–डॉ बीरेंद्र कुमार महतो–
Sushila Samad Jayanti : सुशीला समद एक विदुषी स्त्री थीं और उन्हें हिंदी साहित्य की पहली आदिवासी स्त्री कवयित्री होने का गौरव प्राप्त है. उनकी प्रतिभा से हिंदी साहित्य के विद्वान अभिभूत थे. सुशीला समद का सृजन संसार हिंदुस्तानीय साहित्य का एक अनूठा और महत्वपूर्ण अध्याय है, जो न सिर्फ आदिवासी समाज की ऐतिहासिक, सामाजिक व सांस्कृतिक चेतना को प्रतिबिंबित करता है, बल्कि उनकी अस्मिता, संघर्ष, लोकपरंपराओं और सामूहिक चेतना को भी स्वर प्रदान करता है.
सुशीला समद ने प्रयाग स्त्री विद्यापीठ से की पढ़ाई
सुशीला समद का जन्म मुंडा आदिवासी परिवार में 7 जून 1906 को झारखंड के पश्चिम सिंहभूम जिले में हुआ था. उन्होंने प्रयाग स्त्री विद्यापीठ से हिंदी की पढ़ाई पूरी की थी और विनोदिनी की परीक्षा पास की थी. उन्होंने विदुषी की डिग्री भी हासिल की थी. सुशीला समद प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण हुई थीं. सुशीला समद हिंदी की कवयित्री के साथ- साथ एक पत्रकार, संपादक और प्रकाशक भी थीं. हिंदी के अलावा उन्होंने अपनी मातृभाषा मुंडारी भाषा में भी कविताएं लिखी थीं. उन्होंने स्वतंत्रता आंदोलन में भी हिस्सा लिया था. इतना ही नहीं सुशीला समद स्त्रीओं को संगठित भी करतीं थीं.
हिंदी साहित्य की पहली आदिवासी स्त्री कवयित्री
सुशीला समद जो हिंदी साहित्य की पहली आदिवासी स्त्री कवयित्री मानी जाती हैं, उन्होंने अपने काव्य और गद्य लेखन के माध्यम से आदिवासी समाज की आवाज को हिंदी साहित्य में एक सशक्त स्थान दिलाने का प्रयास किया. वर्तमान दौर में हिंदुस्तानीय साहित्य में आदिवासी लेखन की अपनी एक स्वतंत्र पहचान है,तो इसमें सुशीला समद का महत्वपूर्ण योगदान है. उन्होंने आदिवासी लेखन की परंपरा को समृद्ध बनाया है. उनका साहित्यिक संसार मुख्यधारा के साहित्य से भिन्न एक ऐसी वैकल्पिक धारा प्रस्तुत करता है, जो हाशिए पर पड़े समुदायों की वास्तविकताओं को सामने लाने के साथ-साथ साहित्य की पारंपरिक परिभाषाओं को भी चुनौती देता है. इनकी कविता महज रचनात्मक अभिव्यक्ति नहीं है, बल्कि यह उनके समाज, परंपराओं, संघर्षों, विस्थापन, पर्यावरणीय विनाश, स्त्री अधिकारों और सामाजिक अन्याय के खिलाफ मुखर अभिव्यक्ति भी है.
सुशीला समद ने सामाजिक-सांस्कृतिक और साहित्यिक जिम्मेदारियों का निर्वहन किया. वर्ष 1925 से 1930 तक उन्होंने साहित्यिक-सामाजिक पत्रिका ‘चांदनी’ का संपादन और प्रकाशन भी किया. वर्ष 1935 में उनकी एक कविता संग्रह प्रकाशित हुई थी – ‘प्रलाप’. इसके बाद वर्ष 1948 में ‘सपनों का संसार’ नामक कविता संग्रह प्रकाशित हुई. 10 दिसंबर 1960 को उनका निधन हो गया.
(लेखक रांची विश्वविद्यालय के नागपुरी भाषा विभाग में असिस्टेंट प्रोफेसर हैं)
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