इजराइल की चुनावी व्यवस्था हिंदुस्तान से अलग है. यहां मतदाता सीधे प्रधानमंत्री नहीं चुनते, बल्कि नेतृत्वक पार्टी को वोट देते हैं. चुनाव के बाद प्रशासन बनाने के लिए पार्टियों को एक-दूसरे का समर्थन जुटाना पड़ता है. ऐसे में छोटी पार्टियां भी प्रशासन बनाने और उसे चलाने में अहम भूमिका निभा सकती हैं.
इजराइल में चुनाव कैसे होते हैं?
इजराइल का आकार पूर्वोत्तर हिंदुस्तान के मिजोरम राज्य के लगभग बराबर है. वहां आनुपातिक प्रतिनिधित्व की राष्ट्रव्यापी चुनाव प्रणाली लागू है. इजराइल में संसद के चुनाव होते हैं. पूरे देश को एक ही निर्वाचन क्षेत्र माना जाता है, जहां से संसद यानी नेसेट के 120 सदस्य चुने जाते हैं. संसद का कार्यकाल चार साल का होता है, हालांकि नेतृत्वक अस्थिरता के कारण कई बार समय से पहले चुनाव कराने पड़ते हैं.
इजराइल में 18 साल या उससे अधिक उम्र के नागरिक मतदान कर सकते हैं. मतदाता किसी एक उम्मीदवार के बजाय नेतृत्वक पार्टी की सूची को वोट देते हैं. चुनाव में जिस पार्टी को जितने प्रतिशत वोट मिलते हैं, उसी अनुपात में उसे संसद में सीटें मिलती हैं.
संसद में प्रवेश के लिए किसी पार्टी को देशभर में कम से कम 3.25 फीसदी वोट हासिल करना जरूरी है. यह सीमा पार करने वाली पार्टियों को मिले वोटों के अनुपात में 120 सीटें बांटी जाती हैं.
चुनाव के बाद प्रधानमंत्री कैसे चुना जाएगा?
इजराइल में सबसे ज्यादा वोट पाने वाली पार्टी का नेता अपने आप प्रधानमंत्री नहीं बन जाता. चुनाव के नतीजों के बाद राष्ट्रपति सभी प्रमुख नेतृत्वक दलों से सलाह-मशविरा करते हैं और उस सांसद को प्रशासन बनाने का मौका देते हैं, जिसके पास बहुमत जुटाने की सबसे बेहतर संभावना होती है.
इसके बाद संबंधित नेता को गठबंधन बनाने के लिए निर्धारित समय मिलता है. सामान्य प्रक्रिया में 28 दिन का समय दिया जाता है, जिसे 14 दिन तक बढ़ाया जा सकता है. प्रशासन बनने के लिए संसद का समर्थन हासिल करना जरूरी है.
अगर पहला नेता प्रशासन बनाने में नाकाम रहता है, तो किसी दूसरे उम्मीदवार को मौका दिया जा सकता है. यदि कोई भी उम्मीदवार जरूरी समर्थन नहीं जुटा पाता, तो नए चुनाव की नौबत आ सकती है.
प्रशासन बनाने के लिए गठबंधन क्यों जरूरी है?
इजराइल में अब तक किसी एक पार्टी को संसद की सभी 120 सीटों में से बहुमत हासिल नहीं हुआ है. प्रशासन बनाने के लिए उस उम्मीदवार को कम से कम 61 सांसदों का समर्थन हासिल करना होता है. इसलिए चुनाव के बाद कई पार्टियां मिलकर गठबंधन प्रशासन बनाती हैं.
उदाहरण के तौर पर, अगर किसी पार्टी को सबसे ज्यादा सीटें मिलती हैं, लेकिन उसके पास बहुमत नहीं है, तो उसे दूसरी पार्टियों का समर्थन लेना पड़ता है. इसके लिए मंत्री पद और नीतियों को लेकर समझौते भी करने पड़ सकते हैं.
यही वजह है कि कम सीटें जीतने वाली पार्टियां भी प्रशासन बनाने में अहम हो जाती हैं. अगर गठबंधन में शामिल कोई बड़ी या छोटी पार्टी समर्थन वापस ले ले, तो प्रशासन का बहुमत खतरे में पड़ सकता है.
नेतन्याहू के सामने कौन-कौन हैं?
इस चुनाव में प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू और उनकी पार्टी लिकुड (Likud) के सामने विपक्ष के कई नेता चुनौती पेश कर रहे हैं.
- गादी आइजेनकोट: इजराइल के पूर्व सैन्य प्रमुख और याशर पार्टी के नेता. उन्हें नेतन्याहू के प्रमुख प्रतिद्वंद्वियों में गिना जा रहा है.
- नफ्ताली बेनेट: इजराइल के पूर्व प्रधानमंत्री. वह पहले भी नेतन्याहू के खिलाफ विपक्षी दलों को एकजुट करने में भूमिका निभा चुके हैं.
- यायर लैपिड: इजराइल के पूर्व प्रधानमंत्री और विपक्ष के प्रमुख नेताओं में शामिल.
- अविग्दोर लिबरमैन: पूर्व रक्षा मंत्री और नेतन्याहू के पुराने सहयोगी, जो बाद में उनके मुखर आलोचक बन गए.
इन नेताओं के अलावा यायर गोलान के नेतृत्व वाले वामपंथी दल डेमोक्रेट्स और अरब समुदाय का प्रतिनिधित्व करने वाली पार्टियां भी चुनावी मुकाबले का हिस्सा हैं.
नेतन्याहू की लोकप्रियता पर सवाल क्यों?
7 अक्टूबर 2023 को हमास के हमले के बाद इजराइल की सुरक्षा व्यवस्था और प्रशासन की जवाबदेही को लेकर सवाल उठे थे. इसके बाद गाजा में युद्ध शुरू हुआ और संघर्ष का विस्तार लेबनान तथा ईरान तक हुआ.
रॉयटर्स की 29 जुलाई 2026 की रिपोर्ट के मुताबिक, कई सर्वेक्षणों में नेतन्याहू की हार की संभावना जताई गई थी. हमास के हमले के बाद उनकी सुरक्षा संबंधी छवि को नुकसान पहुंचा. इसके अलावा धर्म और राज्य के संबंधों को लेकर प्रशासन की नीतियां भी इजरायल के कई नागरिकों के बीच अलोकप्रिय रही हैं.
हालांकि, नेतन्याहू इजराइल के सबसे लंबे समय तक प्रधानमंत्री रहने वाले नेताओं में शामिल हैं और उन्हें नेतृत्वक गठबंधन बनाने का लंबा अनुभव है. दक्षिणपंथी लिकुड पार्टी के नेता नेतन्याहू 1996 से तीन अलग-अलग अवधियों में लगभग 19 साल तक इजराइल के प्रधानमंत्री रह चुके हैं. इसलिए सर्वेक्षणों में पिछड़ने के बावजूद उनकी वापसी की संभावना को पूरी तरह खारिज नहीं किया जा सकता.
नेतन्याहू के साथ कौन-कौन सी पार्टियां हैं?
नेतन्याहू के खेमे में उनकी अपनी दक्षिणपंथी पार्टी लिकुड के अलावा बेजलेल स्मोट्रिच की धार्मिक राष्ट्रवाद से जुड़ी पार्टी और इतामार बेन-ग्विर की यहूदी पावर पार्टी शामिल हैं.
अति-रूढ़िवादी यहूदी समुदाय का प्रतिनिधित्व करने वाली शास और यूनाइटेड टोरा जूडिज्म जैसी पार्टियां भी सत्ता के समीकरण में अहम हैं. इन पार्टियों की सैन्य सेवा से छूट संबंधी मांगें प्रशासन के भीतर विवाद का विषय रही हैं.
विपक्षी खेमे में आइजेनकोट, बेनेट, लैपिड, लिबरमैन और अन्य दल शामिल हैं. लेकिन विपक्ष के सामने सबसे बड़ी चुनौती सिर्फ नेतन्याहू को हराना नहीं, बल्कि चुनाव के बाद ऐसा गठबंधन बनाना भी है जो संसद में बहुमत जुटा सके.
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