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Bokaro News : डीवीसी एसटीएम अस्पताल में डॉक्टरों की कमी से मरीज परेशान

Bokaro News : डीवीसी एसटीएम अस्पताल चंद्रपुरा में चिकित्सकों की कमी से मरीजों को परेशानी हो रही है. स्थिति यह है कि अस्पताल प्रबंधन को अब दूसरे प्रोजेक्टों से चिकित्सक बुलाकर काम चलाना पड़ रहा है. 60 साल के अपने समय काल में सबसे बुरी स्थिति में अस्पताल संचालित हो रहा है. चिकित्सकों की कमी के कारण अधिकांश बीमारियों में मरीज को रेफर कर दिया जाता है. डीवीसी कर्मी तो डीवीसी से टाइअप अस्पतालों में रेफर करा कर अपना इलाज करा लेते हैं, मगर 15 किलोमीटर की परिधि में निवास करने वाले ग्रामीणों व आम लोगों को काफी परेशानी होती है. यहां चिकित्सकों, नर्सिंह व स्टॉफ की भारी कमी है. मेडिसिन, सर्जन, जेनरल डाक्टर तो हैं, मगर यहां गायनोकोलोजिस्ट, इएनटी, हड्डी, दंत विशेषज्ञ सहित बच्चों के डॉक्टर नहीं हैं. इस अस्पताल में वर्तमान में दो डीसीएमओ, दो विशेषज्ञ के अलावा तीन अन्य चिकित्सक पदस्थापित हैं. सात चिकित्सकों में से एक डीजीएम सह प्रभारी डॉ पीके घोष आफिस का काम देखते हैं, जबकि एक चिकित्सक को प्लांट में ड्यूटी दी गयी है, अस्पताल में डॉ एके श्रीवास्तव सर्जन हैं, जो रेफर हुए मरीजों को देखते हैं, जबकि डॉ ए तिग्गा एनेसथिसिया के डॉक्टर हैं. तीन अन्य डॉक्टरों के ऊपर इस अस्पताल व सीएसआर क्षेत्र में जाकर इलाज करने की ड्यूटी है. जनवरी महीने में यहां अनुबंध पर नियुक्त डॉ अनुपम सिन्हा व निधि सिन्हा को प्रबंधन द्वारा सेवा विस्तार नहीं दिये जाने के कारण उन्हें बैठा दिया गया है. जबकि दोनों चिकित्सकों के पास मरीजों की काफी भीड़ हुआ करती थी.

बता दें कि तीन चिकित्सक की ड्यूटी शिफ्ट में रहने के कारण सुबह-शाम आउटडोर में जब इलाज कराने मरीज आते हैं, उस समय चिकित्सक की कमी दिखती है. फिलहाल एक दो चिकित्सक के भरोसे यह अस्पताल चल रहा है. यदि कोई चिकित्सक छुट्टी पर चले जाते हैं तो विकट स्थिति हो जाती है. डॉक्टरों की कमी के बीच अस्पताल प्रबंधन अब मैथन, पंचेत, मेजिया व बोकारो थर्मल अस्पताल से डॉक्टर को बुलाकर काम चला रहे हैं. बता दें कि वर्तमान में चंद्रपुरा प्लांट में एक हजार से उपर डीवीसी कर्मी अधिकारी, ठेका मजदूर व सीआइएसएफ के जवान हैं, जो बीमारी में अपना इलाज कराने इस अस्पताल में आते हैं.

चंद्रपुरा अस्पताल से हो चुका है कई चिकित्सकों का ट्रांसफर :

हाल के महीनों में इस अस्पताल से कई अच्छे चिकित्सकों का स्थानांतरण हुआ है. डॉ बी सुदर्शन व डॉ एक्का को बोकारो थर्मल, डॉ लक्ष्मण सोरेन को मैथन, डॉ. पी कुमार का स्थानांतरण कोडरमा कर दिया गया है. स्थायीकरण के इंतजार में काफी समय गुजार चुके अनुबंध पर कार्यरत चिकित्सक, नर्सिंग व स्टॉफ अपने भविष्य को देखते हुए भी डीवीसी के इस अस्पताल को छोड़ चुके हैं. नर्सिंग स्टॉफ की कमी के कारण ही यहां मेल वार्ड वर्षों से बंद है, जबकि एक छोटे वार्ड में मेल वार्ड चलाया जा रहा है.

डॉक्टर की कमी से हो रही है परेशानी : प्रभारी

एसटीएम अस्पताल के डीसीएमओ सह प्रभारी डॉ पीके घोष ने कहा कि यहां चिकित्सक की कमी है जिससे परेशानी है. इधर विभिन्न प्रोजेक्ट के अस्पताल से डाक्टर को बुलाया जा रहा है ताकि कम से कम शिफ्ट का काम हो सके. उन्होंने बताया कि इस अस्पताल में जितने मरीज आतें है उसमें 30 प्रतिशत हीं डीवीसी के होतें है बाकि गैर डीवीसी कर्मी मरीज होते हैं, जो इसी अस्पताल पर निर्भर है. दो नये अनुबंधित डॉक्टर की नियुक्ति हुई है, मगर एक ने ही योगदान दिया है. उन्होंने बताया कि मुख्यालय स्तर से डाक्टरों की नियुक्ति निकाली गयी थी, मगर मामला कोर्ट में जाने से नियुक्ति नहीं हो पायी.

अस्पताल में नहीं है हार्ट स्पेशियलिस्ट : अनिल प्रसाद

डीवीसी स्टॉफ एसोसिएशन के केंद्रीय सचिव व डीवीसी कर्मी अनिल प्रसाद ने कहा कि एसटीएम अस्पताल में डाक्टरों की कमी है. यहां हार्ट स्पेशियलिस्ट चिकित्सक नहीं रहने से दिल की बीमारी से ग्रसित मरीजों को दिक्कतें हो रही है.

चिकित्सकों की कमी का मामला कई बार उठाया: राजीव तिवारीडीवीसी श्रमिक यूनियन के चंद्रपुरा शाखा सचिव राजीव तिवारी ने कहा कि डीवीसी प्रबंधन के साथ बैठकों में कई बार इस मामले को उठाया. पत्र के माध्यम से भी चिकित्सक उपलब्ध कराने की मांग की गयी मगर अब तक यह पूरा नहीं हो पाया है. .

इस अस्पताल पर निर्भर है आसपास के ग्रामीण: बिगन महतोघटियारी गांव के ग्रामीण बिगन महतो का कहना है कि डीवीसी प्रबंधन को अपने कमांड एरिया में चिकित्सा की सुविधा उपलब्ध करानी है. यहां आसपास के 15 किलोमीटर परिधि के ग्रामीण इलाज को इसी अस्पताल पर निर्भर हैं.

डीवीसी को हो रहा है आर्थिक नुकसान : धीरेंद्र ठाकुरचंद्रपुरा प्लांट के रिटायर कर्मी व न्यू पिपराडीह निवासी धीरेंद्र ठाकुर ने कहा कि चंद्रपुरा अस्पताल में इलाज की सही व्यवस्था नहीं है. इसी वजह से डीवीसी के मरीज यहां से टाइअप दूसरे अस्पतालों में चले जाते हैं, जिससे डीवीसी को आर्थिक नुकसान होता है.

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विनोद झा
संपादक नया विचार

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