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AI की बढ़ती कीमत: भारत के डेटा सेंटर कितना पानी इस्तेमाल करते हैं और क्यों बढ़ रही है चिंता?

आप AI से कोई सवाल पूछते हैं. जवाब कुछ ही सेकंड में स्क्रीन पर आ जाता है. कभी वह चिट्ठी लिख देता है, कभी फोटो बना देता है, कभी घंटों का काम मिनटों में निपटा देता है. सब कुछ इतना आसान लगता है कि शायद ही कोई सोचता हो कि इस जवाब के पीछे असल में हो क्या रहा है. लेकिन एक मिनट रुकिए. आपका सवाल किसी हवा में तैरते बादल तक नहीं पहुंचता. उसके पीछे बड़े-बड़े कंप्यूटर, हजारों सर्वर, बिजली की सप्लाई और उन्हें ठंडा रखने के लिए चलने वाले सिस्टम होते हैं. इन सबको एक जगह रखकर चलाया जाता है, जिसे डेटा सेंटर कहते हैं.

अब कहानी का दिलचस्प हिस्सा समझिए. ये डेटा सेंटर सिर्फ बिजली नहीं खाते, इन्हें ठंडा रखने के लिए पानी भी लग सकता है. और जब यही व्यवस्था ऐसे इलाके में बनाई जाए, जहां लोगों को पहले से पीने और खेती के लिए पर्याप्त पानी नहीं मिल रहा हो, तब मामला सिर्फ तकनीक का नहीं रह जाता. सवाल उठता है कि पानी पहले किसे मिलेगा लोकल लोगों को, किसानों को या उस कंपनी को जो AI चलाने के लिए डेटा सेंटर बना रही है? हिंदुस्तान में यह सवाल इसलिए अहम हो गया है क्योंकि एक तरफ देश AI और डिजिटल वित्तीय स्थिति में तेजी से आगे बढ़ना चाहता है, दूसरी तरफ उसके कई शहर और इलाके पहले से पानी की कमी का सामना कर रहे हैं.

पहले समझिए, डेटा सेंटर पानी क्यों इस्तेमाल करता है?

डेटा सेंटर को आसान भाषा में इंटरनेट की मशीनों का घर समझिए. आप कोई वीडियो देखते हैं, ऑनलाइन पेमेंट करते हैं, ईमेल भेजते हैं या AI से सवाल पूछते हैं, तो आपके डेटा को संभालने और उस पर काम करने के लिए कंप्यूटरों की जरूरत पड़ती है. ये कंप्यूटर डेटा सेंटरों में रखे होते हैं. इन सर्वरों को लगातार चलाना पड़ता है. जितना ज्यादा काम, उतनी ज्यादा कंप्यूटिंग और आम तौर पर उतनी ही ज्यादा गर्मी. अब अगर मशीनों को ठंडा न रखा जाए, तो उनकी क्षमता घट सकती है, वे बंद हो सकती हैं या खराब भी हो सकती हैं.

यहीं पानी की एंट्री होती है. कई डेटा सेंटरों में कूलिंग टावर और दूसरे सिस्टम पानी की मदद से गर्मी बाहर निकालते हैं. कुछ व्यवस्थाओं में पानी भाफ बनकर उड़ जाता है. उसकी जगह नया पानी भरना पड़ता है. यानी पानी इस्तेमाल हुआ और उसका एक हिस्सा उसी स्थानीय जल स्रोत में तुरंत वापस नहीं लौटा.

पानी की कमी का असर समझने के लिए हैदराबाद इस समाचार को समझिये. दैनिक भास्कर की एक रिपोर्ट के मुताबिक, शहर में पानी के टैंकरों की मांग 233% बढ़ गई है और करीब 20 हजार बोरवेल सूखने की बात सामने आई. पानी की कमी का असर इतना था कि बासर की एक यूनिवर्सिटी में क्लासेज तक ऑनलाइन करनी पड़ीं. इससे समझ आता है कि पानी की कमी आम लोगों की जिंदगी कितनी मुश्किल बना सकती है. इसलिए कहीं नया डेटा सेंटर बनाने से पहले ये देखना जरूरी है कि वहां पानी की पर्याप्त व्यवस्था है या नहीं और उसके इस्तेमाल से स्थानीय लोगों के हिस्से का पानी तो कम नहीं पड़ेगा.

दुनिया में क्या हुआ? हिंदुस्तान क्या सीख सकता है?

डेटा सेंटरों की वजह से पानी की चिंता सिर्फ हिंदुस्तान में नहीं है. दूसरे देशों में भी इस बात पर सवाल उठे हैं कि बड़ी टेक कंपनियों को कितना पानी दिया जाए और इसका स्थानीय लोगों पर क्या असर पड़ेगा. चिली में Google के एक डेटा सेंटर को लेकर ऐसा ही मामला सामने आया. सैंटियागो के पास बनने वाले इस प्रोजेक्ट में पानी के इस्तेमाल पर चिंता जताई गई, क्योंकि इलाके में पहले से सूखे की समस्या रही है. फरवरी 2024 में चिली की पर्यावरण अदालत ने प्रोजेक्ट की मंजूरी पर दोबारा विचार करने को कहा. अदालत ने कहा कि पानी का आकलन करते समय जलवायु परिवर्तन के असर को भी ध्यान में रखना होगा. सिर्फ आज पानी कितना है, ये देखना काफी नहीं. आगे सूखा बढ़ा, तो क्या होगा, ये भी सोचना पड़ेगा.

स्पेन में भी डेटा सेंटरों के लिए पानी का इंतजाम चिंता की वजह बना. उत्तरी स्पेन के आरागॉन इलाके में Amazon के तीन प्रस्तावित डेटा सेंटरों को सालभर में करीब 75.60 करोड़ लीटर पानी की जरूरत पड़ने का अनुमान था. ऐसे में सवाल उठा कि इतना पानी आएगा कहां से और इससे खेती और वहां रहने वाले लोगों की जरूरतों पर क्या असर पड़ेगा. अमेरिका में भी डेटा सेंटरों में पानी और बिजली के इस्तेमाल को लेकर सवाल उठ रहे हैं. लेकिन पानी का हिसाब लगाने में एक पेंच है. कुछ कंपनियां सिर्फ डेटा सेंटर के अंदर इस्तेमाल होने वाले पानी को गिनती हैं, जबकि कुछ बिजली बनाने में खर्च हुए पानी को भी जोड़ती हैं. यानी डेटा सेंटर में पानी की पूरी खपत समझनी है, तो उसके लिए बिजली बनाने में खर्च हुए पानी को भी गिनना होगा.

यानी किसी कंपनी के हजारों करोड़ रुपये लगाने के वादे भर से मंजूरी नहीं मिलनी चाहिए. यह भी देखना होगा कि प्रोजेक्ट पर प्रशासनी संसाधनों का कितना खर्च आएगा और बदले में असल फायदा कितना मिलेगा. हालांकि, यह फ्रेमवर्क अपने आप में पूरे देश पर लागू होने वाला बाध्यकारी कानून नहीं है. इसका असर इस बात पर निर्भर करेगा कि राज्य प्रशासनें इसे अपने नियमों और मंजूरी की प्रक्रिया में कैसे अपनाती हैं.

डेटा सेंटर भी चलें और पानी भी बचे, कैसे निकलेगा रास्ता?

डेटा सेंटर की जगह सोच-समझकर चुनें. सिर्फ सस्ती जमीन और तेज इंटरनेट काफी नहीं. ऐसी जगह चुननी होगी जहां पानी की कमी कम हो और भविष्य में सूखे का खतरा भी कम हो. इससे डेटा सेंटर और स्थानीय लोगों के बीच पानी को लेकर टकराव का खतरा घटेगा.

ट्रीट किए गए पानी का इस्तेमाल बढ़ाएं. सीवेज को साफ करके डेटा सेंटर में इस्तेमाल किया जा सकता है. इससे पीने और खेती के काम आने वाले साफ पानी पर दबाव घटेगा. लेकिन इसके लिए पानी साफ करने के प्लांट, पाइपलाइन और नियमित सप्लाई की जरूरत होगी.

पानी बचाने वाली कूलिंग तकनीक अपनाएं. एयर कूलिंग और पानी को बार बार इस्तेमाल करने वाले सिस्टम से पानी की खपत घट सकती है. लेकिन इनके लिए बिजली कितनी लगेगी, यह भी देखना होगा. फायदा तभी है, जब पानी की बचत के साथ बिजली और पर्यावरण पर पड़ने वाला कुल असर भी कम रहे.

पानी के इस्तेमाल का पूरा हिसाब सार्वजनिक करें. कंपनियां बताएं कि डेटा सेंटर में सीधे कितना पानी खर्च होता है और बिजली बनाने में अप्रत्यक्ष रूप से कितना पानी लगता है. इन आंकड़ों की स्वतंत्र जांच हो. इससे प्रशासन और स्थानीय लोगों को पता चलेगा कि पानी कितना खर्च हो रहा है और बचत के दावे सही हैं या नहीं.

स्थानीय लोगों की जरूरतों को प्राथमिकता दें. मंजूरी से पहले यह तय हो कि डेटा सेंटर के लिए पानी जुटाने से गांवों, शहरों और खेती की सप्लाई पर असर तो नहीं पड़ेगा. नई पाइपलाइन या बिजली जैसी सुविधाओं पर खर्च कौन करेगा, यह भी पहले तय हो. इससे सार्वजनिक संसाधनों का बोझ स्थानीय लोगों पर डालने से बचा जा सकेगा.

सीधी बात ये कि डेटा सेंटर बनें, निवेश भी आए और रोजगार भी मिले. लेकिन इसकी कीमत लोगों के पीने के पानी और खेती को चुकानी न पड़े.

AI की तरक्की भी जरूरी, लेकिन लोगों के पानी की कीमत पर नहीं

हिंदुस्तान को डेटा सेंटर चाहिए. AI से लेकर क्लाउड सेवाओं, डिजिटल पेमेंट और दूसरी ऑनलाइन सुविधाओं तक, सबके लिए इनकी जरूरत है. इनसे निवेश आएगा, रोजगार मिलेंगे और तकनीक का विकास होगा. लेकिन निवेश के नाम पर पानी की कमी को नजरअंदाज भी नहीं किया जा सकता. और पानी बचाने का मतलब यह भी नहीं कि हर डेटा सेंटर पर रोक लगा दी जाए.

रास्ता साफ है. डेटा सेंटर सही जगह बनें, पानी बचाने वाली तकनीक अपनाएं, पानी के इस्तेमाल का हिसाब सार्वजनिक करें और प्रशासन यह देखे कि कंपनियों को मदद देने के बदले देश और स्थानीय लोगों को असल फायदा कितना मिल रहा है. क्योंकि AI कुछ सेकंड में जवाब दे सकता है, लेकिन भूजल घटने और पानी की व्यवस्था बिगड़ने का नुकसान सालों तक झेलना पड़ सकता है.

इसलिए अगली बार जब कोई कंपनी हजारों करोड़ रुपये के डेटा सेंटर का ऐलान करे, तो सिर्फ निवेश का जश्न मत मनाइए. तीन सवाल पूछिए: पानी कहां से आएगा? क्या इसकी कीमत स्थानीय लोगों को पानी की कमी झेलकर चुकानी पड़ेगी? और मुनाफा कंपनी कमाएगी, तो पानी और बिजली पर बढ़ते बोझ की जिम्मेदारी कौन लेगा?

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विनोद झा
संपादक नया विचार

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