा-पाठ से मां दुर्गा प्रसन्न होती हैं और अपना आशीर्वाद प्रदान करती हैं.
व्रत कथा
महिषासुर का वरदान
पौराणिक कथा के अनुसार, प्राचीन काल में एक असुर के कारण तीनों लोकों में भय और अत्याचार का अंधकार फैल गया था. महिषासुर नामक शक्तिशाली असुर ने देवताओं को पराजित कर स्वर्ग पर अधिकार कर लिया था. महिषासुर कोई साधारण असुर नहीं था. उसने वर्षों तक कठोर तपस्या करके त्रिदेवों—ब्रह्मा, विष्णु और महेश को प्रसन्न किया और एक अनोखा वरदान प्राप्त किया था कि “कोई भी देवता, दानव या पुरुष उसे युद्ध में कभी पराजित नहीं कर सकेगा.”
इस वरदान के अहंकार में चूर होकर वह स्वयं को सर्वशक्तिमान समझने लगा. उसकी सेना ने निर्दोषों और ऋषि-मुनियों पर अत्याचार करना शुरू कर दिया. तब देवराज इंद्र सहित सभी देवता अपनी रक्षा के लिए त्रिदेवों की शरण में पहुंचे. देवताओं की पीड़ा देखकर भगवान शिव, विष्णु और ब्रह्मा अत्यंत क्रोधित हुए.
आदिशक्ति का प्राकट्य
अधर्म के नाश और देवताओं के कष्टों के निवारण हेतु त्रिदेवों के शरीर से एक दिव्य ऊर्जा (तेज) प्रकट हुई. धीरे-धीरे सभी देवताओं का तेज भी उस ऊर्जा में समाहित हो गया. इस परम तेज के मिलन से जगत जननी मां आदिशक्ति दुर्गा का प्राकट्य हुआ.
मां दुर्गा का दिव्य स्वरूप
मां दुर्गा का स्वरूप अत्यंत दिव्य और अद्भुत था. उनके मुखमंडल की आभा से संपूर्ण ब्रह्मांड प्रकाशित हो उठा. उनके शांत और ओजस्वी रूप को देखकर देवताओं का खोया हुआ विश्वास पुनः जागृत हो गया. सभी देवताओं ने उन्हें नमन किया. इसके बाद देवताओं ने मां दुर्गा को अपने-अपने दिव्य अस्त्र-शस्त्र प्रदान किए. भगवान शिव ने त्रिशूल दिया, भगवान विष्णु ने सुदर्शन चक्र, अग्निदेव ने शक्ति और पवनदेव ने धनुष-बाण प्रदान किए. अस्त्र-शस्त्रों से सुसज्जित होकर और सिंह पर सवार होकर मां दुर्गा महिषासुर का अंत करने के लिए युद्धभूमि की ओर प्रस्थान कर गईं.
महिषासुर का अंत
युद्धभूमि में पहुंचकर मां दुर्गा ने ‘रणचंडी’ का रौद्र रूप धारण किया. उनके शंखनाद और सिंह की दहाड़ से तीनों लोक कांप उठे. महिषासुर की विशाल सेना मां के सामने तिनके की तरह बिखरने लगी. महिषासुर ने अनेक रूप बदलकर मां को पराजित करने का प्रयास किया, लेकिन आदिशक्ति के सामने उसकी एक न चली. अंततः मां दुर्गा ने अपने त्रिशूल से उसके हृदय पर प्रहार कर उसका वध कर दिया और संसार में पूर्ण शांति की स्थापना की.
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