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Tribalpedia: आदिवासी कला डिजिटल हुई, लेकिन अधिकार किसका हुआ? Part 1

किसी आदिवासी चित्र को संग्रहालय की दीवार से उठाकर डिजिटल स्क्रीन पर लाना पहली नजर में संरक्षण का काम लगता है.

तस्वीर सुरक्षित रहेगी, दुनिया उसे देख सकेगी और शायद कलाकार की परंपरा को नई पहचान भी मिलेगी.

लेकिन सवाल यह है कि उस चित्र को डिजिटल बनाने का अधिकार किसके पास है?

मान लीजिए किसी गांव की एक पारंपरिक चित्रकला पीढ़ियों से समुदाय के साथ जीवित है. उसे किसी संस्था ने स्कैन किया, ऑनलाइन संग्रह में डाल दिया और कुछ समय बाद वही तस्वीर दुनिया भर की वेबसाइटों, किताबों या व्यावसायिक उत्पादों में दिखाई देने लगी.

समुदाय के पास न अनुमति देने का अधिकार था, न कमाई में हिस्सा और न ही यह तय करने की ताकत कि उसकी कला को किस संदर्भ में दिखाया जाए.

यहीं से संरक्षण और सांस्कृतिक कब्जे के बीच की रेखा धुंधली होने लगती है.

हिंदुस्तान में जादोपाटिया चित्रकला, वारली कला, पारंपरिक नृत्य, अनुष्ठान और मौखिक परंपराओं का डिजिटल दस्तावेजीकरण तेजी से बढ़ा है. इसका उद्देश्य सांस्कृतिक विरासत को बचाना है. लेकिन जब किसी समुदाय की अनुमति और profit-sharing के बिना उसकी कला को डिजिटल संग्रह में रखा जाता है, तो संरक्षण का यह प्रयास digital extraction यानी संस्कृति से डेटा निकालने की प्रक्रिया जैसा दिखाई देने लगता है.

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समस्या सिर्फ तस्वीर की नहीं, अधिकार की है

आदिवासी कला को लेकर सबसे बड़ी कानूनी दिक्कत यह है कि हिंदुस्तानीय कॉपीराइट कानून मुख्य रूप से एक ऐसे लेखक की कल्पना करता है, जिसकी पहचान की जा सके.

लेकिन आदिवासी कला अक्सर किसी एक व्यक्ति की रचना नहीं होती.

वह समुदाय की सामूहिक स्मृति होती है.

एक पीढ़ी उसे दूसरी पीढ़ी को देती है. उसके रंग, आकृतियां, प्रतीक और तकनीक किसी एक कलाकार की निजी संपत्ति नहीं, बल्कि लंबे सामाजिक और सांस्कृतिक अनुभव का हिस्सा होते हैं.

यही कारण है कि ऐसी कला को कई बार बिना लेखक या सामुदायिक संपत्ति मान लिया जाता है.

फिर उसे संग्रहालय, विश्वविद्यालय या निजी संस्थाएं डिजिटल रूप में संग्रहित और इस्तेमाल कर सकती हैं.

लेकिन यहां एक बुनियादी सवाल खड़ा होता है- अगर किसी रचना का कोई एक लेखक नहीं है, तो क्या उसका कोई मालिक भी नहीं है?

यह सवाल इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि सुप्रीम कोर्ट ने Eastern Book Company v. D.B. Modak मामले में मौलिकता को बहुत कठोर अर्थ में देखने के बजाय कम रचनात्मकता की कसौटी को स्वीकार किया था.

यानी कानून यह मानता है कि रचनात्मकता हमेशा असाधारण या पूरी तरह नई होने की जरूरत नहीं है. फिर सामुदायिक रचनात्मकता को उसी नजर से देखने में कठिनाई क्यों होनी चाहिए?

डिजिटल दुनिया में कला की ‘दूसरी जिंदगी’

डिजिटाइजेशन केवल किसी चित्र की फोटो खींचना नहीं है.

हाई-रेजोल्यूशन स्कैन, ऑनलाइन कैटलॉग और डिजिटल संग्रह किसी जीवित सांस्कृतिक अभिव्यक्ति को ऐसी डिजिटल वस्तु में बदल देते हैं, जिसे आसानी से खोजा, कॉपी किया और दोबारा इस्तेमाल किया जा सकता है.

यहीं शक्ति का संतुलन भी बदल जाता है.

जिस कला पर पहले समुदाय का सांस्कृतिक नियंत्रण था, उसके डिजिटल संस्करण पर नियंत्रण किसी संग्रहालय, विश्वविद्यालय या ऑनलाइन प्लेटफॉर्म के पास जा सकता है.

वह संस्था तय कर सकती है कि सामग्री कौन देखेगा, किसे लाइसेंस मिलेगा और उसका व्यावसायिक इस्तेमाल कैसे होगा.

इसे एक छोटे से उदाहरण से समझिए.

किसी गांव का कुआं अगर गांव के लोगों का है, तो उसकी तस्वीर लेने से कुएं का मालिकाना हक नहीं बदलता. लेकिन अगर उसी तस्वीर के आधार पर पानी के अधिकार, पहुंच और उपयोग पर कोई बाहरी संस्था नियंत्रण करने लगे, तो मामला बदल जाता है.

डिजिटल संस्कृति के साथ भी कुछ ऐसा ही हो सकता है.

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‘आइडिया’ नहीं, जीवित अभिव्यक्ति

कॉपीराइट कानून विचार और उसकी अभिव्यक्ति में अंतर करता है.

R.G. Anand v. Deluxe Films मामले में सुप्रीम कोर्ट ने भी कॉपीराइट की सुरक्षा को विचार के बजाय उसकी ठोस अभिव्यक्ति से जोड़ा.

आदिवासी कला के मामले में समस्या तब पैदा होती है, जब किसी पूरी परंपरा को सिर्फ स्टाइल, थीम या सांस्कृतिक विचार मान लिया जाता है.

जबकि वास्तविक चित्र, तकनीक, प्रतीक और सामाजिक संदर्भ ठोस अभिव्यक्तियां हो सकते हैं.

स्रोत सामग्री का तर्क है कि यदि इन्हें सही कानूनी दृष्टि से देखा जाए, तो आदिवासी कला को संरक्षण की अधिक मजबूत जमीन मिल सकती है.

संविधान में संस्कृति, लेकिन डिजिटल सहमति कहां?

हिंदुस्तान का संविधान समुदायों की विशिष्ट संस्कृति को बनाए रखने के अधिकार को पहचानता है.

अनुच्छेद 29 सांस्कृतिक पहचान की रक्षा से जुड़ा है. वहीं अनुच्छेद 21 की व्यापक न्यायिक व्याख्या में गरिमा और स्वायत्तता जैसे अधिकार शामिल किए गए हैं.

Puttaswamy फैसले के बाद निजता (privacy) और अपने डेटा पर नियंत्रण (data protection) का सवाल भी संवैधानिक विमर्श का हिस्सा बना है.

यहां से एक नया प्रश्न निकलता है- अगर व्यक्ति को अपने निजी डेटा पर नियंत्रण का अधिकार है, तो क्या समुदाय को अपनी सामूहिक सांस्कृतिक जानकारी पर नियंत्रण का अधिकार नहीं होना चाहिए?

आदिवासी कला का डिजिटलीकरण बिना अनुमति के होने पर समुदाय यह तय नहीं कर पाता कि उसकी सांस्कृतिक अभिव्यक्ति डिजिटल दुनिया में कैसे जाए, किस रूप में प्रस्तुत हो और उसका इस्तेमाल कौन करे.

स्रोत सामग्री इसी कमी को हिंदुस्तानीय कानून की बड़ी खामी के रूप में देखती है.

जैव विविधता कानून से मिल सकता है रास्ता

हिंदुस्तान के जैव विविधता कानून में एक दिलचस्प रास्ता दिखाई देता है.

Biological Diversity Act, 2002 जैव संसाधनों और पारंपरिक ज्ञान के इस्तेमाल को समुदायों की सहमति और लाभ-साझेदारी से जोड़ता है. इसका मतलब यह है कि कानून यह मानता है कि आदिवासी और स्थानीय समुदाय केवल ज्ञान के स्रोत नहीं हैं, बल्कि उस ज्ञान के अधिकार रखने वाले संरक्षक भी हैं.

यही बात कला पर भी लागू की जा सकती है.

अगर किसी समुदाय की पारंपरिक औषधीय जानकारी के इस्तेमाल पर उसकी सहमति जरूरी मानी जाती है, तो उसकी सांस्कृतिक कला के व्यावसायिक और डिजिटल इस्तेमाल पर ऐसी व्यवस्था क्यों नहीं हो सकती?

Orissa Mining Corporation Ltd. v. Ministry of Environment & Forests मामले में सुप्रीम कोर्ट ने आदिवासी समुदायों को उनके पवित्र स्थलों से जुड़े फैसलों में महत्वपूर्ण भूमिका दी थी.

स्रोत सामग्री इस न्यायिक दृष्टिकोण को सांस्कृतिक संसाधनों तक विस्तार देने की जरूरत बताती है.

to be continued…

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विनोद झा
संपादक नया विचार

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