हिंदुस्तान छोड़ो आंदोलन – 1: .
इसलिए क्रिप्स मिशन, कांग्रेस और मुस्लिम लीग के बीच समझौते का रास्ता नहीं बना सका.
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दूसरी आवाजें भी प्रस्ताव के खिलाफ थीं
क्रिप्स प्रस्ताव की आलोचना केवल कांग्रेस और मुस्लिम लीग ने नहीं की.
हिंदू महासभा ने भी प्रांतों को अलग होने का विकल्प देने का विरोध किया.
सिख नेताओं को आशंका थी कि पंजाब के भविष्य पर इसका गंभीर असर पड़ सकता है.
कुछ उदारवादी नेताओं ने भी हिंदुस्तान को एक से अधिक संघों में बांटने की संभावना को खतरनाक माना.
दलित समुदायों की ओर से भी यह चिंता सामने आई कि उनके हितों की पर्याप्त सुरक्षा का स्पष्ट प्रावधान नहीं था.
इस तरह प्रस्ताव के सामने नेतृत्वक असहमति का दायरा बहुत व्यापक था.
असली समस्या थी भरोसे की कमी
क्रिप्स मिशन की असफलता को केवल प्रस्ताव की कुछ शर्तों से समझना पर्याप्त नहीं है.
इसके पीछे एक बड़ा सवाल विश्वास का था.
हिंदुस्तानीय नेताओं को संदेह था कि ब्रिटिश प्रशासन वास्तव में सत्ता हस्तांतरण के लिए तैयार है या युद्ध के समय हिंदुस्तानीय समर्थन हासिल करने के लिए नेतृत्वक आश्वासन दे रही है.
क्रिप्स मिशन ऐसे समय हिंदुस्तान आया था जब ब्रिटेन को तत्काल हिंदुस्तानीय सहयोग चाहिए था.
इसलिए हिंदुस्तानीय नेताओं के एक हिस्से को लगा कि आजादी का वादा भविष्य के लिए टाल दिया गया है, जबकि युद्ध में सहयोग की मांग तत्काल की जा रही है.
यही वजह थी कि मिशन की बातचीत करीब दो सप्ताह चली, लेकिन कोई समझौता नहीं हो सका.
क्रिप्स मिशन की विफलता और हिंदुस्तान छोड़ो आंदोलन
क्रिप्स मिशन मार्च-अप्रैल 1942 में आया और बिना किसी समझौते के वापस चला गया.
लेकिन इसकी विफलता का असर बहुत दूर तक गया.
कांग्रेस के भीतर यह भावना मजबूत हुई कि ब्रिटिश प्रशासन से केवल बातचीत और प्रस्तावों के जरिए तत्काल सत्ता हस्तांतरण की उम्मीद करना कठिन है.
दूसरी तरफ युद्ध की स्थिति लगातार बिगड़ रही थी. जापानी सेना हिंदुस्तान के पूर्वी हिस्से के करीब पहुंच रही थी.
ऐसे माहौल में हिंदुस्तानीय नेतृत्व भी निर्णायक मोड़ की ओर बढ़ रही थी.
कुछ ही महीनों बाद, अगस्त 1942 में कांग्रेस ने हिंदुस्तान छोड़ो आंदोलन का प्रस्ताव पारित किया.
महात्मा गांधी ने देश के सामने स्पष्ट संदेश रखा-
करो या मरो.
इस तरह क्रिप्स मिशन केवल एक असफल संवैधानिक बातचीत नहीं था. यह उस नेतृत्वक यात्रा की एक महत्वपूर्ण कड़ी बना, जिसने हिंदुस्तान को हिंदुस्तान छोड़ो आंदोलन तक पहुंचाया.
इतिहास में इसकी विडंबना यही रही कि जिस ब्रिटिश प्रशासन को युद्ध जीतने के लिए हिंदुस्तान का सहयोग चाहिए था, वह हिंदुस्तान के नेतृत्वक नेतृत्व को ऐसा भरोसा नहीं दे सकी कि युद्ध के बाद सत्ता वास्तव में हिंदुस्तानीयों के हाथ में होगी.
और जब भरोसे की वह आखिरी कोशिश भी विफल हुई, तो कुछ महीनों बाद हिंदुस्तानीय राष्ट्रीय आंदोलन ने बातचीत की मेज से उठकर सड़क का रास्ता पकड़ लिया.
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