एक दुल्हन विदा होने वाली थी. घर में रोने की आवाजें थीं. आंखों में आंसू थे. तभी पिता ने कहा—एक गीत गाओ.
दुल्हन ने गाना शुरू किया.
वह दुल्हन कोई और नहीं, शारदा सिन्हा थीं.
जिस आवाज में उस दिन अपनी विदाई का दर्द था, वही आवाज कुछ सालों बाद हजारों बेटियों की विदाई का गीत बनने वाली थी. और फिर एक दिन ऐसा आया, जब छठ के घाटों पर उगते सूर्य से पहले लोगों को शारदा सिन्हा की आवाज सुनाई देने लगी.
लेकिन इस आवाज तक पहुंचना इतना आसान नहीं था.
ससुराल में गाने से रोकने की कोशिश हुई. मंच पर जाने को लेकर विरोध हुआ. शुरुआती सफर में कई मुश्किलें आईं. फिर बॉलीवुड का दरवाजा खुला तो ‘कहे तोसे सजना’ के लिए मिले सिर्फ 76 रुपये.
रकम छोटी थी, लेकिन कहानी बहुत बड़ी होने वाली थी.
क्योंकि यह सिर्फ एक गायिका के मशहूर होने की कहानी नहीं थी. यह उस स्त्री की कहानी थी जिसने परिवार, विरोध और जिम्मेदारियों के बीच अपनी आवाज को बचाए रखा—और आखिरकार वही आवाज बिहार, झारखंड और पूर्वांचल की सांस्कृतिक पहचान का हिस्सा बन गई.
आज 1 अक्टूबर को उनकी जयंती पर जब शारदा सिन्हा को याद किया जा रहा है, तो उनकी जिंदगी के ये किस्से बताते हैं कि ‘बिहार कोकिला’ बनने से पहले उन्होंने कितनी लंबी यात्रा तय की थी.
जिस घर में बहू के गाने पर आपत्ति थी, वहीं से निकली छठ की आवाज
शादी के बाद शारदा सिन्हा के सामने पहली बड़ी चुनौती संगीत को लेकर ही आई. उनकी सास को उनका बाहर जाकर गाना पसंद नहीं था. लेकिन पति ब्रजकिशोर सिन्हा ने उनका साथ दिया. शारदा सिन्हा ने खुद कई मौकों पर बताया था कि उनके पति उनके संगीत के सबसे बड़े समर्थकों में थे.
एक वक्त था जब लोग यह तक पूछते थे कि पत्नी को गाने-बजाने की अनुमति देने वाला पति कैसा है. फिर जब शारदा सिन्हा की आवाज लोगों तक पहुंची और उनके गीत लोकप्रिय हुए, वही नजरिया बदलता गया.
यानी जिस आवाज को रोकने की कोशिश हो रही थी, वही धीरे-धीरे लोगों की आवाज बनने लगी.
19 साल की उम्र में बेगम अख्तर के सामने पहुंचीं, फिर बदल गई कहानी
शारदा सिन्हा का संगीत सफर भी किसी फिल्मी कहानी से कम नहीं था.
करीब 19 साल की उम्र में वह लखनऊ में HMV के टैलेंट ऑडिशन के लिए पहुंची थीं. संयोग से उस ऑडिशन में महान गायिका बेगम अख्तर बतौर अतिथि निर्णायक मौजूद थीं. शारदा सिन्हा ने मैथिली का विवाह गीत सुनाया.
बेगम अख्तर उनकी आवाज से प्रभावित हुईं और उन्हें रियाज जारी रखने की सलाह दी. यही मौका उनके संगीत सफर की एक बड़ी सीढ़ी बना.
आगे चलकर यही आवाज 1500 से ज्यादा गीतों तक पहुंची और मैथिली, भोजपुरी, मगही, हिंदी समेत कई भाषाओं में अपनी पहचान बनाई.
अपनी ही विदाई में गाया गीत, फिर बन गईं विदाई के गीतों की आवाज
अपनी शादी की विदाई से कुछ घंटे पहले शारदा सिन्हा ने पिता के कहने पर विदाई गीत गाया था. वह खुद याद करती थीं कि माहौल बेहद भावुक था और सभी रो रहे थे, फिर भी उन्होंने गीत गाया.
बाद में उनकी आवाज में गाए शादी के गीत घर-घर पहुंचे.
यह संयोग कितना खूबसूरत है—जिस लड़की ने अपनी विदाई में गीत गाया था, वही आगे चलकर अनगिनत बेटियों की विदाई की आवाज बन गई.
और शायद यही वजह है कि उनके गीतों में सिर्फ सुर नहीं सुनाई देते थे. रिश्तों की कसक भी सुनाई देती थी.
बॉलीवुड में पहुंचीं तो 76 रुपये मिले
लोकगीतों से अपनी अलग पहचान बना चुकी शारदा सिन्हा की आवाज बॉलीवुड तक पहुंची.
सलमान खान और भाग्यश्री की फिल्म ‘मैंने प्यार किया’ के गीत ‘कहे तोसे सजना’ में उनकी आवाज सुनाई दी. इस गाने के लिए उन्हें 76 रुपये मिलने की बात कई रिपोर्टों में दर्ज है.
इसके बाद ‘हम आपके हैं कौन’ का विदाई गीत ‘बाबुल जो तुमने सिखाया’ और बाद में ‘गैंग्स ऑफ वासेपुर’ का ‘तार बिजली से पतले’ जैसे गीतों ने उनकी आवाज को फिल्मों में भी अलग पहचान दी.
लेकिन फिल्मों की चमक के बावजूद शारदा सिन्हा की असली पहचान लोकगीत ही रहे.
फिर छठ आया और शारदा सिन्हा की आवाज घर-घर पहुंच गई
उनके करियर का सबसे बड़ा रिश्ता छठ से बना.
‘केलवा के पात पर’, ‘सुनअ छठी माई’, ‘पटना के घाट पर’ जैसे गीतों ने उन्हें छठ के गीतों की सबसे पहचानी जाने वाली आवाजों में शामिल कर दिया. उनके गीतों की लोकप्रियता बिहार से बाहर भी लगातार फैलती गई.
और यहां उनकी जिंदगी का सबसे खूबसूरत विरोधाभास सामने आता है.
जिस पर्व की आवाज वह बन गईं, उसका व्रत उन्होंने खुद नहीं रखा था.
वह कहती थीं कि छठ के गीत ही उनका अर्घ्य हैं और इन गीतों के जरिए लोगों को छठ से जोड़ना उनकी जिम्मेदारी है.
उनकी आवाज में ‘वाह’ नहीं, ‘आह’ चाहिए थी
उनकी गुरु पन्ना देवी ने उनकी आवाज की एक खासियत बहुत पहले पहचान ली थी.
उनके मुताबिक शारदा सिन्हा की आवाज में ऐसी कसक थी कि गाते वक्त सिर्फ ‘वाह’ नहीं, ‘आह’ निकलनी चाहिए.
यही कसक उनकी सबसे बड़ी पहचान बन गई.
उनके गीतों में शादी थी, लेकिन विदाई भी थी. उत्सव था, लेकिन विरह भी था. छठ की आस्था थी, लेकिन परदेस गए अपनों की याद भी थी.
इसलिए शायद उनकी आवाज सुनते ही लोगों को सिर्फ गीत नहीं, अपना घर याद आता था.
आखिरी वक्त तक नहीं टूटा छठ से रिश्ता
जिंदगी के आखिरी दौर में भी शारदा सिन्हा की आवाज छठ से जुड़ी रही.
एम्स में इलाज के दौरान उन्होंने अपना अंतिम छठ गीत ‘दुखवा मिटाई छठी मइया’ रिकॉर्ड किया. छठ से कुछ दिन पहले यह गीत सामने आया था.
5 नवंबर 2024 को 72 वर्ष की उम्र में उनका निधन हुआ. लेकिन उनकी आवाज वहीं रह गई, जहां से उनका सफर शुरू हुआ था—लोकगीतों में, घरों में और छठ के घाटों पर.
आज भी छठ आते ही जब कहीं दूर से शारदा सिन्हा की आवाज सुनाई देती है, तो लगता है जैसे कोई बहुत अपना पुकार रहा हो.
ससुराल ने रोकने की कोशिश की थी. सफर में मुश्किलें आईं. बॉलीवुड में शुरुआत 76 रुपये से हुई. लेकिन शारदा सिन्हा की आवाज इतनी दूर तक गई कि आखिरकार एक त्योहार ही उनकी आवाज का पर्याय बन गया.
शारदा सिन्हा चली गईं, लेकिन उनकी आवाज नहीं गई.
वह आज भी छठ के घाट पर गूंजती है—और हर बार किसी न किसी को उसका अपना गांव, अपना घर और अपने लोग याद दिला देती है.
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