जिस जेनरेशन के लिए कभी भगवान की कहानी का मतलब टीवी पर आने वाली रामायण या दादी-नानी की सुनाई कथा हुआ करता था, आज वही जेनरेशन थिएटर में ‘हनुमान अंश’ के लिए तालियां बजा रही है. सोशल मीडिया पर जय श्री राम लिखने से लेकर धार्मिक किरदारों के पोस्टर शेयर करने तक, आस्था अब सिर्फ पूजा की चीज नहीं रही, वह पॉप कल्चर का हिस्सा बन चुकी है. शायद यही वजह है कि ‘हनुमान अंश’ की सुपर सक्सेस के बाद बॉलीवुड का मूड तेजी से बदला है.
साईं बाबा, जगन्नाथ, खाटू श्याम, महाकाली से लेकर रामायण तक, धार्मिक कहानियों की लंबी लाइन लग गई है. दिलचस्प यह है कि जिन विषयों से कभी बड़े स्टार और मेकर्स यह सोचकर दूरी बनाते थे कि ‘आज की जेनरेशन इसे देखेगी कौन?’, अब उसी जेनरेशन को ध्यान में रखकर करोड़ों के प्रोजेक्ट तैयार हो रहे हैं. तो क्या बदल गया है- दर्शक या बॉलीवुड का नजरिया?
एक फिल्म चली और खुल गया आस्था का दरवाजा
बॉलीवुड के लिए यह कोई नई बात नहीं है कि एक फिल्म की सफलता के बाद उसी तरह की कई कहानियों पर काम शुरू हो जाए. कभी एक्शन का दौर आया. फिर गैंगस्टर फिल्में चलीं. कॉमेडी का ट्रेंड आया. कंटेंट सिनेमा ने जगह बनाई. अब धार्मिक और पौराणिक कहानियों की बारी दिखाई दे रही है.
‘हनुमान अंश’ की सफलता ने मेकर्स को सबसे बड़ा भरोसा यही दिया है कि धार्मिक विषय को अगर नए अंदाज में पेश किया जाए, तो आज का दर्शक उसे खारिज नहीं करेगा.
यही वजह है कि एक के बाद एक नए प्रोजेक्ट सामने आ रहे हैं. साईं बाबा, भगवान जगन्नाथ, खाटू श्याम, महाकाली और रामायण जैसे विषय बड़े पर्दे पर पहुंच रहे हैं. यानी भगवान अब सिर्फ मंदिर की घंटियों और टीवी स्क्रीन तक सीमित नहीं हैं. बॉलीवुड उन्हें सिनेमाघरों की सबसे बड़ी स्क्रीन पर लाने की तैयारी कर रहा है.
और इस बार फर्क सिर्फ फिल्मों की संख्या का नहीं है. फर्क यह भी है कि इन फिल्मों के साथ बड़े नाम और बड़े सितारे जुड़ रहे हैं.
कभी ‘धोती-कुर्ता और मुकुट’ से डरते थे स्टार
यह बदलाव अचानक नहीं आया है. हिंदुस्तानीय सिनेमा के इतिहास में धार्मिक फिल्मों की अपनी एक लंबी और मजबूत परंपरा रही है. शुरुआती दौर में पौराणिक फिल्में सिनेमा का अहम हिस्सा थीं. ‘राजा हरिश्चंद्र’ से लेकर ‘संतोषी मां’ तक धार्मिक कहानियों ने दर्शकों को सिनेमाघरों तक खींचा.
यानी धार्मिक सिनेमा के सफल होने का सबूत बॉलीवुड के पास पहले से था.
फिर सवाल यह है कि इतने साल तक मेकर्स इससे दूर क्यों रहे?
शायद इसलिए क्योंकि धार्मिक फिल्म में सिर्फ बॉक्स ऑफिस का रिस्क नहीं होता. इसमें दर्शक की आस्था का रिस्क भी होता है.
और यही वजह है कि आज धार्मिक फिल्म बनाना एक साथ आसान भी हुआ है और मुश्किल भी.
सोशल मीडिया ने आस्था को ‘वायरल’ कर दिया
आज की जेनरेशन धार्मिक विषयों से उसी तरह जुड़ती है, जैसे वह बाकी पॉप कल्चर से जुड़ती है. इंस्टाग्राम रील्स, यूट्यूब शॉर्ट्स और मीम्स ने धार्मिक किरदारों को भी डिजिटल स्पेस में पहुंचा दिया है.
किसी फिल्म का एक डायलॉग वायरल होता है. कोई पोस्टर ट्रेंड करता है. किसी अभिनेता का भगवान वाला लुक सोशल मीडिया पर चर्चा में आ जाता है.
यानी फिल्म रिलीज होने से पहले ही उसका एक डिजिटल दर्शक तैयार हो जाता है.
‘हनुमान अंश’ के मामले में भी सोशल मीडिया और वर्ड ऑफ माउथ ने फिल्म को लेकर माहौल बनाने में अहम भूमिका निभाई. यही वह चीज है जिसे अब मेकर्स नजरअंदाज नहीं कर सकते.
डॉ. द्विवेदी भी इस बदलाव को सकारात्मक नजर से देखते हैं. वह कहते हैं, “यह बहुत ही खूबसूरत दौर है. अच्छी बात है कि ऐसी चीजें अब बेबाकी से बन रही हैं.”
उनके मुताबिक आज लोग अपने धर्म को लेकर ज्यादा खुलकर बात कर रहे हैं. “लोग अब जय श्री राम बोलने से हिचकते नहीं हैं, अपने धर्म को लेकर प्राउड फील करते हैं.”
यानी जो बात कभी पर्दे के पीछे थी, अब वह खुले तौर पर पॉप कल्चर का हिस्सा बन रही है.
लेकिन बॉलीवुड के लिए यह स्पोर्ट्स इतना आसान भी नहीं
यहीं से कहानी का दूसरा और ज्यादा दिलचस्प हिस्सा शुरू होता है.
धार्मिक फिल्म में अगर कहानी दर्शक को पसंद आ गई, तो फिल्म को सिर्फ सफलता नहीं मिलती. उसे एक तरह का भावनात्मक समर्थन भी मिलता है.
लेकिन अगर दर्शक को लगा कि उसके आराध्य, धार्मिक ग्रंथ या परंपरा के साथ छेड़छाड़ हुई है, तो वही दर्शक सबसे बड़ा आलोचक भी बन जाता है.
‘आदिपुरुष’ इसका सबसे बड़ा उदाहरण है.
रामायण जैसे विषय पर बनी इस बड़े बजट की फिल्म से दर्शकों को काफी उम्मीदें थीं. लेकिन रिलीज के बाद फिल्म के लुक, वीएफएक्स और संवादों को लेकर ऐसा विवाद हुआ कि मामला सिर्फ फिल्म की समीक्षा तक नहीं रहा. सोशल मीडिया पर जबरदस्त विरोध हुआ. धार्मिक भावनाएं आहत करने के आरोप लगे और मेकर्स को विवादित संवादों में बदलाव तक करना पड़ा.
उनके मुताबिक ऐसे विषयों पर गहरी रिसर्च जरूरी है. किताबें पढ़नी होंगी. इतिहास समझना होगा. धार्मिक मान्यताओं और लोककथाओं के बीच अंतर समझना होगा.
क्योंकि इंटरनेट पर मौजूद हर जानकारी इतिहास नहीं है और हर वायरल पोस्ट धार्मिक सत्य नहीं.
धार्मिक सिनेमा में क्रिएटिव फ्रीडम जरूर हो सकती है, लेकिन रिसर्च से समझौता करना सबसे महंगा पड़ सकता है.
अब असली परीक्षा उन फिल्मों की है जो लाइन में हैं
‘हनुमान अंश’ ने रास्ता दिखा दिया है. अब साईं बाबा, जगन्नाथ, खाटू श्याम, महाकाली और रामायण जैसी फिल्मों की बारी है.
इन फिल्मों के सामने दो तरह के दर्शक होंगे.
एक वह, जो भगवान को अपने बचपन की कहानी की तरह जानता है.
और दूसरा वह युवा दर्शक, जो उसी भगवान को सोशल मीडिया, रील्स और सिनेमा की भाषा में देखना चाहता है.
मेकर्स की असली चुनौती इन दोनों को एक साथ जोड़ने की है.
सिर्फ बड़े सेट बना देने से धार्मिक फिल्म नहीं बनेगी. सिर्फ वीएफएक्स से भगवान का संसार खड़ा नहीं होगा. और सिर्फ किसी सुपरस्टार को भगवान बना देने से दर्शक थिएटर नहीं आएगा.
कहानी में भरोसा पैदा करना होगा.
क्योंकि बॉलीवुड के लिए आस्था का यह नया दौर जितना सुनहरा है, उतना ही संवेदनशील भी.
एक तरफ ‘हनुमान अंश’ जैसी सफलता मेकर्स को बता रही है कि दर्शक तैयार है.
दूसरी तरफ ‘आदिपुरुष’ जैसी घटना चेतावनी दे रही है कि दर्शक सब देखेगा, लेकिन अपनी आस्था के साथ खिलवाड़ शायद ही माफ करेगा.
यानी बॉलीवुड के सामने अब नया फॉर्मूला है- भगवान को पर्दे पर लाओ, लेकिन पहले उन्हें समझो.
वरना ट्रेंड कैश करने की कोशिश बॉक्स ऑफिस से पहले सोशल मीडिया पर ही भारी पड़ सकती है.
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