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‘किसान पिता ने सबकुछ दिया, मैं सिर्फ उम्मीद दे रहा हूं’, वैकेंसी पेंडिंग, कोर्ट केस और भर्ती अटकने से बीत गए प्रियतम की जिंदगी के कई साल

“कब तक पढ़ोगे?”

प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी कर रहे युवाओं से शायद यह सवाल सबसे ज्यादा पूछा जाता है. कभी परिवार पूछता है, कभी रिश्तेदार, कभी पड़ोसी और कई बार यही सवाल अभ्यर्थी खुद से भी करता है. लेकिन, इस सवाल का जवाब उस युवा से बेहतर शायद कोई नहीं जानता, जो कई वर्षों से एक प्रशासनी नौकरी के लिए दिन-रात मेहनत कर रहा है.

उसके लिए हर सुबह सिर्फ पढ़ाई की शुरुआत नहीं होती, बल्कि अपने सपने को बचाए रखने की एक और कोशिश होती है. बिहार के मधेपुरा जिले के बिशनपुर गांव के रहने वाले प्रियतम कुमार की कहानी भी कुछ ऐसी ही है. यह कहानी सिर्फ एक BPSC अभ्यर्थी के परीक्षा देने और परिणाम का इंतजार करने की कहानी नहीं है.

यह उस युवा की कहानी है, जिसने सीमित संसाधनों के बीच सपना देखा, उस सपने के लिए वर्षों तक मेहनत की, कई बार असफलता का सामना किया और फिर भी खुद को दोबारा खड़ा किया. लेकिन, इस सफर में एक सवाल लगातार उनके सामने खड़ा रहा-“आखिर क्या इस इंतजार की कोई आखिरी तारीख है?”

एक सीमांत किसान के घर से शुरू हुआ सपना

प्रियतम कुमार का जन्म 13 दिसंबर 1994 को मधेपुरा जिले के बिशनपुर गांव में एक सीमांत किसान परिवार में हुआ. उनके पिता जयकृष्ण यादव और मां सबिता देवी गांव में रहकर खेती-बारी का काम करते हैं . परिवार की आर्थिक स्थिति बहुत मजबूत नहीं थी. सीमित संसाधनों के बीच जिंदगी आगे बढ़ रही थी, लेकिन प्रियतम के सपने सीमित नहीं थे.

उनकी प्रारंभिक शिक्षा प्रशासनी विद्यालय से हुई. बचपन से ही उनके मन में एक सपना था—पढ़ाई के जरिए अपनी जिंदगी बदलना और परिवार के लिए कुछ करना. एक छोटे से गांव से निकलकर प्रशासनी नौकरी तक पहुंचना उनके लिए सिर्फ करियर का सवाल नहीं था, बल्कि उस परिवार की उम्मीद भी थी, जिसने अपनी क्षमता के अनुसार उन्हें पढ़ाया और आगे बढ़ने का अवसर दिया.

शायद इसी वजह से प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी उनके लिए सिर्फ किताबों तक सीमित नहीं रही. इसमें माता-पिता की उम्मीद, परिवार की आर्थिक स्थिति बदलने की इच्छा और खुद को साबित करने का सपना भी शामिल हो गया.

65वीं BPSC से शुरू हुआ सफर

प्रियतम ने BPSC की 65वीं परीक्षा से अपने प्रतियोगी परीक्षा के सफर की शुरुआत की ओर यह संघर्ष लगातार जारी रखा पर की परीक्षा मे सफलता नहीं मिली. एक प्रतियोगी अभ्यर्थी के लिए परीक्षा में असफल होना सिर्फ रिजल्ट में नाम न आने तक सीमित नहीं होता. उस एक परिणाम के पीछे कई महीनों की पढ़ाई, अनगिनत घंटे, नींद से समझौता और परिवार की उम्मीदें जुड़ी होती हैं. इसके बावजूद प्रियतम ने तैयारी नहीं छोड़ी.

इसके बाद आई 70वीं BPSC परीक्षा. इस बार कहानी थोड़ी अलग थी. उन्होंने प्रारंभिक परीक्षा पास की और मुख्य परीक्षा भी लिखी. वर्षों की मेहनत के बाद पहली बार उन्हें लगा कि मंजिल अब पहले से ज्यादा करीब है. लेकिन प्रतियोगी परीक्षाओं की दुनिया में मंजिल के करीब पहुंच जाना और मंजिल हासिल कर लेना, दो अलग-अलग बातें हैं.

कुछ अंकों की दूरी और वर्षों का दर्द

प्रियतम बताते हैं कि कई मौकों पर वह सफलता से महज 1 से 5 अंकों के अंतर से पीछे रह गए. कागज पर यह अंतर छोटा दिखाई देता है, लेकिन एक अभ्यर्थी के जीवन में इसका अर्थ बहुत बड़ा होता है. कुछ अंकों का यह अंतर कई महीनों की अतिरिक्त तैयारी और अगले अवसर के लंबे इंतजार में बदल सकता है.

सबसे कठिन स्थिति तब होती है, जब अभ्यर्थी को लगता है कि उसने अपनी तरफ से मेहनत में कोई कमी नहीं छोड़ी. उसने पढ़ाई की, मॉक टेस्ट दिए, सिलेबस पूरा किया, गलतियों को सुधारा और पिछली असफलताओं से सीखने की कोशिश की. फिर भी परिणाम उसके पक्ष में नहीं आया.

ऐसे समय में समाज का आसान सवाल सामने आता है—“चयन क्यों नहीं हुआ?” लेकिन इस सवाल का जवाब शायद उस व्यक्ति के पास भी नहीं होता, जिसने पूरी ईमानदारी से मेहनत की हो.

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समाज के लिए परिणाम, अभ्यर्थी के लिए पूरी जिंदगी

जिसका चयन हो गया, वह मेहनती और प्रतिभाशाली कहलाता है. जिसका चयन नहीं हुआ, उससे अक्सर पूछा जाता है—“शायद तैयारी में कमी रह गई होगी.”

लेकिन क्या हर असफलता का मतलब मेहनत की कमी होता है?

कई बार दो अभ्यर्थी लगभग समान स्तर की तैयारी करते हैं. एक कुछ अंकों से आगे निकल जाता है और दूसरा कुछ अंकों से पीछे रह जाता है. फिर समाज दोनों को अलग-अलग नजर से देखने लगता है. एक के घर मिठाई जाती है, दूसरे के घर सवाल पहुंचते हैं. एक को बधाई मिलती है, दूसरे से पूछा जाता है—“अब क्या करोगे?”

यहीं से एक प्रतियोगी अभ्यर्थी का असली मानसिक संघर्ष शुरू होता है. उसके मन में लगातार कई सवाल चलते रहते हैं—

  • क्या मैं सही दिशा में हूं?
  • क्या मुझे तैयारी जारी रखनी चाहिए?
  • क्या मेरे इतने साल व्यर्थ चले गए?
  • अगर अगली परीक्षा भी नहीं निकली, तो क्या होगा?

बाहर से वह सामान्य दिखाई देता है, लेकिन भीतर वह हर दिन अपने भविष्य से जूझ रहा होता है.

जब परीक्षा से ज्यादा मुश्किल हो जाता है इंतजार

प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी में सबसे कठिन चीज हमेशा कठिन सिलेबस नहीं होता. कई बार सबसे कठिन होता है यह पता न होना कि अगला अवसर कब मिलेगा.

अभ्यर्थी अपनी जिंदगी की योजना बनाना चाहता है. लेकिन परीक्षा की तारीख अनिश्चित हो, तो भविष्य की योजना कैसे बने? उम्र बढ़ रही है, परिवार की जिम्मेदारियां बढ़ रही हैं और आर्थिक जरूरतें भी बढ़ रही हैं. दूसरी तरफ तैयारी वहीं खड़ी है.

हर बार उम्मीद होती है कि अगली परीक्षा में शायद बात बन जाएगी. इसी उम्मीद में एक साल निकल जाता है, फिर दूसरा और फिर तीसरा. धीरे-धीरे वह युवा अपने जीवन के महत्वपूर्ण वर्षों को सिर्फ एक परीक्षा के इंतजार में बिताने लगता है.

और फिर मन में एक और सवाल आता है—

“क्या मैंने जिंदगी को सिर्फ एक परीक्षा के इंतजार में रोक दिया?”

पढ़ाई के साथ चलता है आर्थिक संघर्ष

बिहार के हजारों प्रतियोगी अभ्यर्थियों के लिए परीक्षा की तारीख सिर्फ एक तारीख नहीं होती. फॉर्म भरने से लेकर परीक्षा केंद्र तक पहुंचने और वापस घर लौटने तक हर कदम पर खर्च जुड़ा होता है.

परीक्षा केंद्र दूसरे शहर में है, तो यात्रा का खर्च. रहने की जगह चाहिए, तो उसका खर्च. भोजन, किताबें, नोट्स, इंटरनेट और टेस्ट सीरीज—हर जरूरत के पीछे पैसा चाहिए.

प्रियतम जैसे सीमांत किसान परिवार से आने वाले अभ्यर्थी के लिए यह संघर्ष और कठिन हो सकता है. कई बार पढ़ाई और कमाई के बीच चुनाव करना पड़ता है. पैसों की जरूरत हो तो पार्ट-टाइम काम करना पड़ सकता है, लेकिन काम करने पर पढ़ाई का समय कम हो जाता है. यानी एक तरफ सपना है और दूसरी तरफ रोजमर्रा की जिंदगी.

जब परीक्षा केंद्र तक पहुंचना भी परीक्षा बन जाए

दूरदराज के गांव से परीक्षा देने दूसरे शहर जाना अपने आप में चुनौती है. ट्रेन या बस का किराया, रहने की व्यवस्था, खाने का इंतजाम और परीक्षा के बाद वापस लौटने का खर्च—इन सबका बोझ अलग होता है.

कई बार प्रश्नपत्र सामने आने से पहले ही अभ्यर्थी के मन में सवाल चल रहे होते हैं—“अगर यह परीक्षा भी नहीं निकली तो? अगली परीक्षा के लिए पैसे कहां से आएंगे? घरवालों को क्या जवाब दूंगा?”

फिर भी वह परीक्षा हॉल में बैठता है.

क्योंकि उसके पास उम्मीद के अलावा शायद कोई दूसरा रास्ता नहीं होता.

जब अपने हक के लिए आवाज उठाने पर भी डर लगे

परीक्षाएं समय पर हों और चयन प्रक्रिया पारदर्शी हो—यह मांग किसी भी अभ्यर्थी के लिए स्वाभाविक है. लेकिन जब अपनी मांगों को लेकर अभ्यर्थियों को आंदोलन करना पड़ता है, तो उनके सामने एक और चिंता खड़ी हो जाती है—“कहीं कार्रवाई न हो जाए.”

प्रियतम के अनुसार, आंदोलन और प्रदर्शन के दौरान अभ्यर्थियों को FIR जैसी परिस्थितियों का भी सामना करना पड़ा. ऐसे में संघर्ष सिर्फ परीक्षा तक सीमित नहीं रहता.

कई बार परिवार को भी पता नहीं होता कि बेटा या बेटी किसी आंदोलन में शामिल होने गया है. कभी परीक्षा का बहाना बनाना पड़ता है, तो कभी किसी दोस्त के यहां जाने की बात कहनी पड़ती है.

एक तरफ अपने भविष्य के लिए आवाज उठाने की मजबूरी और दूसरी तरफ परिवार की चिंता—यह दोहरा दबाव भी अभ्यर्थी की जिंदगी का हिस्सा बन जाता है.

लेकिन सवाल सिर्फ प्रियतम का नहीं है

प्रियतम की कहानी को सिर्फ एक व्यक्ति की कहानी मान लेना शायद इसके सबसे बड़े हिस्से को नजरअंदाज करना होगा. यह उन हजारों युवाओं की भी कहानी है, जो प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करते हुए अपने जीवन के कई महत्वपूर्ण साल लगा देते हैं.

किसी ने नौकरी छोड़कर तैयारी शुरू की. किसी ने गांव छोड़कर शहर का कमरा लिया. किसी ने माता-पिता से पैसे लिए. किसी ने अपनी छोटी-छोटी इच्छाओं को टाल दिया. किसी ने शादी टाल दी और किसी ने दोस्तों से दूरी बना ली.

और किसी ने बस यही सोचा—

“पहले नौकरी लग जाए, फिर जिंदगी जी लेंगे.”

लेकिन जिंदगी इंतजार नहीं करती. दोस्त आगे बढ़ जाते हैं, परिवार की जिम्मेदारियां बढ़ जाती हैं और उम्र भी बढ़ती रहती है. ऐसे में हर असफल परिणाम सिर्फ एक परीक्षा का परिणाम नहीं रह जाता, बल्कि वह बीते हुए समय की याद भी बन जाता है.

फिर भी किताब बंद नहीं होती

इन तमाम सवालों के बावजूद प्रियतम की कहानी का सबसे मजबूत हिस्सा यही है कि उम्मीद पूरी तरह खत्म नहीं हुई.

क्योंकि प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी करने वाला युवा सिर्फ नौकरी के लिए नहीं पढ़ता. वह अपने परिवार के लिए बेहतर जिंदगी चाहता है. वह अपनी पहचान बनाना चाहता है. वह यह साबित करना चाहता है कि सीमित संसाधन किसी सपने की सीमा तय नहीं करते.

इसीलिए असफलता के बाद भी वह अगली सुबह किताब खोलता है. नोट्स देखता है, पुरानी गलतियां पढ़ता है, नई रणनीति बनाता है और खुद से कहता है—

“एक बार और कोशिश करते हैं.”

शायद प्रतियोगी परीक्षाओं की दुनिया की सबसे अनकही कहानी यही है—लोग आपके रिजल्ट की तारीख याद रखते हैं, लेकिन आपकी तैयारी के साल कोई नहीं गिनता.

एक परीक्षा सिर्फ परीक्षा नहीं होती

प्रियतम की कहानी यह याद दिलाती है कि एक प्रतियोगी परीक्षा सिर्फ प्रश्नपत्र और कुछ घंटों की परीक्षा नहीं होती. उसके पीछे एक पूरा परिवार खड़ा होता है. किसी किसान पिता की मेहनत होती है, किसी मां की उम्मीद होती है, किसी भाई-बहन का भरोसा होता है और किसी युवा की कई वर्षों की मेहनत होती है.

सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि उसके जीवन के वे साल होते हैं, जिन्हें वापस नहीं पाया जा सकता.

प्रियतम की मांग है कि प्रतियोगी परीक्षाएं समय पर आयोजित हों, चयन प्रक्रिया पारदर्शी हो और मेहनत करने वाले अभ्यर्थियों को निष्पक्ष अवसर मिले.

यह मांग शायद सिर्फ प्रियतम की नहीं लगती. परीक्षा अलग हो सकती है, राज्य अलग हो सकता है और सिलेबस भी अलग हो सकता है, लेकिन संघर्ष की भाषा अक्सर एक जैसी होती है— “मेहनत कर रहे हैं, बस मौका चाहिए.”

आखिर में बचता है सिर्फ एक सवाल

प्रियतम की कहानी का अंत अभी किसी अंतिम परिणाम से नहीं होता, क्योंकि यह कहानी उस इंतजार की कहानी है, जो अभी जारी है.

एक तरफ वर्षों की मेहनत है, दूसरी तरफ परिवार की उम्मीद. एक तरफ आर्थिक मजबूरियां हैं, दूसरी तरफ प्रशासनी नौकरी पाने का सपना. एक तरफ उम्र और समय निकलने की चिंता है, तो दूसरी तरफ यह भरोसा कि शायद अगला मौका जिंदगी बदल दे.

इन सबके बीच खड़ा है एक युवा—जो थका जरूर है, लेकिन पूरी तरह हारा नहीं है.

शायद यही वजह है कि प्रियतम की कहानी सिर्फ सफलता या असफलता की कहानी नहीं है. यह उस दौर की कहानी है, जब एक युवा अपनी पूरी जवानी एक सपने के नाम कर देता है और फिर भी समाज उससे सिर्फ एक सवाल पूछता है—

“नौकरी लगी या नहीं?”

लेकिन शायद हमें एक और सवाल पूछना चाहिए—

“उस नौकरी के इंतजार में उसने क्या-क्या खो दिया?”

क्योंकि किसी भी प्रतियोगी परीक्षा का परिणाम सिर्फ चयनित और असफल अभ्यर्थियों की सूची नहीं होता. उस सूची के पीछे कई परिवारों की उम्मीदें होती हैं, कई युवाओं की रातें होती हैं, कई वर्षों की मेहनत होती है और कई ऐसे सपने होते हैं, जो रिजल्ट आने से पहले ही समय के बोझ तले दबने लगते हैं.

इसीलिए प्रियतम की कहानी की सबसे महत्वपूर्ण पंक्ति शायद यही है—

“एक परीक्षा केवल नौकरी का अवसर नहीं होती. वह किसी युवा के जीवन के कई अनमोल वर्षों, उसके परिवार की उम्मीदों और उसके आत्मसम्मान से जुड़ी होती है.”

और शायद हर उस युवा की कहानी भी, जो आज किसी कमरे में अकेला बैठकर किताब खोल रहा है और खुद से सिर्फ इतना कह रहा है—

“एक कोशिश और…”

रिपोर्ट- अविनाश राज

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विनोद झा
संपादक नया विचार

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