आज किसी अपने से बात करनी हो तो फोन उठाइए, नंबर मिलाइए और कुछ सेकंड में बात हो जाती है. मन हो तो वीडियो कॉल कर लीजिए, या मन हो तो ऑडियो कॉल. हजारों किलोमीटर दूर बैठा इंसान भी स्क्रीन पर सामने नजर आता है. लेकिन कुछ दशक पीछे जाएं तो यही काम एक अलग दुनिया का हिस्सा था.
मान लीजिए बिहार के किसी गांव का एक युवक 1990 के दशक में रोजी-रोटी के लिए दिल्ली, मुंबई या पंजाब चला गया. घर में मां-बाप के पास न मोबाइल था, ना WhatsApp, नाही वीडियो कॉल. बेटे की समाचार का सबसे भरोसेमंद रास्ता था- चिट्ठी.
चिट्ठी लिखी जाती थी, डाक के भरोसे भेजी जाती थी और फिर शुरू होता था इंतजार. पोस्टमैन के आने की आवाज कई घरों में सिर्फ डाक नहीं, बल्कि दूर गए अपने की समाचार लेकर आती थी.
फिर देश-दुनिया की संचार प्रणाली धीरे-धीरे बदलने लगी. PCO आए. घरों और दफ्तरों से निकलकर फोन मोहल्लों और बाजारों तक पहुंचा. 1995 में हिंदुस्तान में मोबाइल फोन की आधिकारिक शुरुआत हुई. अगले कुछ वर्षों में SMS, इंटरनेट, 2G, 3G और 4G ने दस्तक दी.
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