9 अगस्त की सुबह…
कांग्रेस के प्रस्ताव के अगले ही दिन ब्रिटिश प्रशासन ने कार्रवाई कर दी.
9 अगस्त 1942 की सुबह गांधी और कांग्रेस कार्यसमिति के दूसरे प्रमुख नेताओं को गिरफ्तार कर लिया गया.
अखिल हिंदुस्तानीय कांग्रेस समिति और प्रांतीय कांग्रेस समितियों पर भी प्रतिबंध लगा दिया गया.
ब्रिटिश प्रशासन की रणनीति साफ थी-
अगर आंदोलन का नेतृत्व करने वाले नेता जेल में होंगे, तो आंदोलन को नियंत्रित करना आसान होगा.
लेकिन ब्रिटिश प्रशासन ने शायद जनता की प्रतिक्रिया का पूरा अनुमान नहीं लगाया था.
नेताओं की गिरफ्तारी के बाद आंदोलन खत्म होने के बजाय कई जगह और तेज हो गया.
हिंदुस्तान छोड़ो आंदोलन – 1:
इसी बीच मुस्लिम लीग ने पाकिस्तान की मांग को आगे बढ़ाया
हिंदुस्तान छोड़ो आंदोलन के दौरान हिंदुस्तानीय नेतृत्व का एक दूसरा महत्वपूर्ण पक्ष भी सामने आ रहा था.
कांग्रेस के नेताओं की गिरफ्तारी और ब्रिटिश प्रशासन के साथ उसके टकराव के बीच मुस्लिम लीग ने अपनी अलग नेतृत्वक दिशा बनाए रखी.
स्रोत सामग्री के अनुसार, 23 मार्च 1943 को मुस्लिम लीग ने पाकिस्तान दिवस मनाया. मोहम्मद अली जिन्ना ने मुस्लिम आबादी के लिए पाकिस्तान की मांग को अंतिम राष्ट्रीय लक्ष्य के रूप में प्रस्तुत किया. 26 अप्रैल को लीग के एक प्रस्ताव में भी इस दृष्टिकोण का समर्थन किया गया.
इस तरह 1942-43 का दौर केवल अंग्रेजों के खिलाफ संघर्ष का दौर नहीं था.
यह हिंदुस्तानीय नेतृत्व के भीतर अलग-अलग नेतृत्वक कल्पनाओं के मजबूत होने का समय भी था.
एक तरफ कांग्रेस तत्काल ब्रिटिश शासन की समाप्ति चाहती थी. दूसरी तरफ मुस्लिम लीग पाकिस्तान को अपने नेतृत्वक भविष्य के केंद्र में रख रही थी.
अगस्त क्रांति ने क्या बदला?
हिंदुस्तान छोड़ो आंदोलन तत्काल स्वतंत्रता नहीं दिला सका. ब्रिटिश प्रशासन ने इसे कठोर दमन से दबा दिया और कांग्रेस का शीर्ष नेतृत्व लंबे समय तक जेल में रहा.
लेकिन आंदोलन ने एक नेतृत्वक संदेश जरूर स्पष्ट कर दिया-
ब्रिटिश शासन अब हिंदुस्तानीय जनता की स्थायी स्वीकृति पर नहीं चल सकता था.
1942 के बाद स्वतंत्रता का सवाल केवल भविष्य की संवैधानिक योजना नहीं रहा. वह तत्काल नेतृत्वक मांग बन चुका था.
और शायद यही अगस्त क्रांति की सबसे बड़ी ऐतिहासिक विरासत थी.
8 अगस्त को प्रस्ताव पारित हुआ. 9 अगस्त को नेता गिरफ्तार हुए. लेकिन आंदोलन जेल की सलाखों के पीछे नहीं रुका- वह सड़कों पर फैल गया.
इसीलिए हिंदुस्तान छोड़ो आंदोलन की कहानी केवल एक प्रस्ताव, एक नारे या कुछ दिनों के विरोध की कहानी नहीं है.
यह उस क्षण की कहानी है जब नेतृत्व को गिरफ्तार किया जा सकता था, लेकिन स्वतंत्रता की मांग को नहीं.
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