जिस कलाकार को देश ने नेशनल अवॉर्ड से नवाजा, उसके मन में अपने ही बिहार को लेकर एक सवाल आज भी है- क्या राज्य ने अपने कलाकारों को वह सम्मान दिया, जिसके वे हकदार हैं? सवाल में शिकायत कम, अपनी मिट्टी से जुड़ी टीस ज्यादा है.
6 अक्टूबर को जन्मदिन के मौके पर ‘नया विचार’ से एक्सक्लूसिव बातचीत में संजय मिश्रा ने बिहार से अपने रिश्ते, छूटे बचपन, बदलते पटना और राज्य की सांस्कृतिक पहचान पर खुलकर बात की. उन्होंने शेखर सुमन, शत्रुघ्न सिन्हा और मनोज बाजपेयी जैसे कलाकारों का जिक्र करते हुए कहा कि अगर बिहार प्रशासन ने नेशनल अवॉर्ड से पहले उन्हें सम्मानित किया होता, तो यह उनके लिए गर्व का पल होता.
उनकी बात में एक ठहराव आता है- ‘थोड़ा दुख होता है.’
मगर यह कहानी सिर्फ सम्मान न मिलने की नहीं है. मुंबई ने संजय को पहचान दी, लेकिन बिहार आज भी उनके लिए बचपन, माता-पिता का प्यार और त्योहारों की उन यादों का नाम है, जिन्हें वह पीछे छोड़ आए. अगर उनकी जिंदगी की आखिरी फिल्म बिहार में शूट हो, तो वह किसी भव्य लोकेशन के बजाय संयुक्त परिवार, रूमाल में बंधी भिंडी और दशहरा की तैयारियां दिखाना चाहेंगे.
यही संजय मिश्रा का बिहार है- जिससे वह दूर जरूर हुए, लेकिन जिसे अपने भीतर से कभी दूर नहीं कर पाए.
नेशनल अवॉर्ड से पहले बिहार सम्मान देता तो गर्व होता
संजय मिश्रा ने कभी पुरस्कार को लक्ष्य बनाकर काम नहीं किया. उनके लिए अभिनय का मतलब अपने काम के प्रति ईमानदार रहना है. अवॉर्ड मिल जाए तो वह इसे ‘सोने पे सुहागा’ मानते हैं.
नेशनल अवॉर्ड उनके लिए देश की ओर से मिली बड़ी पहचान है. राष्ट्रपति के हाथों सम्मान मिलना वर्षों की मेहनत को राष्ट्रीय स्तर पर स्वीकार किए जाने जैसा है.
लेकिन इसी खुशी के बीच एक कमी उन्हें खटकती है. उनका कहना है कि कई राज्यों में वहां के कलाकारों को राज्य प्रशासन सम्मान देती है. अगर बिहार ने नेशनल अवॉर्ड से पहले उन्हें सम्मानित किया होता, तो वह उनके लिए बेहद गर्व का क्षण होता.
वह अपनी बात को सिर्फ खुद तक सीमित नहीं रखते. शेखर सुमन, शत्रुघ्न सिन्हा और मनोज बाजपेयी का नाम लेते हुए सवाल करते हैं कि क्या बिहार ने अपने इन कलाकारों को वह राज्य सम्मान दिया, जिसके वे हकदार हैं?
फिर कहते हैं- ‘थोड़ा दुख होता है.’
यह किसी पुरस्कार की मांग से ज्यादा उस कलाकार की इच्छा है कि जिस राज्य से वह निकला, वह भी उसकी उपलब्धि को अपना गौरव माने.
बिहार से मुंबई आए तो क्या पीछे छूट गया?
सफलता की दौड़ में अपने शहर और बचपन से दूर होना हर कलाकार की कहानी का हिस्सा है. संजय से पूछा गया कि बिहार से निकलते समय ऐसा क्या पीछे छूटा, जिसे आज भी महसूस करते हैं?
उनका जवाब बेहद छोटा है- ‘वक्त. पीछे का वक्त.’
उस वक्त में बचपन है, रिश्ते हैं, माता-पिता का प्यार है और वह आजादी है जिसमें किसी पहचान की जरूरत नहीं थी.
आज संजय जहां जाते हैं, लोग पहचान लेते हैं. कभी वह बिहार की गलियों में बिना किसी पहचान के घूम सकते थे. उस दौर को याद करते हुए वह कहते हैं- ‘पेरेंट्स का प्यार नहीं मिलेगा कभी.’
मुंबई ने उन्हें बहुत कुछ दिया, लेकिन बचपन का वह वक्त वापस नहीं दे सकती.
जिंदगी की आखिरी फिल्म का सीन बिहार में हो तो?
संजय मिश्रा से पूछा गया कि अगर उनकी जिंदगी पर फिल्म बने और आखिरी सीन बिहार में शूट करना हो, तो वह क्या दिखाना चाहेंगे?
जवाब में कोई फिल्मी भव्यता नहीं, बल्कि घर का एक बेहद साधारण दृश्य आता है.
एक संयुक्त परिवार. कोई रूमाल में भिंडी बांधकर ला रहा है. घर में दशहरा की तैयारियां चल रही हैं. आसपास उत्सव का माहौल है.
बस, यही उनका बिहार है.
वह चाहते हैं कि छठ, होली, अनंत चतुर्दशी, जिउतिया और सामा-चकेवा जैसे त्योहार फिर उनकी जिंदगी के फ्रेम में लौटें. उन्हें लगता है कि वक्त के साथ उनकी अपनी जिंदगी से भी कई त्योहार जैसे गायब हो गए.
‘छठ अब स्टार फेस्टिवल बन चुका है’
संजय मिश्रा की नजर में त्योहार भी किसी फिल्म के किरदारों की तरह हैं.
वह जिउतिया को ‘कैरेक्टर एक्टर’ और गणपति को ‘स्टार एक्टर’ कहते हैं. वहीं छठ को वह ‘स्टार फेस्टिवल’ मानते हैं.
उन्होंने बिहार से बाहर भी छठ का वही उत्साह देखा है. कोलकाता, मुंबई और बनारस तक.
बनारस के घाटों पर गन्ने, उगते सूरज के वक्त शंख की आवाज और आस्था से भरा माहौल उन्हें खास तौर पर याद है.
छठ बिहार से निकलकर देश के कई हिस्सों में पहुंच गया, लेकिन संजय के लिए इसकी जड़ें आज भी उसी मिट्टी में हैं.
‘वो पटना वाला दशहरा कहां गया?’
बिहार की बात करते हुए संजय मिश्रा पुराने पटना के दशहरे को भी याद करते हैं.
गांधी मैदान, लंगर टोली और सांस्कृतिक कार्यक्रमों का वह दौर, जब उस्ताद बिस्मिल्लाह खान, उस्ताद विलायत खान, गिरिजा देवी और सितारा देवी जैसे दिग्गज कलाकारों को सुनने का मौका मिलता था.
वह बताते हैं कि लोग रात-रात भर बैठकर शास्त्रीय संगीत सुनते थे.
फिर एक सवाल सामने आता है- ‘वो कल्चर कहां गया?’
संजय की यह याद सिर्फ पुराने पटना की नहीं है. वह उस सांस्कृतिक माहौल को याद कर रहे हैं, जिसमें त्योहार मनोरंजन के साथ कला और संगीत से भी जुड़े होते थे.
‘बदलाव बिहार में नहीं, बिहारियों में हुआ है’
संजय बिहार में बदलाव से इनकार नहीं करते, लेकिन उनके लिए विकास का मतलब सिर्फ सड़क और इमारतें नहीं हैं.
उनका कहना है- ‘बदलाव बिहार में नहीं हुआ है, बदलाव बिहारियों में हुआ है.’
पटना के रिवरफ्रंट का जिक्र करते हुए वह कहते हैं कि गंगा के किनारे बने इस इलाके का नाम ‘गंगा ड्राइव’ भी हो सकता था, लेकिन उसे ‘मरीन ड्राइव’ कहा गया.
उनकी बात सिर्फ नाम तक सीमित नहीं है. वह नागरिक व्यवहार को भी बदलाव का हिस्सा मानते हैं.
उनका कहना है- ‘स्मार्ट सिटी नहीं होता है, स्मार्ट सिटीजन होते हैं.’
शहर की सड़कें कितनी भी अच्छी क्यों न हों, अगर लोग चौराहों पर गाड़ियां रोककर खड़े हों, ट्रैफिक का ध्यान न रखें और सार्वजनिक जगहों पर अनुशासन न हो, तो बदलाव अधूरा है.
‘जहां काम मिलेगा, वहां लोग जाएंगे’
बिहार से बाहर जाने और पलायन के सवाल पर भी संजय का नजरिया अलग है.
वह इसे सिर्फ बिहार की समस्या नहीं मानते. उनके मुताबिक इंसान हमेशा वहां जाता है जहां काम मिलता है. नदियों के किनारे सभ्यताएं बसीं और रोजगार के साथ लोगों का स्थान बदलता रहा.
उनका कहना है- ‘जहां काम मिलेगा, वहां लोग जाएंगे. पलायन तो होगा ही.’
उनकी अपनी कहानी भी इसी तलाश का हिस्सा है. बिहार से मुंबई तक का सफर एक ऐसे कलाकार का सफर था, जिसे अपने हुनर के लिए जगह चाहिए थी.
पहचान बिहारी से शुरू होकर हिंदुस्तानी तक पहुंचती है
संजय के लिए पहचान किसी एक दायरे में बंद नहीं है.
वह कहते हैं कि पहले गांव आता है, फिर जिला, राज्य, देश और फिर महाद्वीप.
उनकी पत्नी उत्तराखंड से हैं और शिशु बिहार और उत्तराखंड दोनों से जुड़े हैं. लेकिन विदेश में पहुंचते ही सबसे पहली पहचान हिंदुस्तानीय की होती है.
इसलिए बिहार उनके लिए बाकी पहचानों से अलग नहीं, बल्कि उनकी पहचान की पहली परतों में से एक है.
बिहार की छवि पर भी संजय की नाराजगी
बिहार को लेकर बनी नकारात्मक छवि पर संजय सिर्फ बाहरी दुनिया को दोष नहीं देते.
उनका मानना है कि बिहार के अपने नेताओं और लोगों के व्यवहार ने भी कई stereotypes को मजबूत किया है.
‘हो जाएगा, क्या जल्दी है’ वाला रवैया उन्हें परेशान करता है. चौराहे पर गाड़ी रोक देना, ट्रैफिक रोककर खड़े रहना, तेज आवाज में बात करना और सार्वजनिक जगहों पर अनुशासन की कमी जैसी बातें उन्हें खटकती हैं.
उनके लिए बिहार से प्यार का मतलब उसकी हर कमी को सही ठहराना नहीं है. अपनी मिट्टी की कमियों पर सवाल करना भी उसी रिश्ते का हिस्सा है.
देश ने सम्मान दिया, बिहार से सवाल अब भी बाकी
संजय मिश्रा की कहानी का सबसे दिलचस्प पहलू यही है.
देश ने उनके काम को नेशनल अवॉर्ड से सम्मानित किया. लेकिन वह आज भी अपने राज्य से पूछते हैं कि क्या बिहार अपने कलाकारों को वह सम्मान देता है, जिसके वे हकदार हैं.
फिर भी इस सवाल में बिहार से दूरी नहीं, बल्कि जुड़ाव दिखाई देता है.
क्योंकि जब संजय से उनकी जिंदगी के आखिरी फिल्मी फ्रेम के बारे में पूछा जाता है, तो उनके सामने मुंबई की चमक नहीं आती.
उन्हें याद आता है एक घर. संयुक्त परिवार. रूमाल में बंधी भिंडी. दशहरा की तैयारी. छठ का घाट. शंख की आवाज और चारों तरफ फैला उत्सव.
यही वह बिहार है जिसे संजय मिश्रा पीछे छोड़ आए, लेकिन अपने भीतर से कभी नहीं निकाल पाए.
और शायद इसलिए उनका सवाल भी इतना अपना लगता है- जिस मिट्टी ने देश को इतने कलाकार दिए, क्या वह अपने कलाकारों को पहचान और सम्मान भी देगी?
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