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228 KM पदयात्रा, बॉर्डर सील और पुलिस का पहरा: जानिए किन मांगों को लेकर दिल्ली कूच कर रहे किसान

Farmers Delhi March: किसान खनौरी बॉर्डर (पंजाब-हरियाणा) से दिल्ली के जंतर-मंतर तक पैदल यात्रा पर निकल चुके हैं. यात्रा का समापन 29 अगस्त को दिल्ली में एक बड़ी किसान पंचायत के साथ होना है. क्यों पद यात्रा कर रहे हैं किसान? किसान संगठनों का कहना है कि यह पदयात्रा मुख्य रूप से दो प्रमुख मांगों और मुद्दों को लेकर निकाली जा रही है. MSP की कानूनी गारंटी: किसान लंबे समय से सभी फसलों की एमएसपी पर प्रशासनी खरीद के लिए कानून बनाने की मांग कर रहे हैं. हिंदुस्तान-अमेरिका व्यापार समझौते का विरोध: किसान नेताओं का दावा है कि प्रस्तावित हिंदुस्तान-अमेरिका ट्रेड डील से हिंदुस्तानीय कृषि क्षेत्र और देश के किसानों पर बेहद प्रतिकूल और नकारात्मक प्रभाव पड़ेगा. सीमा पर तनाव, पुलिस ने लगाया बैरिकेडिंग पदयात्रा को हरियाणा में प्रवेश करने से रोकने के लिए पुलिस ने खनौरी बॉर्डर पर कंक्रीट के बड़े-बड़े बैरिकेड्स, कंटीले तार और दंगा नियंत्रण वाहन तैनात कर दिए हैं. जींद जिले के पुलिस अधिकारियों के अनुसार, किसानों के पास इस पदयात्रा को निकालने की प्रशासनिक अनुमति नहीं है. इसके अलावा किसान नेताओं ने आरोप लगाया है कि यात्रा शुरू होने से पहले ही हरियाणा पुलिस ने कई किसान कार्यकर्ताओं को अलग-अलग जगहों पर हिरासत में ले लिया है. प्रशासन का किसान विरोधी चेहरा बेनकाब : जगजीत सिंह डल्लेवाल संयुक्त किसान मोर्चा (गैर-नेतृत्वक) के वरिष्ठ नेता जगजीत सिंह डल्लेवाल ने बताया कि इस अनुशासित और शांतिपूर्ण पदयात्रा में देश के विभिन्न हिस्सों से 51 किसान शामिल हो रहे हैं, जिनके साथ लगभग 200 स्वयंसेवक मौजूद हैं. डल्लेवाल ने कहा, “पहले प्रशासन को समस्या थी जब किसान ट्रैक्टर-ट्रॉली लेकर आते थे. अब जब 51 किसानों का एक छोटा समूह पैदल दिल्ली जाना चाहता है, तब भी उन्हें रोका जा रहा है. इससे साबित होता है कि रास्ता किसान नहीं, बल्कि प्रशासन खुद रोकती है और उसका किसान विरोधी चेहरा सामने आ रहा है.” केंद्रीय मंत्रियों से बातचीत पर अड़े किसान किसान नेता ने साफ किया कि हरियाणा पुलिस के साथ शुरुआती दौर की वार्ता में राज्य के मुख्यमंत्री के साथ बैठक का प्रस्ताव आया था, जिसे किसानों ने नकार दिया. डल्लेवाल के मुताबिक, “हरियाणा के मुख्यमंत्री से बातचीत से समस्या का हल नहीं निकलेगा. इस मुद्दे के समाधान के लिए केंद्रीय कृषि मंत्री या केंद्र प्रशासन के किसी वरिष्ठ प्रतिनिधिमंडल के साथ बैठक की जरूरत है.” सीमा पर शांतिपूर्वक डटे रहेंगे : किसान नेता किसान नेताओं ने घोषणा की है कि वे सीमा पर शांतिपूर्वक डटे रहेंगे और यदि केंद्र प्रशासन की ओर से कोई सकारात्मक पहल नहीं होती है, तो वे अपने तय कार्यक्रम के अनुसार दिल्ली की ओर आगे बढ़ने का प्रयास करेंगे. ये भी पढ़ें: JPSC Student Protest: क्या प्रेशर में आ गई कांग्रेस, 20 अगस्त से पहले छात्रों से होगी बात? The post 228 KM पदयात्रा, बॉर्डर सील और पुलिस का पहरा: जानिए किन मांगों को लेकर दिल्ली कूच कर रहे किसान appeared first on Naya Vichar.

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UP में 2027 का मुकाबला होगा रोचक: क्या ब्राह्मण वोट बैंक में सेंध लगा पाएगा विपक्ष? आंकड़े कुछ और, सियासी संकेत कुछ और

UP Politics: उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनाव की सियासी बिसात अभी पूरी तरह बिछी भी नहीं है, लेकिन जातीय समीकरणों की हलचल तेज हो गई है. खासतौर पर ब्राह्मण मतदाताओं को लेकर भाजपा, समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी के बीच खींचतान बढ़ती दिख रही है. विपक्ष जहां भाजपा के परंपरागत ऊपरी जाति समर्थन में सेंध लगाने की कोशिश कर रहा है, वहीं भाजपा भी अपने सामाजिक समीकरण को साधने में जुटी है. हालांकि, यह दावा करना कि ब्राह्मणों का भाजपा से बड़े पैमाने पर मोहभंग हो चुका है, मौजूदा उपलब्ध चुनावी आंकड़ों से साबित नहीं होता. इसके उलट 2024 के लोकसभा चुनाव के CSDS-लोकनीति पोस्ट-पोल आंकड़ों के मुताबिक उत्तर प्रदेश में करीब 74 प्रतिशत ब्राह्मण मतदाताओं ने भाजपा नीत गठबंधन को वोट दिया, जबकि करीब 19 प्रतिशत ने सपा-कांग्रेस गठबंधन का समर्थन किया. 2019 में भाजपा+ के पक्ष में यह आंकड़ा करीब 84 प्रतिशत था. यानी पांच साल में भाजपा का ब्राह्मण समर्थन घटा जरूर, लेकिन समुदाय का बड़ा हिस्सा अब भी भाजपा के साथ रहा. 2024 का चुनाव बना पहला बड़ा संकेत 2024 के लोकसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश में भाजपा को बड़ा झटका लगा. 2019 में 62 सीट जीतने वाली भाजपा 2024 में घटकर 33 पर आ गई, जबकि सपा 37 और कांग्रेस छह सीटों पर पहुंची. CSDS-लोकनीति के आंकड़े बताते हैं कि भाजपा के समर्थन में सबसे स्पष्ट गिरावट पिछड़े और कुछ अन्य सामाजिक समूहों में रही, जबकि ब्राह्मण मतदाताओं का बड़ा हिस्सा अब भी भाजपा के साथ था. यही वजह है कि 2027 के लिए ब्राह्मण वोट को लेकर भाजपा विरोधी दलों की उम्मीद बढ़ी है. मगर इसे भाजपा से पूरी तरह टूट चुका वोट बैंक मान लेना जल्दबाजी होगी. फिर क्यों बढ़ी ‘ब्राह्मण नाराजगी’ की चर्चा? दरअसल, पिछले कुछ महीनों में भाजपा के भीतर ब्राह्मण विधायकों और नेताओं की सक्रियता ने इस चर्चा को हवा दी है. दिसंबर 2025 में भाजपा के तीन दर्जन से ज्यादा ब्राह्मण विधायक और विधान परिषद सदस्य लखनऊ में एक भोज में जुटे थे. बैठक को लेकर पार्टी के भीतर नेतृत्वक चर्चा हुई. इसके बाद प्रदेश भाजपा अध्यक्ष पंकज चौधरी ने जातीय आधार पर इस तरह की गोलबंदी को लेकर सार्वजनिक रूप से नाराजगी जताई थी. इस घटनाक्रम को नेतृत्वक विश्लेषकों ने सिर्फ सामाजिक भोज नहीं, बल्कि पार्टी के भीतर प्रतिनिधित्व और नेतृत्वक हिस्सेदारी को लेकर उठ रहे सवालों के संकेत के तौर पर भी देखा. हालांकि, यह भी ध्यान रखना जरूरी है कि भोज में शामिल नेताओं ने इसे औपचारिक नेतृत्वक बैठक नहीं बताया था. भाजपा में प्रतिनिधित्व का सवाल कितना सही? ब्राह्मणों की नाराजगी के दावे की दूसरी तरफ आंकड़े भाजपा के लिए राहत देने वाले भी हैं. जनवरी 2026 की एक रिपोर्ट में उपलब्ध संगठनात्मक और मंत्रिमंडलीय आंकड़ों के विश्लेषण के आधार पर बताया गया कि यूपी भाजपा के 45 प्रमुख संगठनात्मक पदों में नौ ब्राह्मण थे, जबकि योगी मंत्रिमंडल में सात ब्राह्मण मंत्री थे. यानी यह कहना भी सही नहीं होगा कि भाजपा ने ब्राह्मणों को पूरी तरह नेतृत्वक प्रतिनिधित्व से बाहर कर दिया है. मई 2026 के मंत्रिमंडल विस्तार में भी ब्राह्मण चेहरे के रूप में सपा से भाजपा में आए मनोज पांडेय को कैबिनेट मंत्री बनाया गया. हालांकि विस्तार का बड़ा फोकस ओबीसी और दलित प्रतिनिधित्व पर रहा. अखिलेश ने बदला PDA का ‘P’! भाजपा के लिए सबसे बड़ी चुनौती यह है कि विपक्ष अब सिर्फ मुस्लिम, यादव या दलित समीकरण तक सीमित नहीं रहना चाहता. समाजवादी पार्टी ने ब्राह्मणों तक पहुंच बढ़ाने की रणनीति तेज कर दी है. अगस्त 2026 में अखिलेश यादव ने PDA में ‘P’ को ‘पंडित’ के अर्थ में भी इस्तेमाल करने की बात कही. इससे साफ संकेत मिलता है कि सपा 2027 में अपने सामाजिक गठबंधन का दायरा ऊंची जातियों तक बढ़ाना चाहती है. इससे पहले जून में भी सपा ने ब्राह्मण नेताओं की बैठक कर समुदाय के बीच अपना संदेश मजबूत करने की कोशिश की थी. मायावती भी पुराने ‘ब्राह्मण-दलित’ फॉर्मूले की ओर बहुजन समाज पार्टी भी ब्राह्मण मतदाताओं को दोबारा अपने पाले में लाने की कोशिश कर रही है. पार्टी 2007 के अपने पुराने सामाजिक इंजीनियरिंग मॉडल को नए रूप में खड़ा करने की कोशिश कर रही है. रिपोर्टों के मुताबिक बसपा संगठन में ब्राह्मणों को ज्यादा भूमिका देने और 2027 के लिए पर्याप्त संख्या में ब्राह्मण उम्मीदवार उतारने की रणनीति पर काम कर रही है. इसका मतलब साफ है—ब्राह्मण वोट को लेकर मुकाबला अब एकतरफा नहीं रह गया है. फैक्ट चेक: क्या सचमुच भाजपा से टूट रहा है ब्राह्मण वोट? दावा: ब्राह्मणों का भाजपा से बड़े पैमाने पर मोहभंग हो चुका है. फैक्ट: अभी उपलब्ध प्रमुख चुनावी आंकड़े इस दावे की पुष्टि नहीं करते. 2024 में करीब 74% ब्राह्मण मतदाताओं का भाजपा+ के पक्ष में जाना बताता है कि समुदाय का बड़ा हिस्सा अब भी भाजपा के साथ है. हालांकि 2019 के करीब 84% से यह समर्थन घटा है. दूसरा तथ्य: भाजपा के भीतर ब्राह्मण विधायकों की सामुदायिक बैठक और प्रतिनिधित्व को लेकर चर्चाएं जरूर हुई हैं. तीसरा तथ्य: सपा और बसपा दोनों ब्राह्मणों को सक्रिय रूप से साधने में जुटे हैं. इसलिए फिलहाल सबसे सटीक निष्कर्ष यही है कि ‘ब्राह्मण भाजपा से पूरी तरह दूर हो गए हैं’ कहना गलत होगा, लेकिन भाजपा के लिए इस समुदाय में पहले जैसी स्वतःस्फूर्त नेतृत्वक पकड़ को लेकर चुनौती जरूर बढ़ी है. 2027 में निर्णायक हो सकता है ‘स्विंग वोट’ उत्तर प्रदेश में ब्राह्मणों की आबादी का अनुमान विभिन्न स्रोतों में अलग-अलग मिलता है, लेकिन नेतृत्वक विश्लेषणों में इसे आम तौर पर करीब 10-12 प्रतिशत के आसपास माना जाता है. कई विधानसभा क्षेत्रों में उनकी संख्या इससे भी अधिक प्रभावी हो सकती है. ऐसे में 2027 में पूरी तस्वीर इस बात पर निर्भर करेगी कि ब्राह्मण मतदाताओं का कितना हिस्सा भाजपा के साथ बना रहता है और कितना हिस्सा सपा, बसपा या किसी अन्य विकल्प की ओर जाता है. यानी असली सवाल ‘ब्राह्मण भाजपा के साथ हैं या नहीं’ से ज्यादा बड़ा है—क्या भाजपा 2024 में दिखाई पड़ी सामाजिक दरार को 2027 से पहले भर पाती है? अगर भाजपा ब्राह्मणों के साथ अपने पुराने भरोसे को कायम रखती है तो विपक्ष की सेंध सीमित रह सकती है. लेकिन यदि ब्राह्मण वोट का एक महत्वपूर्ण

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VIDEO: एज एंड टेकन… धनंजय डी सिल्वा का हैरतअंगेज कैच, ध्रुव जुरेल को 51 रन पर भेजा पवेलियन

Dhananjaya de Silva Stunning Catch: हिंदुस्तान और श्रीलंका के बीच गॉल इंटरनेशनल क्रिकेट स्टेडियम में स्पोर्ट्से जा रहे पहले टेस्ट के दूसरे दिन एक ऐसा पल देखने को मिला, जिसने हर किसी का ध्यान अपनी ओर खींच लिया. हिंदुस्तानीय बल्लेबाज ध्रुव जुरेल अच्छी लय में नजर आ रहे थे और अपना अर्धशतक पूरा कर चुके थे, लेकिन प्रभात जयसूर्या की गेंद पर लगा हल्का सा एज सीधे स्लिप में खड़े श्रीलंकाई कप्तान धनंजय डी सिल्वा के पास पहुंचा. इसके बाद धनंजय ने हवा में छलांग लगाते हुए एक हाथ से ऐसा कैच पकड़ा कि जुरेल को 51 रन पर पवेलियन लौटना पड़ा. हवा में छलांग लगाकर लपकी गेंद यह घटना हिंदुस्तानीय पारी के 110वें ओवर की पहली गेंद पर हुई. प्रभात जयसूर्या ने गेंद को फ्लाइट देते हुए मिडिल और लेग स्टंप की ओर रखा. जुरेल ने आगे निकलकर गेंद को ऑन साइड में स्पोर्ट्सने की कोशिश की, लेकिन गेंद बल्ले का मुंह जल्दी बंद होने की वजह से सीधे नहीं गई और बल्ले का किनारा लगकर पहली स्लिप की दिशा में चली गई. वहां खड़े धनंजय डी सिल्वा ने गेंद को हवा में जाता देखा और बिना कोई मौका गंवाए अपनी दाईं ओर पूरी लंबाई में छलांग लगा दी. उन्होंने एक हाथ से गेंद को हवा में ही लपक लिया. कैच इतना शानदार था कि कुछ पल के लिए मैदान पर मौजूद खिलाड़ी भी हैरान नजर आए. पहले छूटा था जुरेल का कैच धनंजय का यह कैच इसलिए भी खास रहा क्योंकि उन्होंने इससे पहले जुरेल का एक मुश्किल कैच छोड़ दिया था. जुरेल जब 29 रन पर थे, तब भी धनंजय के पास उनका कैच लेने का मौका आया था, लेकिन गेंद उनके हाथों से निकल गई थी. इस बार श्रीलंकाई कप्तान ने कोई गलती नहीं की और बेहतरीन रिफ्लेक्स दिखाते हुए एक हाथ से कैच पकड़कर जुरेल की पारी का अंत कर दिया. Also Read: IND vs SL Test: बारिश रुकी तो श्रीलंकाई बॉलर्स पर बरसे पडिक्कल और ध्रुव, दूसरे दिन का स्पोर्ट्स समाप्त होने तक हिंदुस्तान 460/9 जुरेल ने स्पोर्ट्सी 51 रन की उपयोगी पारी ध्रुव जुरेल ने आउट होने से पहले 68 गेंदों में 51 रन बनाए. उनकी पारी में चार चौके और एक छक्का शामिल रहा. उन्होंने देवदत्त पडिक्कल के साथ 38 रन की साझेदारी की और बाद में मानव सुथार के साथ भी 55 रन जोड़े. जुरेल के आउट होने के बाद हिंदुस्तान का स्कोर 432/8 हो गया था. पडिक्कल की पारी से मजबूत स्थिति में हिंदुस्तान इससे पहले देवदत्त पडिक्कल ने शानदार 167 रन की पारी स्पोर्ट्सकर हिंदुस्तानीय पारी को मजबूती दी. केएल राहुल ने 82, ऋषभ पंत ने 39 और जुरेल ने 51 रन का योगदान दिया. दूसरे दिन का स्पोर्ट्स खत्म होने तक हिंदुस्तान ने 116 ओवर में 9 विकेट खोकर 460 रन बना लिए थे. कुलदीप यादव 12 और प्रसिद्ध कृष्णा 1 रन बनाकर नाबाद रहे. अब तीसरे दिन हिंदुस्तानीय टीम की कोशिश आखिरी विकेट के साथ कुछ और रन जोड़ने की होगी, जबकि श्रीलंका जल्द से जल्द हिंदुस्तान की पारी समेटकर अपनी बल्लेबाजी शुरू करना चाहेगा. Also Read: समंदर किनारे क्यों खास है गॉल स्टेडियम? हिंदुस्तान-श्रीलंका टेस्ट के बीच जानिए किले और मशहूर क्लॉक टावर का राज The post VIDEO: एज एंड टेकन… धनंजय डी सिल्वा का हैरतअंगेज कैच, ध्रुव जुरेल को 51 रन पर भेजा पवेलियन appeared first on Naya Vichar.

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समंदर किनारे क्यों खास है गॉल स्टेडियम? भारत-श्रीलंका टेस्ट के बीच जानिए किले और मशहूर क्लॉक टावर का राज

Galle International Cricket Stadium History : क्रिकेट के मैदान तो दुनिया में कई हैं, लेकिन कुछ स्टेडियम सिर्फ मैच की मेजबानी नहीं करते, बल्कि अपने आसपास की कहानी भी सुनाते हैं. गॉल इंटरनेशनल क्रिकेट स्टेडियम ऐसा ही एक मैदान है, जहां क्रिकेट और इतिहास का अनोखा मेल देखने को मिलता है. एक तरफ हिंद महासागर की नीली लहरें हैं, तो दूसरी तरफ सदियों पुराना गॉल फोर्ट और उसी किले के बीच मशहूर क्लॉक टावर नजर आता है. इसी खूबसूरत मैदान पर हिंदुस्तान और श्रीलंका के बीच टेस्ट सीरीज का पहला मुकाबला स्पोर्ट्सा जा रहा है. गॉल में स्पोर्ट्सा जा रहा 50वां टेस्ट मैच हिंदुस्तान के लिए यह मैच इसलिए भी खास है क्योंकि टीम श्रीलंका में अपना 600वां टेस्ट मुकाबला स्पोर्ट्स रही है. वहीं, गॉल स्टेडियम भी इस मुकाबले के साथ एक खास पड़ाव पर पहुंच गया है. हिंदुस्तान-श्रीलंका का यह टेस्ट इस मैदान पर स्पोर्ट्सा जाने वाला 50वां टेस्ट मैच है. इसके साथ गॉल एशिया का पहला ऐसा क्रिकेट स्टेडियम बन गया है, जहां 50 टेस्ट मैच स्पोर्ट्से जा चुके हैं. एक तरफ समंदर, दूसरी ओर ऐतिहासिक किला View on Instagram गॉल स्टेडियम की सबसे खास तस्वीर यही है कि मैदान के एक ओर हिंद महासागर दिखाई देता है और दूसरी ओर गॉल फोर्ट की ऐतिहासिक दीवारें. मैच के दौरान जब कैमरा मैदान से हटकर किले की प्राचीर और समुद्र की ओर जाता है, तो क्रिकेट का नजारा किसी पोस्टकार्ड जैसा नजर आता है. यह स्टेडियम गॉल शहर में ऐतिहासिक गॉल फोर्ट के पास स्थित है. समुद्र की हवाएं, किले की दीवारें और मैदान पर क्रिकेट-इन तीनों का मेल गॉल को दुनिया के खूबसूरत क्रिकेट स्थलों में शामिल करता है. गॉल फोर्ट सिर्फ एक पुराना किला नहीं है. इसकी चारदीवारी के भीतर आज भी एक पूरा शहर बसता है. यहां चर्च, कैफे, रेस्टोरेंट, ऑफिस और कई दूसरी इमारतें मौजूद हैं. वहीं मैच के दौरान किले की दीवारों पर खड़े होकर भी लोग क्रिकेट का आनंद लेते दिखाई देते हैं. गॉल क्लॉक टावर की क्या है कहानी? गॉल फोर्ट के सबसे पहचानने योग्य स्थलों में से एक है गॉल क्लॉक टावर, जिसे एन्थोनिज मेमोरियल क्लॉक टावर भी कहा जाता है. यह टावर 1883 में बनाया गया था और गॉल फोर्ट के मून बैस्टियन के पास स्थित है. इसका निर्माण स्थानीय लोगों के सार्वजनिक योगदान से हुआ था. यह टावर डॉक्टर पी. डी. एन्थोनिज की याद में बनाया गया था. इसकी डिजाइन जॉन हेनरी गेस लैंडन ने तैयार की थी. क्लॉक टावर की घड़ी डॉक्टर एन्थोनिज के एक आभारी मरीज मुदलियार सैमसन डी एब्रू राजापक्षे ने भेंट की थी. आज यह टावर गॉल फोर्ट की पहचान का अहम हिस्सा है और स्टेडियम से जुड़े क्रिकेट दृश्यों में भी कई बार नजर आता है. Also Read: पुजारा के बाद जिस बल्लेबाज की थी तलाश क्या वो हिंदुस्तान को मिल गया? इस खिलाड़ी ने बताया क्यों नं-3 के लिए हैं परफेक्ट 1876 से जुड़ी है मैदान की कहानी गॉल स्टेडियम का इतिहास काफी पुराना है. 1876 के आसपास यहां रेसकोर्स हुआ करता था. धीरे-धीरे इस जगह पर क्रिकेट गतिविधियां बढ़ीं और मैदान ने स्पोर्ट्स का रूप लेना शुरू किया. मई 1888 में यहां पहला स्कूल क्रिकेट मैच स्पोर्ट्सा गया था. यह मुकाबला रिचमंड कॉलेज और ऑल सेंट्स कॉलेज के बीच हुआ था. बाद में रिचमंड कॉलेज और महिंदा कॉलेज के बीच होने वाला वार्षिक मुकाबला भी यहां की पुरानी क्रिकेट परंपरा का हिस्सा बन गया. 1927 में इस मैदान को आधिकारिक तौर पर क्रिकेट स्टेडियम का दर्जा मिला. इसके बाद यहां क्रिकेट लगातार आगे बढ़ता गया. Also Read: 17 साल बाद हिंदुस्तान लौट रहा BWF वर्ल्ड चैंपियनशिप, सिंधु समेत इन स्टार्स पर रहेंगी नजरें 1998 में स्पोर्ट्सा गया पहला टेस्ट गॉल में पहला टेस्ट मैच 3 जून 1998 को श्रीलंका और न्यूजीलैंड के बीच स्पोर्ट्सा गया. मेजबान श्रीलंका ने इस मुकाबले को पारी और 16 रन से अपने नाम किया. इसके कुछ वर्षों बाद हिंदुस्तान ने भी इस मैदान पर अपना पहला टेस्ट स्पोर्ट्सा. अगस्त 2001 में हिंदुस्तानीय टीम गॉल में उतरी, लेकिन उसे 10 विकेट से हार का सामना करना पड़ा. इसके बाद हिंदुस्तान ने यहां चार और टेस्ट स्पोर्ट्से. अब तक गॉल में हिंदुस्तान का रिकॉर्ड 5 टेस्ट में 2 जीत और 3 हार का है. हिंदुस्तान ने यहां अपनी पहली जीत 2008 में दर्ज की थी, जब टीम ने श्रीलंका को 170 रन से हराया. इसके बाद 2017 में हिंदुस्तान ने 304 रन से जीत हासिल की थी. गॉल में सहवाग के बल्ले का जलवा गॉल में हिंदुस्तानीय बल्लेबाजों की बात करें तो यहां सबसे ज्यादा टेस्ट रन बनाने का रिकॉर्ड वीरेंद्र सहवाग के नाम है. उन्होंने चार पारियों में 391 रन बनाए हैं. सहवाग ने यहां दो टेस्ट शतक लगाए, जिसमें एक दोहरा शतक भी शामिल है. वहीं गेंदबाजी में रविचंद्रन अश्विन हिंदुस्तानीयों में सबसे आगे हैं. उन्होंने गॉल में चार पारियों में 14 विकेट लिए हैं और एक बार 10 विकेट भी हासिल किए हैं. Also Read: एशिया कप और एशियन गेम्स के लिए पाकिस्तान की टीम घोषित, इस खिलाड़ी को मिली कप्तानी मुरलीधरन ने यहीं पूरे किए थे 800 विकेट गॉल मैदान ने क्रिकेट के कई यादगार पल देखे हैं. इनमें सबसे खास पलों में से एक श्रीलंका के महान स्पिनर मुथैया मुरलीधरन से जुड़ा है. 2010 में मुरलीधरन ने इसी मैदान पर अपने टेस्ट करियर का आखिरी मुकाबला स्पोर्ट्सा था. हिंदुस्तान के खिलाफ उस मैच में उन्होंने अपने टेस्ट करियर के 800 विकेट पूरे किए. वह विकेट उनके करियर की आखिरी गेंद पर आया था, जिससे उनका विदाई मैच भी बेहद खास बन गया. ऑस्ट्रेलिया के महान लेग स्पिनर शेन वॉर्न से जुड़ी भी एक खास उपलब्धि इसी मैदान की है. उन्होंने गॉल में अपने टेस्ट करियर का 500वां विकेट हासिल किया था. सुनामी ने बदल दी थी मैदान की तस्वीर 26 दिसंबर 2004 को हिंद महासागर में आई सुनामी ने गॉल स्टेडियम को भी भारी नुकसान पहुंचाया था. मैदान और आसपास की कई इमारतें प्रभावित हुईं. कुछ समय के लिए स्टेडियम को सुनामी से प्रभावित लोगों के लिए राहत शिविर के रूप में भी इस्तेमाल किया गया. इसके बाद मैदान का पुनर्निर्माण शुरू हुआ. नया पवेलियन और मीडिया सेंटर बनाया गया तथा दर्शकों के

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JPSC Student Protest: क्या प्रेशर में आ गई कांग्रेस, 20 अगस्त से पहले छात्रों से होगी बात?

रांची से अभिषेक आनंद और अरविंद कुमार सिंह की रिपोर्ट JPSC Student Protest: झारखंड में जेपीएससी-जेएसएससी परीक्षा सुधार और कथित अनियमितताओं को लेकर छात्रों का आंदोलन 23वें दिन भी जारी है. रांची के जयपाल सिंह स्टेडियम में डटे अभ्यर्थियों ने अब 20 अगस्त को मुख्यमंत्री आवास के घेराव का ऐलान किया है. इससे पहले छात्रों ने प्रेस कॉन्फ्रेंस कर प्रशासन पर मांगों को लेकर ठोस निर्णय नहीं लेने का आरोप लगाया था. हालांकि, आंदोलन के बीच छात्रों के एक बड़े वर्ग ने मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के प्रति भरोसा जताते हुए बातचीत का रास्ता फिर से खोलने की अपील की है. 20 अगस्त से पहले प्रशासन से बातचीत की उम्मीद दोनों छात्र मंचों से जुड़े अभ्यर्थियों का कहना है कि वे आंदोलन को उग्र नहीं बनाना चाहते. उनका मानना है कि मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन उनके लिए बड़े भाई की तरह हैं और उन्हें अब भी उम्मीद है कि 20 अगस्त से पहले प्रशासन छात्रों को बातचीत के लिए बुलाएगी. छात्रों का कहना है कि संवाद के जरिए लंबित मांगों पर समाधान निकाला जा सकता है. यानी मामला अभी पूरी तरह टकराव की पटरी पर नहीं गया है, उम्मीद की ट्रेन कहीं धीमी गति से सही, चल रही है. दो प्रमुख मांगों पर अटका है विवाद छात्रों की मुख्य मांगों में जेएसएससी सीजीएल परीक्षा को रद्द करना अथवा पूरे मामले की सीबीआई जांच कराना शामिल है. छात्रों का कहना है कि इन दो मुद्दों पर प्रशासन की ओर से स्पष्ट और ठोस निर्णय नहीं आने के कारण आंदोलन लंबा खिंच रहा है. इसके अलावा छात्र जेपीएससी और जेएसएससी की परीक्षाओं से जुड़ी पारदर्शिता, सुधार और लंबित मांगों को भी उठाते रहे हैं. 2000 और 300 पदों की नियुक्ति का प्रस्ताव छात्रों ने तत्काल राहत के तौर पर जेएसएससी सीजीएल के लिए करीब 2000 पदों पर नयी वैकेंसी निकालने और जेपीएससी में लगभग 300 पदों पर नियुक्ति प्रक्रिया शुरू करने की मांग रखी है. अभ्यर्थियों का तर्क है कि यदि नयी नौकरियों के अवसर सामने आते हैं तो आंदोलन कर रहे युवाओं को अपने भविष्य की तैयारी के लिए वापस पढ़ाई की ओर लौटने का मौका मिलेगा. यह मांग आंदोलन को खत्म करने के लिए एक संभावित बीच का रास्ता भी बन सकती है. अभ्यर्थियों की मांग जायज, प्रशासन के पास विकल्प झारखंड में लंबे समय से कई प्रतियोगी परीक्षाएं नियमित रूप से नहीं हो पायी हैं. उन्होंने जे-टेट जैसी परीक्षाओं के लंबे अंतराल का भी उल्लेख किया. उनके मुताबिक राज्य में बड़ी संख्या में पद खाली हैं और प्रशासन चाहे तो नयी वैकेंसी निकालकर छात्रों को अवसर दे सकती है. उनका कहना है कि नौकरी की संभावना सामने आने पर आंदोलन कर रहे छात्र मैदान छोड़कर फिर अपनी पढ़ाई और परीक्षा की तैयारी में लौट सकते हैं. विधानसभा घेराव के बाद प्रशासन पर बढ़ा दबाव छात्रों के विधानसभा घेराव के दौरान हुई घटनाओं और लाठीचार्ज के बाद प्रशासन पहले ही विपक्ष के निशाने पर है. अब मुख्यमंत्री आवास के घेराव की घोषणा ने प्रशासनिक और नेतृत्वक दबाव दोनों बढ़ा दिए हैं. आनंद मोहन के अनुसार, यदि 20 अगस्त को बड़ी संख्या में छात्र मुख्यमंत्री आवास की ओर बढ़ते हैं तो प्रशासन के सामने एक बड़ी चुनौती होगी. ऐसे में प्रशासन के पास इससे पहले छात्रों से बातचीत कर स्थिति को संभालने का मौका है. कांग्रेस पर भी बढ़ रहा नेतृत्वक दबाव आंदोलन ने कांग्रेस को भी असहज स्थिति में ला दिया है. एक ओर कांग्रेस झारखंड में सत्तारूढ़ गठबंधन का हिस्सा है, वहीं दूसरी ओर राष्ट्रीय स्तर पर पार्टी छात्र आंदोलनों और युवाओं के मुद्दों को लेकर प्रशासनों पर सवाल उठाती रही है. आनंद मोहन के मुताबिक, झारखंड में आंदोलन के शुरुआती दौर में कांग्रेस नेताओं की सक्रियता और राहुल गांधी द्वारा छात्रों से फोन पर बातचीत के बाद पार्टी की छात्र हितैषी छवि बनी थी. अब छात्रों की नाराजगी कांग्रेस के लिए नेतृत्वक दबाव का कारण बन रही है. राहुल गांधी के पत्र से बढ़ी हलचल बताया गया कि राहुल गांधी की ओर से मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन को एक पत्र भेजा गया है. हालांकि, पत्र की सामग्री सार्वजनिक नहीं हुई है. इसी बीच 18 अगस्त को कांग्रेस की महत्वपूर्ण बैठक प्रस्तावित है, जिसमें मंत्री, विधायक और प्रदेश पदाधिकारी शामिल होंगे. बताया गया कि बैठक के एजेंडे में जेपीएससी-जेएसएससी विवाद और मौजूदा छात्र आंदोलन में कांग्रेस की भूमिका पर रणनीति तय करना भी शामिल है. आक्रोश के बीच मुख्यमंत्री पर भरोसा आंदोलन के मौजूदा स्वरूप में सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि छात्रों में प्रशासन के प्रति नाराजगी के साथ मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन को लेकर भरोसा भी दिखाई दे रहा है. अभ्यर्थियों का कहना है कि वे प्रशासन गिराने या किसी नेतृत्वक दल के खिलाफ लड़ने नहीं आए हैं. उनका उद्देश्य परीक्षा व्यवस्था में सुधार और रोजगार के अवसर हासिल करना है. छात्रों का कहना है कि यदि प्रशासन उनकी मांगों पर पहल करती है तो वे आंदोलन खत्म कर पढ़ाई की ओर लौटना चाहते हैं. इसे भी पढ़ें: ‘हेमंत सोरेन बड़े भाई… निकालेंगे आभार यात्रा’, जानें CM आवास घेराव पर छात्रों ने क्या कहा? संवाद ही बचा सकता है टकराव कुल मिलाकर 20 अगस्त का मुख्यमंत्री आवास घेराव प्रशासन के लिए नेतृत्वक और प्रशासनिक दोनों स्तरों पर चुनौती बन सकता है. लेकिन छात्रों की बातों से यह भी साफ है कि अंतिम दरवाजा अभी बंद नहीं हुआ है. बातचीत का रास्ता खुलता है तो आंदोलन को टालने की संभावना बनी हुई है. छात्रों को उम्मीद है कि मुख्यमंत्री समय रहते हस्तक्षेप करेंगे और लंबित मुद्दों पर कोई ठोस समाधान निकलेगा. वरना मैदान में बैठे युवाओं और सत्ता के बीच दूरी बढ़ती जाएगी, और नेतृत्व में ऐसी दूरी अक्सर मुद्दे से ज्यादा बड़ी समाचार बन जाती है. इसे भी पढ़ें: JSSC CGL परीक्षा रद्द कर सकती है प्रशासन या नहीं? जानें क्या कहते हैं पूर्व महाधिवक्ता अजीत कुमार The post JPSC Student Protest: क्या प्रेशर में आ गई कांग्रेस, 20 अगस्त से पहले छात्रों से होगी बात? appeared first on Naya Vichar.

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आशीष बनर्जी मौत मामले में ब्लैकमेलिंग, धमकी और प्रताड़ना का एंगल, जानें शुभेंदु अधिकारी क्या बोले

Suvendu Adhikari on Aबंगाल के पूर्व डिप्टी स्पीकर आशीष बनर्जी की मौत में ब्लैकमेलिंग, धमकी और प्रताड़ना का एंगल, जानें शुभेंदु अधिकारी क्या बोलेshish Banerjee TMC Death: पश्चिम बंगाल विधानसभा के पूर्व उपाध्यक्ष और तृणमूल कांग्रेस (TMC) के वरिष्ठ नेता आशीष बनर्जी का शव पार्टी कार्यालय में फंदे से लटकता मिला. इसके बाद राज्य की नेतृत्व गरमा गयी है. मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने इस घटना पर दुख जताते हुए आशंका व्यक्त की है कि टीएमसी के भीतर मौजूद भ्रष्ट तत्वों ने संभवतः उन्हें कोई गंभीर धमकी दी होगी, जिसके चलते यह दुखद घटना घटी. ऑफिस से मिली चिट्ठी की होगी जांच पश्चिम बंगाल के चीफ मिनिस्टर ने कहा कि विपक्षी पार्टी के कार्यालय से बरामद पूर्व विधायक के एक पत्र की भी जांच करायी जायेगी. इस पत्र में कहा गया था कि आशीष बनर्जी की मौत के लिए कोई जिम्मेदार नहीं है. पत्र में नेतृत्व में आने पर अफसोस जताया गया था. आशीष बनर्जी के लेटरहेड पैड पर हस्तलिखित ‘सुसाइडल नोट’ की जांच करायी जायेगी. लिखावट की भी जांच होगी. यह भी जांच की जायेगी कि क्या बनर्जी को किसी ने धमकी दी थी. -शुभेंदु अधिकारी, मुख्यमंत्री, पश्चिम बंगाल लेटरहेड पर हाथ से लिखा सुसाइडल नोट घटनास्थल से आशीष बनर्जी के लेटरहेड पर एक हस्तलिखित पत्र मिला है. इस कथित सुसाइडल नोट में लिखा गया है कि उनकी मौत के लिए कोई अन्य व्यक्ति जिम्मेदार नहीं है और उन्हें अपने नेतृत्व में आने के फैसले पर गहरा अफसोस है. ये भी पढ़ें: ‘मैंने कोई भ्रष्टाचार नहीं किया है…’, आत्महत्या से पहले सुसाइड नोट में आशीष बनर्जी ने क्या-क्या लिखा लिखावट की करायी जायेगी फॉरेंसिक जांच सीएम शुभेंदु अधिकारी ने कहा है कि पुलिस इस मामले को हल्के में नहीं लेगी. टीएमसी के पार्टी कार्यालय से बरामद सुसाइडल नोट और उसकी लिखावट की सत्यता की फॉरेंसिक जांच करायी जायेगी. ब्लैकमेलिंग और धमकी एंगल से भी होगी जांच मुख्यमंत्री ने पुलिस प्रशासन को शोकाकुल परिवार को हरसंभव सहयोग देने का निर्देश दिया है. इसके साथ ही इस बिंदु पर गहन जांच के आदेश दिये गये हैं कि क्या बनर्जी को विपक्षी दल के ही किसी गुट या व्यक्ति द्वारा ब्लैकमेल या प्रताड़ित किया जा रहा था. ये भी पढ़ें: तृणमूल नेता आशीष बंद्योपाध्याय की मौत, पार्टी कार्यालय में फांसी पर झूलता मिला पूर्व डिप्टी स्पीकर का शव आशीष बनर्जी के परिजनों से मिलेंगे शुभेंदु अधिकारी शुभेंदु अधिकारी ने कहा है कि आशीष बनर्जी के परिजनों से उन्होंने फोन पर बात की है. जल्द ही उनसे मिलने भी जायेंगे. आशीष दा के साथ उनके मधुर संबंध थे. मुख्यमंत्री ने कहा कि बंगाल के पूर्व स्पीकर एक अच्छे इंसान थे. भाजपा के टिकट पर चुनाव जीतने वाले विधायक ने उनके घर जाकर उनके पैर छूकर आशीर्वाद लिया था. स्थानीय भाजपा कार्यकर्ताओं के साथ आशीष बनर्जी के अच्छे संबंध थे. यह बेहद दुर्भाग्यपूर्ण घटना है. चुनाव के बाद ममता बनर्जी से आशीष ने कर लिया था किनारा शुभेंदु अधिकारी ने कहा कि बंगाल चुनाव 2026 हारने के बाद ममता बनर्जी ने एक कमेटी का गठन किया. इसके तुरंत बाद आशीष बनर्जी ने तृणमूल कांग्रेस से इस्तीफा दे दिया. मुख्यमंत्री ने कहा कि इस मामले में पुलिस निष्पक्ष कार्रवाई करेगी. शुभेंदु ने कहा कि उन्होंने आशीष बनर्जी के परिजनों से बातचीत की और उनसे कहा कि वे पुलिस के साथ जांच में सहयोग करें. The post आशीष बनर्जी मौत मामले में ब्लैकमेलिंग, धमकी और प्रताड़ना का एंगल, जानें शुभेंदु अधिकारी क्या बोले appeared first on Naya Vichar.

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मेरठ हाईवे पर उड़े 4 लाख रुपये, लोग बटोरने लगे… फिर अमित ने जो किया उसने पूरे देश का दिल जीत लिया!

UP News: मेरठ हाईवे पर उस वक्त लोगों की नजरें सड़क पर टिक गईं, जब अचानक 500 और 200 रुपये के नोट हवा में उड़ते नजर आए. कुछ ही देर में करीब आधा किलोमीटर तक सड़क पर नोट ही नोट बिखर गए. बताया जा रहा है कि एक बाइक सवार तेज रफ्तार में जा रहा था और उसके बैग की चेन खुल गई. इसी वजह से बैग में रखे पैसे सड़क पर गिरते चले गए. इस दौरान पीछे से आ रहे अमित ने बाइक सवार को आवाज देकर रोकने की कोशिश की, लेकिन बाइक नहीं रुकी. आधा किलोमीटर तक सड़क पर बिखरे थे नोट बाइक सवार के आगे निकल जाने के बाद अमित ने बिना देर किए सड़क पर बिखरे नोटों को उठाना शुरू कर दिया. देखते ही देखते उन्हें काफी रकम मिल गई. जब उन्होंने नोटों को इकट्ठा कर गिना तो रकम करीब 4 लाख रुपये निकली. इतनी बड़ी रकम मिलने के बावजूद अमित ने इसे अपने पास रखने के बारे में नहीं सोचा और तुरंत पुलिस को इसकी सूचना दी. 4 लाख रुपये देखकर भी नहीं आया लालच आज के समय में सड़क पर लाखों रुपये पड़े मिल जाएं तो किसी के भी मन में लालच आ सकता है, लेकिन अमित ने ऐसा नहीं किया. उन्होंने पूरी रकम सुरक्षित रखी और पुलिस को सौंपने का फैसला किया. उनकी इस ईमानदारी की अब लोग जमकर तारीफ कर रहे हैं. पुलिस ने 40 मिनट तक हाईवे पर बटोरे नोट सूचना मिलने के बाद पुलिस भी मौके पर पहुंच गई. इसके बाद पुलिसकर्मियों ने करीब 40 मिनट तक हाईवे पर बिखरे नोटों को इकट्ठा किया. पुलिस को कुल 11 गड्डियां मिलीं. पूरी रकम को सुरक्षित तरीके से एकत्र करने के बाद उसे पुलिस के सुपुर्द कर दिया गया. अमित की ईमानदारी की हो रही तारीफ हाईवे पर लाखों रुपये मिलने के बाद भी अमित ने उन्हें अपने पास नहीं रखा और सीधे पुलिस को सौंप दिया. उनकी इस ईमानदारी ने लोगों का दिल जीत लिया है. सोशल मीडिया पर भी लोग अमित की तारीफ करते हुए कह रहे हैं कि आज के दौर में 4 लाख रुपये देखकर भी ईमानदारी दिखाना बड़ी बात है. अमित ने जिस तरह बिना लालच किए पूरी रकम पुलिस को सौंप दी, वह दूसरों के लिए भी एक मिसाल है. ऐसे वक्त में जब लोग छोटी-सी रकम के लिए भी गलत रास्ता अपना लेते हैं, अमित की ईमानदारी वाकई सलाम के काबिल है. Also Read: काशी घूमने आए तीन लोग, सबकी उठीं अर्थियां, पति – पत्नी और बेटे का अंतिम संस्कार The post मेरठ हाईवे पर उड़े 4 लाख रुपये, लोग बटोरने लगे… फिर अमित ने जो किया उसने पूरे देश का दिल जीत लिया! appeared first on Naya Vichar.

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प्रशांत किशोर 17 अगस्त को लेंगे विधायक पद की शपथ, जानिए सदन की जगह स्पीकर के चैंबर में क्यों होगा कार्यक्रम

Prashant Kishor Oath: बिहार की बांकीपुर विधानसभा सीट पर भाजपा को हराकर विधायक बने प्रशांत किशोर अब विधानसभा के सदस्य के तौर पर शपथ लेंगे. जन सुराज पार्टी के प्रमुख और पार्टी के पहले विधायक पीके का शपथ ग्रहण 17 अगस्त, सोमवार को होगा. विधानसभा सत्र नहीं चलने के कारण उन्हें सदन के अंदर शपथ नहीं दिलाई जाएगी. विधानसभा अध्यक्ष प्रेम कुमार अपने चैंबर में प्रशांत किशोर को विधायक पद की शपथ दिलाएंगे. सुबह 10:30 बजे होगा शपथ ग्रहण विधानसभा की ओर से प्रशांत किशोर को शपथ कार्यक्रम की जानकारी दे दी गई है. तय कार्यक्रम के मुताबिक, कल 17 अगस्त को सुबह 10:30 बजे शपथ ग्रहण होगा. स्पीकर प्रेम कुमार विधानसभा के मुख्य भवन स्थित अपने कार्यालय कक्ष में पीके को शपथ दिलाएंगे. सत्र नहीं चल रहा, इसलिए चैंबर में शपथ आमतौर पर नए विधायकों को विधानसभा सत्र के दौरान सदन में शपथ दिलाई जाती है. लेकिन फिलहाल बिहार विधानसभा का कोई सत्र नहीं चल रहा है. मॉनसून सत्र भी समाप्त हो चुका है. आगामी शीतकालीन सत्र में अभी समय है. ऐसे में सदन की कार्यवाही नहीं होने पर स्पीकर अपने चैंबर में नए विधायक को शपथ दिला सकते हैं. शपथ के बाद ही मिलेंगे विधायक के अधिकार संविधान के अनुच्छेद 188 के तहत नवनिर्वाचित विधायक के लिए शपथ लेना जरूरी है. शपथ लेने के बाद ही उन्हें विधायक के तौर पर मिलने वाले भत्ते और दूसरी प्रशासनी सुविधाएं मिलती हैं. शपथ से पहले विधायक सदन की कार्यवाही में बहस या मतदान नहीं कर सकते. बिहार की ताजा समाचारों के लिए यहां क्लिक करें जन सुराज के पहले विधायक बने पीके प्रशांत किशोर की नेतृत्वक पार्टी जन सुराज के लिए यह चुनावी जीत काफी अहम है. करीब दो साल पहले पार्टी की नींव रखने वाले पीके अब विधानसभा पहुंच गए हैं. जन सुराज ने पिछले साल बिहार विधानसभा चुनाव में अकेले मैदान में उतरकर चुनाव लड़ा था. हालांकि, पार्टी को एक भी सीट नहीं मिली थी. बांकीपुर उपचुनाव जीतकर प्रशांत किशोर ने पहली बार विधानसभा में जन सुराज की मौजूदगी दर्ज कराई है. भाजपा के गढ़ में पीके ने मारी सेंध बांकीपुर विधानसभा सीट लंबे समय से भाजपा का मजबूत गढ़ रही है. इस सीट से भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन लगातार पांच बार विधायक रहे. इससे पहले उनके पिता भी चार बार यहां से भाजपा के विधायक रह चुके हैं. करीब तीन दशक तक बांकीपुर में भाजपा का दबदबा रहा. नितिन नवीन के राज्यसभा जाने के बाद बांकीपुर सीट पर उपचुनाव हुआ. इसमें प्रशांत किशोर ने भाजपा के नीरज कुमार सिन्हा को 19,324 वोटों से हराकर जीत दर्ज की. Also Read: शराबबंदी को लेकर तेजस्वी यादव का प्रशासन पर तंज, बोले- बिहार में मिल रही हर ब्रांड की शराब The post प्रशांत किशोर 17 अगस्त को लेंगे विधायक पद की शपथ, जानिए सदन की जगह स्पीकर के चैंबर में क्यों होगा कार्यक्रम appeared first on Naya Vichar.

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थोड़ा Unpopular: Sorry Aishwarya, लेकिन इस बार आप गलत मिसाल छोड़ गईं

सोशल मीडिया पर ऐश्वर्या राय बच्चन का एक पुराना इंटरव्यू इन दिनों फिर वायरल हो रहा है, जिसमें वह बताती हैं कि उन्होंने फराह खान की ‘हैप्पी न्यू ईयर’ क्यों छोड़ दी थी. वजह सिर्फ फिल्म या किरदार नहीं थी, बल्कि पति अभिषेक बच्चन के साथ स्क्रीन पर उनकी भूमिका से जुड़ी थी. ऐश्वर्या आज भी अपनी खूबसूरती, अभिनय और मजबूत पहचान के लिए जानी जाती हैं, लेकिन उनकी यह पुरानी सोच एक स्त्री के तौर पर मुझे आज भी सवाल करने पर मजबूर करती है. View on Instagram सालों पहले ऐश्वर्या ने फराह खान की फिल्म ‘हैप्पी न्यू ईयर’ इसलिए करने से मना कर दिया था क्योंकि फिल्म में वह लीड रोल में थीं, जबकि उनके पति अभिषेक बच्चन सेकेंड लीड में होते. ऐश्वर्या को लगा कि दोनों एक ही फिल्म में हों और उनकी भूमिकाएं बराबर न हों, तो स्थिति अजीब हो जाएगी. यहीं से मेरा सवाल शुरू होता है. ‘Sorry Aishwarya, लेकिन इस बार आपसे एक स्त्री के तौर पर मैं सहमत नहीं हूं.’ क्योंकि आप सिर्फ एक अभिनेत्री नहीं हैं. आप उस मुकाम पर खड़ी स्त्री हैं, जिसे देश की लाखों लड़कियां देखती हैं. और जब आपके जैसी मजबूत, सफल और आत्मनिर्भर स्त्री यह सोच सामने रखती है कि पति के मुकाबले पत्नी की भूमिका बड़ी हो तो स्थिति ‘awkward’ हो सकती है, तो इसका असर सिर्फ आपकी जिंदगी तक सीमित नहीं रहता. यह सोच बहुत दूर तक जाती है. पत्नी को पति से ज्यादा सफल होने में दिक्कत क्यों हो? सोचिए, अगर कहानी उलटी होती. अगर अभिषेक लीड रोल में होते और ऐश्वर्या सेकेंड लीड में होतीं, तो क्या हम इसे उतना ही ‘awkward’ मानते? शायद नहीं… हम तो कहते- वाह, एक ही फिल्म में पति-पत्नी साथ काम कर रहे हैं. लेकिन जैसे ही पत्नी की भूमिका पति से बड़ी होने की बात आती है, वहां एक अदृश्य असहजता पैदा हो जाती है. क्यों? क्योंकि सदियों से हमने पुरुष को परिवार का मुख्य चेहरा और स्त्री को उसके साथ खड़ी रहने वाली भूमिका में देखने की आदत बना ली है. पुरुष आगे बढ़े तो परिवार की ‘उपलब्धि’. स्त्री आगे बढ़े तो सवाल- ‘पति से ज्यादा तो नहीं?’ यही तो patriarchy का सबसे खूबसूरत और खतरनाक रूप है. वह हमेशा आदेश देकर नहीं आती. कई बार वह हमारी अपनी सोच बनकर हमारे भीतर बैठी होती है. शायद अभिषेक ने कभी कुछ कहा भी नहीं होगा यहां एक बात साफ होनी चाहिए. ऐश्वर्या के बयान से यह साबित नहीं होता कि अभिषेक ने उनसे फिल्म छोड़ने को कहा था या उन्हें अपनी पत्नी का ज्यादा बड़ा रोल पसंद नहीं आता. हो सकता है यह ऐश्वर्या का अपना फैसला रहा हो. हो सकता है उन्होंने अपने रिश्ते की सहजता को महत्व दिया हो. लेकिन सवाल फिर भी रहेगा- क्या रिश्ते की सहजता बनाए रखने की जिम्मेदारी हमेशा स्त्री की महत्वाकांक्षा कम करके पूरी होनी चाहिए? क्या पति-पत्नी का रिश्ता इतना कमजोर होता है कि पत्नी की बड़ी भूमिका पति के आत्मविश्वास को चोट पहुंचा दे? और अगर ऐसा नहीं है, तो फिर स्त्री खुद यह डर क्यों महसूस करे? आपकी एक फिल्म नहीं, एक सोच मायने रखती है ‘हैप्पी न्यू ईयर’ कोई ऐसी फिल्म नहीं थी जिसके बिना ऐश्वर्या का करियर अधूरा रह जाता. शायद उन्होंने सही फैसला लिया हो, शायद नहीं. यह बात आज तय करना भी मुश्किल है. लेकिन यहां फिल्म मुद्दा नहीं है. मुद्दा उस सोच का है जो एक स्त्री को यह सिखाती है कि अपने पति से ज्यादा चमकना रिश्ते के लिए ठीक नहीं. और इसीलिए ऐश्वर्या से मेरी शिकायत थोड़ी ज्यादा है. क्योंकि अगर यही सोच कोई आम स्त्री रखती है, तो शायद हम कह दें- उसकी मजबूरी होगी. लेकिन जब देश की सबसे सफल और प्रभावशाली स्त्रीओं में से एक स्त्री ऐसा फैसला लेती है, तो वह अनजाने में एक उदाहरण भी बनाती है. और उदाहरणों की ताकत बहुत बड़ी होती है. उस छोटे से गांव की लड़की के बारे में सोचिए मान लीजिए झारखंड, बिहार, राजस्थान या उत्तर प्रदेश के किसी छोटे से गांव की एक लड़की पढ़-लिखकर आगे बढ़ना चाहती है. वह अपने पति से ज्यादा कमाना चाहती है. वह अपने पति से बड़ी अधिकारी बनना चाहती है. वह चाहती है कि उसकी पहचान उसके पति के नाम से नहीं, उसके अपने काम से बने. लेकिन उसके घर में कोई उससे कहता है- “पति से ज्यादा आगे निकलने की कोशिश मत करो. घर में पति की इज्जत सबसे ऊपर होनी चाहिए.” वह लड़की अगर ऐश्वर्या जैसी किसी स्त्री को देखेगी, तो उसके मन में क्या जाएगा? कि शायद सचमुच पत्नी को पति से आगे नहीं निकलना चाहिए. कि शायद पति से ज्यादा सफल होना रिश्ते के लिए खतरा है. कि शायद अपने सपनों को थोड़ा पीछे करना ही ‘अच्छी पत्नी’ होने की निशानी है. यही डरावना हिस्सा है. हमें स्त्रीओं से त्याग की उम्मीद कब तक रहेगी? हमारी फिल्मों ने हमेशा त्याग करने वाली स्त्रीओं को महान बताया है. पति के लिए करियर छोड़ दो- महान. परिवार के लिए सपना छोड़ दो- महान. पति की सफलता के लिए अपनी सफलता पीछे कर दो- महान. लेकिन अगर कोई स्त्री कह दे कि- “नहीं, मैं भी आगे बढ़ूंगी. मेरे पति की सफलता मेरी सीमा नहीं है.” तो उसे महत्वाकांक्षी, स्वार्थी और परिवार की परवाह न करने वाली कह दिया जाता है. हमें इस narrative को बदलना होगा. क्योंकि पति की सफलता पत्नी की हार नहीं है. और पत्नी की सफलता पति की हार नहीं है. एक स्त्री की ऊंचाई किसी पुरुष की ऊंचाई कम नहीं करती. इसलिए, Sorry Aishwarya… आप बेहतरीन अभिनेत्री हैं. आप बेहद सफल स्त्री हैं. आपने अपने दम पर एक ऐसी पहचान बनाई है, जिसे कोई आपसे छीन नहीं सकता. लेकिन इस एक मामले में, एक स्त्री के नजरिए से मुझे लगता है कि आप एक बेहतर उदाहरण पेश कर सकती थीं. आप फिल्म कर सकती थीं. आप लीड हो सकती थीं. अभिषेक सेकेंड लीड हो सकते थे. और दोनों मिलकर दुनिया को यह बता सकते थे कि पति-पत्नी का रिश्ता किसी स्क्रीन क्रेडिट से बड़ा होता है. कि पत्नी का ज्यादा चमकना पति का अपमान नहीं है. ‘कि पति की पहचान मजबूत करने के लिए पत्नी

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रांची में ढोल-नगाड़ों के बीच डूरंड कप के पहले क्वार्टरफाइनल का आगाज, दिल्ली और एफसी रेंगदाई आमने-सामने

Durand Cup 2026 1st Quater Final: डूरंड कप के 135वें सीजन के पहले क्वार्टरफाइनल मुकाबले का आगाज रविवार को रांची के बिरसा मुंडा स्टेडियम में हुआ. स्पोर्टिंग क्लब दिल्ली और मणिपुर की एफसी रेंगदाई की टीमें आमने-सामने हैं. मुकाबले का उद्घाटन झारखंड के राज्यपाल संतोष कुमार गंगवार ने किया. इस दौरान कई अन्य पदाधिकारी भी मौजूद रहे. डूंरड कप के दौरान मोराबादी स्टेडियम में फैंस रांची में क्रिकेट को लेकर फैंस का जुनून तो अक्सर देखने को मिलता है, लेकिन रविवार को फुटबॉल के लिए भी वैसा ही उत्साह नजर आया. मोराबादी में मौजूद दर्शकों ने बता दिया कि झारखंड में फुटबॉल की लोकप्रियता किसी से कम नहीं है. दोनों टीमों की प्लेइंग-11 स्पोर्टिंग क्लब दिल्ली: फर्नांडिस (GK), गोगोउ (C), आशुतोष, रोड्रिगुइन्हो, पेना, ऐमेन, अजहर, टोम्बा, डुवान, मनोज एमडी. सबस्टिट्यूट: एम. कैफ, एन. रिचर्ड, एलन साजी, जोसेफ, सी. फर्नांडिस, ऑगस्टीन, सौरव, डायमंड, विशाल (GK), अक्षत एफसी रेंगदाई: पैंटिगा (GK) (C), रोजेन, केइफाबा, गैसुआंगमेई, किशन, अमरजीत, नरेश, लांचुंगरेई, डोले, चुइंगाम्पोउ, अमितकुमार. सबस्टिट्यूट: बसंता, सेंडी, सूरज (GK), बुंगचा, जेम्स, अबुंगटन, जोनाह, तिंगकाउचुन दोनों टीमें सेमीफाइनल में जगह बनाने के लिए मैदान पर उतर चुकी हैं और रांची के फुटबॉल फैंस की नजरें इस रोमांचक मुकाबले पर टिकी हैं. ये भी पढ़ें: डुरंड कप का मुकाबला देखने रांची रवाना हुई 50 स्कूली खिलाड़ियों की टीम The post रांची में ढोल-नगाड़ों के बीच डूरंड कप के पहले क्वार्टरफाइनल का आगाज, दिल्ली और एफसी रेंगदाई आमने-सामने appeared first on Naya Vichar.

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