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October 5, 2026

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प्रभात खबर खुलासा: पंचायत चुनाव में बचे सिर्फ छह माह, गाइडलाइन के फेर में अटके विकास कार्यों के 658 करोड़ रुपये

रांची : झारखंड में त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव में अब महज छह महीने का समय बाकी रह गया है. वर्तमान पंचायती राज व्यवस्था का कार्यकाल समाप्त होने की ओर है, लेकिन राज्य के ग्रामीण इलाकों में बुनियादी सुविधाओं का बुरा हाल है. हैरानी की बात यह है कि विकास कार्यों को धरातल पर उतारने के लिए पंचायतों के पास 658 करोड़ रुपये की भारी-भरकम राशि उपलब्ध है, लेकिन पंचायती राज विभाग की ओर से ‘खर्च की गाइडलाइन’ जारी न किए जाने के कारण पूरा पैसा फाइलों और प्रशासनी खातों में अटका पड़ा है. वर्ष 2010 के बाद 16 वर्षों में यह पहला मौका था जब राज्य वित्त आयोग के माध्यम से पंचायतों को यह राशि उपलब्ध कराई गई, लेकिन प्रशासनिक सुस्ती ने इस ऐतिहासिक कदम पर पानी फेर दिया है. 76% ग्रामीण आबादी पर सीधी मार झारखंड की लगभग 3.29 करोड़ आबादी में से करीब 2.50 करोड़ (76 प्रतिशत) लोग गांवों में रहते हैं. राज्य की 4,423 पंचायतों में ग्रामीणों की रोजमर्रा की जरूरतों जैसे- नल-जल योजना व जलमीनार की मरम्मत, बंद पड़ी योजनाओं को चालू करना, गांव की नालियां, कच्ची-पक्की सड़कें, आंगनबाड़ी केंद्र और प्रशासनी स्कूलों में छोटे-मोटे निर्माण कार्य इसी फंड से होने थे. 5वें राज्य वित्त आयोग की अनुशंसा पर पंचायती राज सचिव ने 29 मार्च 2026 को ही इस आवंटन का पत्र जारी कर दिया था. हालांकि, बीते 6 महीनों में विभाग यह तय नहीं कर पाया कि पैसा किस मद में और किस प्रक्रिया से खर्च होगा, जिससे 2.50 करोड़ आबादी बुनियादी सुविधाओं को तरस रही है. ये भी पढ़ें: दो साल से नहीं मिला विद्यालय विकास अनुदान, चौक-डस्टर से TC बुक तक शिक्षक उठा रहे खर्च; सफाई व्यवस्था भी प्रभावित ग्राम पंचायतों के पास ही अटका 493.51 करोड़ रुपये का बजट झारखंड वित्त आयोग द्वारा स्वीकृत 658 करोड़ रुपये की कुल राशि का बंटवारा त्रिस्तरीय पंचायती राज ढांचे में इस प्रकार किया गया है. ग्राम पंचायत (75% हिस्सा): 493.51 करोड़ रुपये (सबसे निचला और सीधा असरदार स्तर) पंचायत समिति (15% हिस्सा): 98.70 करोड़ रुपये जिला परिषद (10% हिस्सा): 65.79 करोड़ रुपये ग्राम पंचायतों के पास ही करीब 494 करोड़ रुपये की भारी राशि पड़ी हुई है, जो सीधे गांव के विकास पर खर्च होनी थी. त्रिस्तरीय पंचायत जनप्रतिनिधि संघ के अध्यक्ष विकास कुमार महतो का कहना है कि “बजट आवंटित कर देना और 6 महीने तक गाइडलाइन न देना पंचायतों को जानबूझकर पीछे धकेलने जैसा है. जनता जवाब मांग रही है और जनप्रतिनिधि बेबस हैं. ग्रामीण विकास व पंचायती राज विभाग सचिव मनोज कुमार से ‘नया विचार’ के सवाल सवाल: राज्य वित्त आयोग से स्वीकृत 658 करोड़ रुपये की राशि की वर्तमान में क्या स्थिति है? सचिव: पहली बार हम लोगों ने पंचायतों को 658 करोड़ रुपये देने का निर्णय लिया था. इसमें से 197 करोड़ रुपये की राशि जिला परिषदों को हस्तांतरित भी कर दी गई थी. सवाल: लेकिन मार्च से अब तक 6 महीने बीत गए, जमीनी स्तर पर पंचायतों को विकास का पैसा मिला ही नहीं? सचिव: पूरी राशि का इंतजाम अब कर लिया गया है. बहुत जल्द ही यह सारी राशि सीधे पंचायतों के खातों में भेज दी जाएगी, ताकि गांवों में तुरंत काम शुरू हो सके. सवाल: पिछले वित्तीय वर्ष के मार्च का मामला है, आखिर इतनी बड़ी देरी क्यों हुई? सचिव: त्रिस्तरीय पंचायतों (जिला, समिति व ग्राम पंचायत) को एक साथ बजट राशि जारी करनी थी, इसलिए पूरे फंड का प्रबंधन किया जा रहा था. अब आवंटन की प्रक्रिया पूरी हो चुकी है. राशि जारी करने के साथ ही काम के निष्पादन और खर्च की विस्तृत गाइडलाइन भी जिलों को भेज दी जाएगी. ये भी पढ़ें: रांची से लौटा मॉनसून, 5 से 8 अक्तूबर तक लगातार छाये रहेंगे बादल The post नया विचार खुलासा: पंचायत चुनाव में बचे सिर्फ छह माह, गाइडलाइन के फेर में अटके विकास कार्यों के 658 करोड़ रुपये appeared first on Naya Vichar.

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प्रेमानंद महाराज के समर्थन में उतरे संत-समाज, चित्रलेखा-अनिरुद्धाचार्य ने कहा- पूरी बात जाने बिना बयानबाजी गलत, हाईकोर्ट पहुंचा केस

Mathura News: वृंदावन में संत प्रेमानंद महाराज के शिष्य रसिक दुलारी शरण की मौत के बाद श्रीराधा केलिकुंज आश्रम को लेकर उठ रहे सवालों के बीच कई संत और भागवताचार्य प्रेमानंद महाराज के समर्थन में सामने आए हैं. भागवताचार्य चित्रलेखा और कथावाचक अनिरुद्धाचार्य ने बिना पूरी सच्चाई जाने किसी निष्कर्ष पर पहुंचने और बयानबाजी करने पर सवाल उठाए. वहीं, श्रीकृष्ण जन्मभूमि मुक्ति न्यास के अध्यक्ष दिनेश फलाहारी ने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को पत्र लिखकर मामले की जांच और आश्रम से जुड़ी गतिविधियों की पड़ताल की मांग की है. वहीं रसिक दुलारी की मौत का मामला अब इलाहाबाद हाईकोर्ट तक पहुंच चुका है. चित्रलेखा ने कहा- पूरी सच्चाई जाने बिना बयानबाजी गलत भागवताचार्य चित्रलेखा ने प्रेमानंद महाराज के समर्थन में बोलते हुए कहा कि संत के बारे में लोग अपने मन में आने वाली बातों को बोल रहे हैं. उन्होंने कहा कि किसी को किसी के बारे में कुछ पता नहीं है, फिर भी बड़ी-बड़ी बातें की जा रही हैं. उन्होंने कहा कि यदि कोई घटना हुई भी है तो उसे लेकर पूरी जानकारी सामने आने से पहले किसी संत-महापुरुष पर आरोप लगाना उचित नहीं है. चित्रलेखा ने कहा कि सच्चाई की जानकारी नहीं है तो मौन रहना बेहतर है. अनिरुद्धाचार्य ने भी किया प्रेमानंद महाराज का समर्थन कथावाचक अनिरुद्धाचार्य भी प्रेमानंद महाराज के समर्थन में सामने आए हैं. उन्होंने मीडिया और सोशल मीडिया पर बिना पूरी जानकारी के लगाए जा रहे आरोपों पर सवाल उठाया. उनका कहना है कि किसी मामले की पूरी जानकारी सामने आए बिना किसी को जिम्मेदार ठहराना उचित नहीं है. अनिरुद्धाचार्य ने कहा कि संत प्रेमानंद महाराज के प्रवचनों से बड़ी संख्या में लोगों के जीवन में सकारात्मक बदलाव आया है. उन्होंने अपील की कि किसी भी मामले में पूरी जानकारी सामने आने से पहले निष्कर्ष नहीं निकाला जाना चाहिए. संतों के साथ पीठाधीश्वर भी समर्थन में आए अमर उजाला की 5 अक्टूबर की रिपोर्ट के अनुसार, प्रेमानंद महाराज के समर्थन में संत और भागवताचार्य सामने आए हैं. पीठाधीश्वर महंत राजेंद्र दास महाराज ने भी संत प्रेमानंद महाराज का नाम लिए बिना कहा कि समाज बड़े से बड़े महापुरुष की आलोचना करने में नहीं चूकता, लेकिन समाज को इससे क्या मिला, इस पर विचार किया जाना चाहिए. मुख्यमंत्री को पत्र लिखकर जांच की मांग श्रीकृष्ण जन्मभूमि मुक्ति न्यास के अध्यक्ष दिनेश फलाहारी ने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को पत्र लिखकर संत प्रेमानंद महाराज की सुरक्षा और आश्रम परिसर से जुड़ी गतिविधियों की जांच की मांग की है. पत्र में उन्होंने श्रीराधा केलिकुंज आश्रम से जुड़ी गतिविधियों को लेकर कई आरोप लगाए हैं. उन्होंने आश्रम से जुड़े संपत्ति और व्यावसायिक गतिविधियों की जांच कराने तथा वहां लगे CCTV फुटेज सुरक्षित कराने की मांग की है. ये आरोप पत्र में लगाए गए हैं, इनकी स्वतंत्र पुष्टि अभी नहीं हुई है. आश्रम में मतभेद का भी लगाया गया आरोप दिनेश फलाहारी ने दावा किया है कि श्रीराधा केलिकुंज आश्रम से जुड़ी गतिविधियों को लेकर दो पक्षों के बीच मतभेद हैं. पत्र में उन्होंने इन गतिविधियों की जांच की मांग की है. उन्होंने यह भी दावा किया कि इन्हीं परिस्थितियों से आहत होकर प्रेमानंद महाराज ने आश्रम छोड़कर यमुना पार बेलवन क्षेत्र में प्रवास शुरू किया है. यह भी पत्र में किया गया दावा है, इसे पुलिस या प्रशासन की पुष्टि के रूप में नहीं लिखा जाना चाहिए. बच्चों को लेकर भी जांच की मांग पत्र में आश्रम में आने वाले बच्चों और किशोरों को लेकर भी चिंता जताई गई है. दिनेश फलाहारी ने उत्तर प्रदेश बाल संरक्षण आयोग से इस संबंध में जांच कराने की मांग की है. उनका कहना है कि कुछ शिशु आध्यात्मिक गतिविधियों से प्रभावित होकर आश्रम में रुक जाते हैं और उनके परिजन उनकी तलाश में वहां पहुंचते हैं. उन्होंने ऐसे मामलों की वास्तविक स्थिति सामने लाने की मांग की है. अनुज और मयंक दोनों सकुशल बरामद इस पूरे प्रकरण में लापता बताए जा रहे दो किशोरों को लेकर भी अब महत्वपूर्ण अपडेट सामने आ चुका है. सादाबाद के अनुज चौधरी को बरसाना के एक आश्रम से, जबकि कासगंज के मयंक चौहान को प्रयागराज के दारागंज से पुलिस ने सकुशल बरामद कर लिया है. दोनों की पहचान उनके परिजनों ने की है. रसिक दुलारी की मौत की जांच अभी जारी वहीं, प्रेमानंद महाराज के शिष्य रसिक दुलारी शरण उर्फ दीपक लोधी की 25 सितंबर को हुई मौत की जांच अभी जारी है. उन्हें वृंदावन में एक इमारत की चौथी मंजिल से गिरने के बाद अस्पताल ले जाया गया था, जहां चिकित्सकों ने मृत घोषित कर दिया था. पोस्टमार्टम में गंभीर चोटों की बात सामने आई है और पुलिस मामले से जुड़े साक्ष्यों की जांच कर रही है. मामला इलाहाबाद हाईकोर्ट भी पहुंचा रसिक दुलारी की मौत का मामला अब इलाहाबाद हाईकोर्ट तक भी पहुंच चुका है. मामले की जांच के लिए SIT गठित करने की मांग की गई है. हालांकि, यह मांग किए जाने का अर्थ यह नहीं है कि हाईकोर्ट ने SIT जांच का आदेश दे दिया है. आश्रम ने भी जारी किया अपना बयान इस बीच श्री हित राधा केलिकुंज ट्रस्ट की ओर से बयान जारी कर कहा गया कि रसिक दुलारी शरण की मौत से प्रेमानंद महाराज और उनका परिकर आहत है. ट्रस्ट ने कहा कि पुलिस प्रशासन की निष्पक्ष और तथ्यात्मक जांच में पूरा सहयोग किया जा रहा है. साथ ही जांच पूरी होने तक अपुष्ट जानकारी, अफवाह या अनुमान के आधार पर निष्कर्ष नहीं निकालने की अपील की गई है. यह भी पढ़ें: CM योगी ने बदला भदोही का नाम, फिर बना ‘संत रविदास नगर भदोही’; 32 साल में 5वीं बार बदली जिले की पहचान The post प्रेमानंद महाराज के समर्थन में उतरे संत-समाज, चित्रलेखा-अनिरुद्धाचार्य ने कहा- पूरी बात जाने बिना बयानबाजी गलत, हाईकोर्ट पहुंचा केस appeared first on Naya Vichar.

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अभिजीत दीपके ने अमित शाह को पोस्ट किया टैग, कहा- ‘कितनों को अरेस्ट करोगे, 10 अक्टूबर को पूरा देश आ रहा है’

अभिजीत दीपके ने सौरव दास के आरोप पर रिएक्शन दिया है. सीजेपी नेता सौरव दास ने एक्स पर एक पोस्ट शेयर किया है. इसमें उन्होंने आरोप लगाया है कि प्रशासन उन्हें, अभिजीत, आशुतोष, रत्ना और पार्टी के अन्य नेताओं को गिरफ्तार करने की तैयारी कर रही है. उन्होंने कहा कि प्रशासन की ऐसी कार्रवाई से युवा पीछे हटने वाले नहीं हैं. नई पीढ़ी अपने अधिकारों और भविष्य के लिए जागरूक हो चुकी है. सौरव दास ने लोगों से अपील की कि नेता जेल जाएं या बाहर रहें, आंदोलन जारी रहना चाहिए. उन्होंने कहा कि वे जेल जाने या इससे भी बड़ी मुश्किलों का सामना करने के लिए तैयार हैं. साथ ही 10 अक्टूबर से देशभर में बड़े स्तर पर विरोध प्रदर्शन करने की अपील की. एक्स पर क्या लिखा अभिजीत दीपके ने, पढ़ें सौरव के इस पोस्ट को कोट करते हुए अभिजीत दीपके ने लिखा, ‘कितनो को अरेस्ट करोगे. 10 अक्टूबर को पूरा देश आ रहा है. इस पोस्ट की खास बात ये है कि सवालिया निशान के साथ पोस्ट को उन्होंने अमित शाह  को टैग किया है. महाराष्ट्र के पुणे में क्या बोले अभिजीत दीपके पेपर लीक के खिलाफ छात्रों के समर्थन में उतरे अभिजीत दीपके महाराष्ट्र के पुणे में अभिजीत दीपके ने प्रदर्शन कर रहे छात्रों से 4 अक्टूबर को मुलाकात की. उन्होंने कहा कि लगातार पेपर लीक होने से छात्रों का भविष्य खतरे में है, लेकिन प्रशासन इस मामले को गंभीरता से नहीं ले रही है. CJP छात्रों की मांगों का समर्थन करती है. दीपके ने साफ कहा कि जब तक महाराष्ट्र लोक सेवा आयोग (MPSC) के चेयरमैन इस्तीफा नहीं देते, तब तक छात्रों का विरोध प्रदर्शन जारी रहेगा. ज्ञानेश कुमार पर क्या बोले दीपके, देखें ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे और SIR पर रोक की मांग अभिजीत दीपके ने की अभिजीत दीपके ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को लेकर कहा कि जब तक ज्ञानेश कुमार इस्तीफा नहीं देते और निष्पक्ष चुनाव सुनिश्चित नहीं होते, तब तक ऐसे चुनावों में हिस्सा लेने का कोई मतलब नहीं है, क्योंकि उनके अनुसार विजेता पहले से तय है. दीपके ने दावा किया कि बीजेपी उन राज्यों में भी जीत रही है, जहां कथित तौर पर ‘मोदी लहर’ के दौरान भी उसे सफलता नहीं मिली थी. उन्होंने इसके लिए ज्ञानेश कुमार को जिम्मेदार बताया. दीपके ने कहा कि ज्ञानेश कुमार के पद से हटने और SIR प्रक्रिया पर रोक लगने के बाद ही पता चलेगा कि बीजेपी वास्तव में कितनी सीटें जीतती है. The post अभिजीत दीपके ने अमित शाह को पोस्ट किया टैग, कहा- ‘कितनों को अरेस्ट करोगे, 10 अक्टूबर को पूरा देश आ रहा है’ appeared first on Naya Vichar.

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कौन-सी दाल सबसे ज्यादा हेल्दी? डॉक्टर की रेटिंग में मूंग दाल नंबर-1, जानिए किस दाल को मिले कितने नंबर

हिंदुस्तानीय थाली में दाल सिर्फ स्वाद नहीं बढ़ाती, बल्कि शरीर को प्रोटीन, फाइबर, आयरन, फोलेट, मैग्नीशियम, पोटैशियम और दूसरे माइक्रोन्यूट्रिएंट्स भी देती है. लेकिन जब बाजार में मूंग, मसूर, अरहर, चना और उड़द जैसी कई वैरायटी मौजूद हैं, तो सवाल है कि आखिर उनमें से सबसे ज्यादा हेल्दी दाल कौनसी है. दिल्ली स्थित ISIC मल्टीस्पेशलिटी अस्पताल के गैस्ट्रोएंटरोलॉजिस्ट डॉ. शुभम वत्स्य ने अलग-अलग दालों को उनकी पोषण संबंधी खूबियों और पाचन के लिहाज से 10 में से रेटिंग दी है. इस रेटिंग में मूंग दाल 9.5/10 के साथ शीर्ष पर है. हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि बाकी दालें बिल्कुल कम हेल्दी हैं. हर दाल से अलग-अलग पोषण मिलता है और कई बार किसी व्यक्ति के लिए सबसे अच्छी दाल उसकी सेहत, जरूरत और पाचन क्षमता पर भी निर्भर कर सकती है. तो क्या सिर्फ नंबर-1 दाल ही खानी चाहिए? बिल्कुल नहीं. हर दाल में पोषक तत्वों का संयोजन अलग होता है. साथ ही आपकी उम्र, शरीर की जरूरत, कुल डाइट और पाचन क्षमता भी मायने रखती है. इसलिए रोजाना सिर्फ एक ही दाल खाने के बजाय मूंग, मसूर, अरहर, चना और उड़द जैसी अलग-अलग दालों को रोटेट करके खाना ज्यादा बेहतर तरीका हो सकता है. यह भी पढ़ें: प्लास्टिक के डिब्बे में गर्म खाना रखने से हो सकता है कैंसर, भूल कर भी न रखें ये 4 चीजें The post कौन-सी दाल सबसे ज्यादा हेल्दी? डॉक्टर की रेटिंग में मूंग दाल नंबर-1, जानिए किस दाल को मिले कितने नंबर appeared first on Naya Vichar.

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‘कबीर सिंह’ के 20 मिनट भी नहीं झेल पाए अदिल हुसैन, फिल्म करने का आज भी पछतावा, 200 करोड़ के ऑफर पर कही ये बात

किसी एक्टर की पहचान हमेशा उसके सबसे बड़े रोल से नहीं होती. कई बार पर्दे पर कुछ मिनट का किरदार भी ऐसा असर छोड़ जाता है कि पूरी फिल्म के बाद वही चेहरा याद रह जाता है. अदिल हुसैन इसी तरह के एक्टर हैं. उन्होंने न तो पारंपरिक तरीके से बॉलीवुड में एंट्री ली और न ही खुद को सिर्फ हिंदी सिनेमा तक सीमित रखा. असम के छोटे से शहर गोलपाड़ा से निकले अदिल ने थिएटर किया, स्टैंड-अप कॉमेडी की, मोबाइल थिएटर में काम किया, नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा पहुंचे और फिर इंटरनेशनल सिनेमा तक अपनी जगह बनाई. आज उनके 63वें जन्मदिन के मौके पर जानिए एक छोटे से कस्बे से निकलकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी अदाकारी से अलग पहचान बनाने तक का उनका पूरा सफर. 5 साल की उम्र में शुरू हुआ जुनून अदिल हुसैन का जन्म 5 अक्टूबर 1963 को असम के गोलपाड़ा में हुआ था. उनके पिता एक स्कूल हेडमास्टर थे और चाहते थे कि बेटा पढ़ाई पूरी करके अंग्रेजी का प्रोफेसर या शिक्षक बने. लेकिन अदिल की किस्मत में तो कुछ और ही लिखा था. आदिल हुसैन शुरुआती दिनों में थिएटर और मंच पर परफॉर्म करते अदिल हुसैन. बचपन के अनोखे किस्से: 5 साल में पहली परफॉर्मेंस: जब वह सिर्फ 5 साल के थे, तभी से मोहल्ले के लोगों को इकट्ठा करके उनके सामने स्टैंड-अप कॉमेडी करने लगे थे. 16 साल में लिया फैसला: स्कूल के नाटकों में भाग लेते-लेते 16 साल की उम्र तक आते-आते उन्होंने तय कर लिया कि उन्हें एक्टर ही बनना है. पिता से मतभेद: पिता एक सुरक्षित प्रशासनी नौकरी चाहते थे. एक्टिंग के फैसले की वजह से पिता उनसे कई सालों तक नाराज रहे, लेकिन अदिल ने अपना रास्ता नहीं बदला. कॉमेडी और मिमिक्री: गुवाहाटी के बी. बरुआ कॉलेज में पढ़ाई के दौरान उन्होंने लगभग 6 साल तक स्टैंड-अप कॉमेडी की और मशहूर बॉलीवुड स्टार्स की नकल उतारी. असम का मोबाइल थिएटर: उन्होंने असम की मशहूर ‘मोबाइल थिएटर’ परंपरा में काम किया और गांव-गांव घूमकर लाइव ऑडियंस के सामने अपनी एक्टिंग का लोहा मनवाया. जब NSD पहुंचकर टूटा स्टार बनने का सपना शुरुआत में अदिल भी आम लड़कों की तरह बड़े स्टार्स के दीवाने थे. वह अमिताभ बच्चन, धर्मेंद्र और राजेश खन्ना जैसा बड़ा सुपरस्टार बनना चाहते थे. नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा के दिनों में अदिल हुसैन. 27 साल की उम्र में जब वह नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा पहुंचे, तो सुपरस्टार बनने का उनका यह सपना बदल गया. NSD में उन्होंने समझा कि एक्टर बनने का मतलब सिर्फ स्टारडम हासिल करना नहीं, बल्कि किरदार को ईमानदारी से जीना है. इसके बाद उन्हें चार्ल्स वॉलेस स्कॉलरशिप मिली और वह ड्रामा स्टूडियो लंदन में एक्टिंग सीखने गए. 2012 में बदला करियर, मिली अंतरराष्ट्रीय पहचान अदिल हुसैन ने असमिया, बंगाली, तमिल, मलयालम, मराठी, हिंदी और अंग्रेजी समेत कई भाषाओं में काम किया. लेकिन साल 2012 उनके करियर का टर्निंग प्वाइंट साबित हुआ. फिल्म ‘इंग्लिश विंग्लिश’ और ‘लाइफ ऑफ पाई’ में अदिल हुसैन के आइकॉनिक रोल्स. साल फिल्म किरदार खासियत / उपलब्धि 2012 इंग्लिश विंग्लिश सतीश गोडबोले (श्रीदेवी के पति) कम बोलने वाले, व्यावहारिक पति के रोल में बिना ड्रामे के छाप छोड़ी. 2012 लाइफ ऑफ पाई संतोष पटेल (पाई के पिता) ऑस्कर विजेता फिल्म, जिसने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाई. 2017 मुक्ति भवन / मज राति केतकी दया / सोमनाथ 64वें राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कारों में दोनों फिल्मों के लिए Special Mention Award मिला. 2018 व्हाट विल पीपल से मिर्जा (नॉर्वेजियन फिल्म) नॉर्वे का प्रतिष्ठित Amanda Award जीता. 2019 कबीर सिंह कॉलेज डीन छोटा सा रोल, लेकिन आज भी फिल्म चुनने को लेकर पछतावा जताया. 2026 ऑपरेशन सफेद सागर एयर मार्शल विनोद पाटनी नेटफ्लिक्स सीरीज में 1999 कारगिल युद्ध के एयर कमांडर का दमदार रोल. ‘कबीर सिंह’: जब अपनी ही फिल्म की कर दी पब्लिक में बुराई अदिल हुसैन के करियर में ‘कबीर सिंह’ सबसे चर्चित विवादों में से एक रहा. वह अकेले ऐसे एक्टर रहे जिन्होंने खुलेआम अपनी ही हिट फिल्म की आलोचना की. फिल्म ‘कबीर सिंह’ में कॉलेज डीन के किरदार में अदिल हुसैन. बिना स्क्रिप्ट पढ़े की फिल्म: अदिल ने बताया कि ‘कबीर सिंह’ इकलौती ऐसी फिल्म थी, जिसे उन्होंने बिना पूरी स्क्रिप्ट पढ़े साइन किया था. 20 मिनट में थिएटर से बाहर: जब वह फिल्म देखने थिएटर पहुंचे, तो 20 मिनट बाद ही बाहर निकल आए. उन्होंने कहा कि फिल्म में स्त्रीओं के प्रति गलत बर्ताव और हिंसा को सही ठहराया गया है, जिसका उन्हें पछतावा है. 100-200 करोड़ का ऑफर भी ठुकरा दें: निर्देशक संदीप रेड्दी वांगा से सोशल मीडिया पर बहस के बाद अदिल ने साफ कहा कि अगर उन्हें ‘एनिमल’ जैसी फिल्मों के लिए 200 करोड़ रुपये भी मिले, तो भी वह ऐसी फिल्में नहीं करेंगे. 2026 में लगातार एक्टिव: एयर मार्शल के रोल में दिखे 63 साल की उम्र में भी अदिल का सफर जारी है. साल 2026 में रिलीज हुई वेब सीरीज ‘ऑपरेशन सफेद सागर’ में उन्होंने 1999 कारगिल युद्ध के दौरान वेस्टर्न एयर कमांड के चीफ रहे एयर मार्शल विनोद पाटनी का किरदार निभाया. 2026 की सीरीज ‘ऑपरेशन सफेद सागर’ में एयर मार्शल के रोल में अदिल हुसैन. View on Instagram अदिल का मानना है कि रोल छोटा हो या बड़ा, जब तक कैमरा आपके ऊपर है, किरदार एकदम असली और सच्चा लगना चाहिए. अमिताभ और धर्मेंद्र जैसा स्टार बनने का सपना देखने वाले अदिल हुसैन आज किसी पहचान के मोहताज नहीं हैं. वह साबित करते हैं कि स्टारडम से बड़ी चीज होती है- एक बेहतरीन और सच्चा कलाकार होना. ये भी पढ़ें: ‘मैं सुनीता नहीं हूं, तेरी धज्जियां उड़ा दूंगी’, गोविंदा की रूमर्ड GF पर भड़कीं राखी सावंत, कहा- ‘पति चोर’ ये भी पढ़ें: बड़ी फिल्म दिलाऊंगा, शो के बाद भी मेरे साथ रहना… क्या इरीना रुदाकोवा पर आया तेज प्रताप यादव का दिल? The post ‘कबीर सिंह’ के 20 मिनट भी नहीं झेल पाए अदिल हुसैन, फिल्म करने का आज भी पछतावा, 200 करोड़ के ऑफर पर कही ये बात appeared first on Naya Vichar.

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Maruti Cars क्यों हैं इतनी पॉपुलर? एक्सपर्ट ने बताया बिक्री का राज, Brezza की डिमांड से E20 पेट्रोल तक जानें पूरी कहानी

मारुति सुजुकी की कारों की बाजार में मजबूत बिक्री के पीछे कई प्रमुख कारण हैं. मारुति की गाड़ियां कम रनिंग कॉस्ट और बेहतर माइलेज के लिए जानी जाती हैं, जिससे ग्राहकों के लिए इनका इस्तेमाल कॉस्ट-इफेक्टिव रहता है. इसके अलावा इन कारों की मेंटेनेंस कॉस्ट भी रिलेटिवली कम होती है. कार खरीदते समय ग्राहक सिर्फ शुरुआती कीमत नहीं देखता, बल्कि लंबे समय में होने वाले खर्च और कार की रीसेल वैल्यू को भी ध्यान में रखता है. मारुति की कारों को 5 साल बाद बेचने पर भी अच्छी रीसेल वैल्यू मिल जाती है. इन्हीं सब बातों को लेकर हमने ऑटो एक्सपर्ट राजीव चक्रवर्ती से बातचीत की है. आइए जानते हैं उन्होंने क्या कहा है.  वर्तमान में मारुति का कौन-सा मॉडल सबसे ज्यादा बिक रहा है? मौजूदा समय में मारुति सुजुकी के पोर्टफोलियो में Brezza और Victoris की मांग काफी मजबूत बताई जा रही है. एक्सपर्ट राजीव चक्रवर्ती के अनुसार, 2026 Brezza मॉडल के आने के बाद ग्राहकों की ओर से इसकी डिमांड और क्वेरीज में काफी बढ़ोतरी हुई है. फेस्टिव सीजन से पहले ही Brezza को 2 लाख से अधिक बुकिंग्स मिलने की बात कही गई है. इसके पॉपुलर होने की एक बड़ी वजह इसके आकर्षक फीचर्स के साथ इसकी किफायती कीमत है, जो इसे ग्राहकों के लिए एक मजबूत ऑप्शन बनाती है. मारुति अपनी कारों को कंपटीटर्स के मुकाबले अफोर्डेबल कैसे बनाती है? मारुति सुजुकी अपनी कारों को किफायती बनाने के लिए ग्राहकों की मांग और बाजार की जरूरतों को समझने पर फोकस करती है. इसपर राजीव का कहना है कि, कंपनी कार को डिजाइन करते समय यह ध्यान रखती है कि ग्राहकों को किन फीचर्स की जरूरत है और बाजार में किस तरह की कार की मांग है. इसी आधार पर जरूरी फीचर्स को शामिल किया जाता है, जिससे कार की कीमत को ग्राहकों की जरूरत और बजट के हिसाब से रखा जा सके. नई कार खरीदते समय ग्राहक किन बातों का ध्यान रखते हैं? नई कार खरीदते समय ग्राहक के मन में सबसे बड़ा सवाल यह रहता है कि 8-10 लाख रुपये खर्च करने पर उसे इसका कितना रिटर्न मिलेगा और क्या वह अपने पैसे का सही इस्तेमाल कर रहा है. एक्सपर्ट के अनुसार, ग्राहक मुख्य रूप से कार के माइलेज, मेंटेनेंस खर्च और भविष्य की रीसेल वैल्यू पर ध्यान देते हैं. यही वजह है कि कम रनिंग कॉस्ट वाली कारों की मांग बनी रहती है. उदाहरण के तौर पर S-Presso का CNG वेरिएंट 30 किलोमीटर प्रति किलोग्राम से ज्यादा का माइलेज देता है, जो माइलेज को प्राथमिकता देने वाले ग्राहकों को अट्रैक्ट करता है. ये भी पढ़ें: EV में आग क्यों लगती है, क्या पेट्रोल कारों से ज्यादा है खतरा? ऑटोमोबाइल एक्सपर्ट ने बताया पूरा स्पोर्ट्स फेस्टिव सीजन में क्या तैयारियां और ऑफर्स हैं? दशहरा, दिवाली और छठ जैसे त्योहारों के दौरान कारों की मांग बढ़ जाती है. ऐसे में फेस्टिव ऑफर्स और मांग को लेकर राजीव चक्रवर्ती ने बताया कि, डीलर्स के सामने सबसे बड़ी चुनौती पर्याप्त स्टॉक और कारों की उपलब्धता बनाए रखना होती है. शोरूम में कार खड़ी करने से पहले उसकी PDI यानी प्री-डिलीवरी इंस्पेक्शन की जाती है, ताकि ग्राहक को डिलीवरी के समय सही स्थिति में वाहन दिया जा सके. फेस्टिव सीजन में ग्राहकों के लिए एक्सचेंज ऑफर्स भी काफी महत्वपूर्ण होते हैं. दिवाली के दौरान पुरानी कार को एक्सचेंज करने पर मिलने वाला एक्सचेंज बोनस ग्राहकों के लिए फायदेमंद हो सकता है. अक्टूबर महीने में S-Presso पर 35,000 रुपये तक के ऑफर या बोनस भी देखने को मिले हैं. साल के किस महीने में कार खरीदना बेहतर होता है? कार खरीदने का सबसे सही समय ग्राहक की व्यक्तिगत जरूरत पर निर्भर करता है. हालांकि, नवंबर और दिसंबर यानी साल के अंत में कार खरीदना कई मामलों में फायदेमंद माना जाता है. इस दौरान डीलर्स पुराने स्टॉक को क्लियर करने के लिए ज्यादा डिस्काउंट और ऑफर्स दे सकते हैं. इसके अलावा ग्राहक को नए साल के बैच कोड वाली गाड़ी मिलने की संभावना रहती है. हालांकि, कई ग्राहक धार्मिक आस्था और शुभ मुहूर्त को देखते हुए दशहरा और दिवाली जैसे त्योहारों के दौरान ही नई कार खरीदना पसंद करते हैं. ये भी पढ़ें: कंपनी बताती है 200Km, लेकिन मिलती है कम, एक्सपर्ट ने समझाया इलेक्ट्रिक स्कूटर की रियल रेंज का गणित मारुति और टोयोटा के सहयोग को बाजार से कैसा रिस्पॉन्स मिला? मारुति सुजुकी और टोयोटा के सहयोग को बाजार में पॉजिटिव रिस्पॉन्स मिला है. इस साझेदारी के तहत टोयोटा की इलेक्ट्रिकल और हाइब्रिड टेक्नोलॉजी का लाभ मारुति को मिला है, जबकि मारुति ने अपनी कॉम्पैक्ट कार टेक्नोलॉजी टोयोटा के साथ साझा की है. इसका एक उदाहरण Maruti Baleno और Toyota Glanza हैं, जहां दोनों कंपनियों के बीच टेक्नोलॉजी और प्रोडक्ट शेयरिंग देखने को मिलती है. एक्सपर्ट के अनुसार, ग्राहक इस तरह के सहयोग पर भरोसा कर रहे हैं और बाजार में इसका रिस्पॉन्स काफी अच्छा रहा है. E20 पेट्रोल का कारों पर क्या असर पड़ रहा है? E20 पेट्रोल को लेकर मारुति सुजुकी की तैयारियां काफी पहले से चल रही हैं. एक्सपर्ट के मुताबिक, कंपनी 2020 से ही E20 ईंधन के लिए तैयारी कर रही है. ग्राहकों से मिले फीडबैक के आधार पर E20 पेट्रोल के इस्तेमाल से माइलेज में मामूली अंतर देखने को मिला है, लेकिन इंजन में किसी तरह की खराबी या नुकसान की रिपोर्ट सामने नहीं आई है. एक्सपर्ट के अनुसार, E20 से अगर छोटी-मोटी समस्या आती भी है तो वह कैटेलिटिक कनवर्टर के चोक होने या स्पार्क प्लग के जल्दी गंदा होने जैसी हो सकती है. हालांकि, इंजन खराब होने जैसी किसी बड़ी समस्या की रिपोर्ट नहीं मिली है. The post Maruti Cars क्यों हैं इतनी पॉपुलर? एक्सपर्ट ने बताया बिक्री का राज, Brezza की डिमांड से E20 पेट्रोल तक जानें पूरी कहानी appeared first on Naya Vichar.

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अब रिचार्ज के लिए पूरी ऐप नहीं खंगालनी पड़ेगी, TRAI ने टेलीकॉम कंपनियों को दिया आदेश, सबसे पहले दिखेंगे ये खास प्लान

अब मोबाइल रिचार्ज करने वाले लोगों के लिए जरूरी प्लान ढूंढना आसान हो जाएगा. TRAI ने सभी टेलीकॉम कंपनियों को अपनी वेबसाइट और मोबाइल ऐप में “TRAI-Mandated Packs” नाम से एक अलग सेक्शन बनाने को कहा है. इस सेक्शन में TRAI के नियम के तहत दिए जाने वाले जरूरी रिचार्ज प्लान दिखेंगे. इससे ग्राहकों को अपनी जरूरत का प्लान ढूंढने के लिए पूरी वेबसाइट या ऐप में इधर-उधर जाने की जरूरत नहीं पड़ेगी. आइए इसे डिटेल में समझते हैं. ग्राहकों की शिकायतों के बाद TRAI ने उठाया कदम TRAI ने यह निर्देश 1 अक्टूबर 2026 को जारी किया. इसकी वजह ग्राहकों की शिकायतें थीं. लोगों का कहना था कि टेलीकॉम कंपनियों की वेबसाइट और ऐप पर जरूरी वाउचर आसानी से नहीं मिलते. कई बार यह समझना भी मुश्किल होता है कि वाउचर कहां जाकर मिलेगा. TRAI ने जब कंपनियों की वेबसाइट और ऐप की जांच की, तो वहां भी यही परेशानी देखने को मिली. कई जगह वाउचर साफ तौर पर दिखाई नहीं दे रहे थे. कुछ कंपनियों ने इन्हें अलग-अलग कैटेगरी में रखा था, जबकि कई जगह वाउचर तक पहुंचने के लिए यूजर्स को कई पेज खोलने पड़ते थे. TRAI के अनिवार्य रिचार्ज के लिए होंगे अलग सेक्शन नए निर्देश के तहत अब टेलीकॉम कंपनियों की वेबसाइट और मोबाइल ऐप पर प्रीपेड रिचार्ज सेक्शन खोलते ही सबसे पहले “TRAI-Mandated Packs” का टैब दिखाई देगा. इस सेक्शन में TRAI के नियमों के तहत जरूरी अलग-अलग तरह के रिचार्ज वाउचर शामिल होंगे. इतना ही नहीं, कंपनियों को अपने खास स्टोर और रिचार्ज सेंटर पर भी इन प्लान्स की जानकारी साफ-साफ दिखानी होगी. TRAI के रिचार्ज प्लान से जुड़े नियम TRAI के नियमों के मुताबिक, टेलीकॉम कंपनियों को अपने ग्राहकों के लिए कम से कम एक ऐसा Plan Voucher, Special Tariff Voucher (STV) और Combo Voucher देना जरूरी है, जिसकी वैलिडिटी 30 दिनों की हो. इसके अलावा, ऐसे रिचार्ज प्लान भी उपलब्ध होने चाहिए जिन्हें हर महीने उसी तारीख पर दोबारा रिन्यू कराया जा सके. TRAI के नियमों के मुताबिक, ऐसे रिचार्ज प्लान भी होने चाहिए, जिनमें ग्राहक को सिर्फ फोन करने और SMS भेजने की सुविधा मिलती हो. ये भी पढ़ें: TRAI Data: अगस्त में जियो ने फिर रचा इतिहास, मोबाइल और होम ब्रॉडबैंड दोनों में बनी नंबर वन; देखें पूरा रिपोर्ट कार्ड The post अब रिचार्ज के लिए पूरी ऐप नहीं खंगालनी पड़ेगी, TRAI ने टेलीकॉम कंपनियों को दिया आदेश, सबसे पहले दिखेंगे ये खास प्लान appeared first on Naya Vichar.

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क्या करें बाहर रहने वाले बिहारी? छठ पर घर वापसी मुश्किल, ट्रेन में टिकट नहीं और हवाई सफर महंगा

Chhath Puja Train Ticket Crisis: अक्टूबर का महीना शुरू होते ही देश भर में त्योहारों का मौसम दस्तक दे चुका है. दुर्गा पूजा के बाद हर किसी की निगाहें दिवाली और लोकआस्था के महापर्व छठ पर टिकी रहती है. दिल्ली, मुंबई, सूरत, अहमदाबाद, बेंगलुरु और पंजाब जैसे शहरों में पसीना बहा रहे लाखों बिहारियों के लिए यह सिर्फ एक छुट्टी का समय नहीं होता. यह वह वक्त होता है जब वे अपने घर, परिवार, मिट्टी और संस्कृति से दोबारा जुड़ते हैं. लेकिन हर साल की तरह इस बार भी बिहार लौटने का यह सफर किसी महा-सर्कस से कम साबित नहीं हो रहा है. जैसे-जैसे त्योहारों की तारीखें नजदीक आ रही हैं, वैसे-वैसे बिहारियों की धड़कनें तेज होती जा रही हैं. घर जाने की खुशी पर टिकट न मिलने का तनाव पूरी तरह हावी हो चुका है. ट्रेनों में 3 महीने पहले से नो-रूम अगर आप आज दिल्ली से पटना, दरभंगा, मुजफ्फरपुर या भागलपुर के लिए ट्रेन का कन्फर्म टिकट तलाश रहे हैं, तो आपको सिर्फ निराशा ही हाथ लगेगी. देश के प्रमुख रेल मार्गों पर चलने वाली प्रीमियम और सुपरफास्ट ट्रेनों का हाल बेहद बुरा है. संपूर्ण क्रांति एक्सप्रेस, श्रमजीवी एक्सप्रेस, विक्रमशिला एक्सप्रेस, वैशाली एक्सप्रेस और सप्त क्रांति एक्सप्रेस जैसी चर्चित ट्रेनों में बुकिंग खुलते ही महज कुछ ही मिनटों में सभी सीटें भर गईं. स्थिति यह है कि इन ट्रेनों में अक्टूबर के दूसरे हफ्ते से लेकर नवंबर तक रिग्रेट और नो-रूम के बोर्ड लग चुके हैं. कई मुख्य रूटों पर 200 से 300 से भी ज्यादा की वेटिंग लिस्ट चल रही है. ऐसे में आईआरसीटीसी की वेबसाइट पर लॉग इन करते ही यात्रियों के हाथ सिर्फ मायूसी लग रही है. जो लोग तत्काल टिकट के भरोसे बैठे हैं, उनके लिए भी एक-एक सीट के लिए हजार लोग कतार में खड़े हैं. पूजा स्पेशल ट्रेनों की जमीनी हकीकत क्या है यात्रियों की इस भारी भीड़ और हाहाकार को देखते हुए हिंदुस्तानीय रेलवे हर साल सैकड़ों पूजा स्पेशल ट्रेनें चलाने का ढिंढोरा पीटता है. दावे किए जाते हैं कि अतिरिक्त ट्रेनें चलाकर हर यात्री को उसके गंतव्य तक सुरक्षित पहुंचाया जाएगा. लेकिन क्या वास्तव में यह व्यवस्था कारगर साबित होती है? जमीनी हकीकत यह है कि इन पूजा स्पेशल ट्रेनों का कोई भरोसा नहीं होता. इन ट्रेनों को अक्सर नियमित ट्रेनों को रास्ता देने के लिए आउटर सिग्नलों पर घंटों खड़ा रख दिया जाता है. 12 से 15 घंटे का सफर तय करने वाली स्पेशल ट्रेनें 24 से 30 घंटे में पटना या मुजफ्फरपुर पहुंचती हैं. इसके अलावा, इन ट्रेनों के जनरल और स्लीपर कोचों की स्थिति तो और भी डरावनी होती है. डिब्बों में क्षमता से चार गुना ज्यादा लोग ठुंसे रहते हैं. शौचालय के पास, गलियारों में और यहां तक कि दो डिब्बों के जोड़ पर बैठकर लोग हजार किलोमीटर से ज्यादा का सफर करने को मजबूर हैं. यह सफर आरामदायक तो दूर, बुनियादी मानवीय सुविधाओं से भी परे होता है. फ्लाइट के किराए में भयंकर उछाल जब ट्रेनों के सभी दरवाजे बंद दिखते हैं, तो मध्यमवर्गीय और कामकाजी लोग मजबूरी में हवाई जहाज यानी फ्लाइट का रुख करते हैं. लेकिन विमानन कंपनियों ने भी इस मजबूरी का पूरा फायदा उठाना शुरू कर दिया है. त्योहारों के सीजन में डायनेमिक फेयर के नाम पर हवाई किराए में आग लगी हुई है. सामान्य दिनों में दिल्ली से पटना का हवाई किराया 4000 से 5000 रुपये के बीच होता है. लेकिन दिवाली और छठ के ठीक 2-3 दिन पहले का किराया 15000 से लेकर 22000 रुपये प्रति व्यक्ति तक पहुंच चुका है. यदि परिवार में 4 सदस्य हैं, तो सिर्फ एक तरफ का हवाई किराया 80000 रुपये के पार जा रहा है. यही हाल दिल्ली से दरभंगा, मुंबई से पटना और बेंगलुरु से पटना जाने वाली फ्लाइट्स का भी है. एक आम नौकरीपेशा इंसान के लिए अपनी पूरी महीने की कमाई सिर्फ घर जाने के टिकट पर खर्च कर देना कतई मुमकिन नहीं है. बसों का किराया भी बढ़ा दिया जाता है ट्रेन और फ्लाइट से निराश होने के बाद प्रवासियों का अंतिम सहारा बनती हैं प्राइवेट बसें. दिल्ली के आनंद विहार, कश्मीरी गेट या सूरत और मुंबई से बिहार के विभिन्न जिलों के लिए चलने वाली प्राइवेट स्लीपर बसों का किराया भी तीन से चार गुना बढ़ा दिया जाता है. जो बसें आम दिनों में 1500 से 2000 रुपये लेती थीं, वे अब 5000 से 7000 रुपये प्रति सीट वसूलती हैं. इसके बावजूद, सुरक्षा मानकों की अनदेखी और लंबे ट्रैफिक जाम के बीच लोग किसी तरह अपने घर पहुंचने की उम्मीद में यह भारी रकम चुकाने को विवश रहते हैं. बिहार की ताजा समाचारों के लिए क्लिक करें स्थायी समाधान की दरकार और प्रशासनी व्यवस्था पर सवाल हर साल अक्टूबर और नवंबर के महीने में बिहार जाने वाले रेल और सड़क मार्गों पर यही संकट देखने को मिलता है. यह समस्या कोई नई नहीं है, बल्कि दशकों से चली आ रही है. इसके बावजूद अब तक इसका कोई ठोस और स्थायी समाधान नहीं निकाला जा सका है. केवल कुछ स्पेशल ट्रेनें चला देना या अतिरिक्त बोगियां जोड़ देना इस विशाल जनसैलाब के आगे ऊंट के मुंह में जीरा साबित होता है. आवश्यकता इस बात की है कि उत्तर हिंदुस्तान से बिहार को जोड़ने वाले रेल कॉरिडोर का स्थायी विस्तार किया जाए. नई नियमित ट्रेनें चलाई जाएं और हवाई किराए की ऊपरी सीमा तय की जाए ताकि त्यौहार के समय बिहारियों का शोषण न हो सके. बिहार की वित्तीय स्थिति को बाहर से पैसा भेजकर मजबूत करने वाले इन लाखों लोगों को हर साल अपनी ही सरजमीं पर वापस लौटने के लिए इतनी बड़ी जद्दोजहद और अपमान सहना पड़े, यह व्यवस्था पर एक बड़ा सवाल खड़ा करता है. The post क्या करें बाहर रहने वाले बिहारी? छठ पर घर वापसी मुश्किल, ट्रेन में टिकट नहीं और हवाई सफर महंगा appeared first on Naya Vichar.

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Asian Games Opinion: 800 करोड़ खर्च, फिर भी दक्षिण कोरिया से क्यों पीछे भारत? 140 करोड़ वाले देश के खेल सिस्टम से कौन पूछेगा सवाल

Asian Games Opinion: हिंदुस्तान ने एशियन गेम्स 2026 में 85 पदक जीतकर चौथा स्थान हासिल किया. 21 गोल्ड, 27 सिल्वर और 37 ब्रॉन्ज के साथ यह प्रदर्शन हिंदुस्तानीय खिलाड़ियों की मेहनत और उपलब्धि को दिखाता है. आखिरी दिनों में जिस तरह हिंदुस्तानीय खिलाड़ियों ने एक के बाद एक पदक जीते, उससे पूरे देश को जश्न मनाने का मौका मिला. लेकिन अब जब एशियन गेम्स का शोर थम चुका है और पदक तालिका सामने है, तो जश्न के साथ एक जरूरी सवाल भी खड़ा होता है. क्या हिंदुस्तान का स्पोर्ट्स सिस्टम उस रफ्तार से आगे बढ़ रहा है, जिस रफ्तार से उससे उम्मीद की जा रही है? सवाल खिलाड़ियों की मेहनत पर नहीं है. जिन्होंने मैदान पर उतरकर देश के लिए पदक जीता, उनकी उपलब्धि का सम्मान होना ही चाहिए. सवाल उस सिस्टम पर है, जो इन खिलाड़ियों को तैयार करता है, उन्हें ट्रेनिंग देता है, अंतरराष्ट्रीय एक्सपोजर दिलाता है और बड़े मंच तक पहुंचाता है. 107 से 85 मेडल पर पहुंचा हिंदुस्तान हांगझोउ एक स्टार खिलाड़ी मिलना सिस्टम की सफलता नहीं है स्पोर्ट्स एसोसिएशन (फोटो-AI) प्रशासन पैसा और सुविधाएं दे सकती है, लेकिन मैदान पर खिलाड़ी तैयार करने की जिम्मेदारी कई स्तरों पर बंटी होती है. स्पोर्ट्स महासंघ, कोचिंग सिस्टम, हाई परफॉर्मेंस सेंटर, विशेषज्ञ, सपोर्ट स्टाफ और खुद खिलाड़ी, सभी इस प्रक्रिया का हिस्सा हैं. इसलिए किसी बड़े आयोजन के बाद सिर्फ खिलाड़ियों की सफलता का जश्न मनाना और असफलता की स्थिति में खिलाड़ी की परफॉर्मेंस पर सवाल उठाना सही तरीका नहीं हो सकता. जहां पदक नहीं आया, वहां यह पता लगाना भी जरूरी है कि कमी खिलाड़ी में थी या तैयारी में. अगर किसी खिलाड़ी को पर्याप्त ट्रेनिंग, बेहतर कोचिंग, स्पोर्ट्स विज्ञान या अंतरराष्ट्रीय मुकाबलों का एक्सपोजर नहीं मिला, तो उसकी असफलता को सिर्फ उसके प्रदर्शन के खाते में डाल देना सबसे आसान रास्ता है. वहीं अगर सिस्टम ने पूरी तैयारी दी थी और फिर भी किसी स्पोर्ट्स में प्रदर्शन गिरा, तो यह जानना जरूरी है कि कमी कहां रह गई. यही फर्क एक गंभीर स्पोर्ट्स व्यवस्था और सिर्फ प्रतियोगिता-दर-प्रतियोगिता तैयारी करने वाली व्यवस्था के बीच होता है. ये भी पढ़ें: हिंदुस्तान-पाक में कोई मुकाबला नहीं बचा, हर मैच के बाद मिलती है सिर्फ शर्मिंदगी- शोएब अख्तर तो क्या हिंदुस्तान का स्पोर्ट्स सिस्टम सही दिशा में बढ़ रहा है? अब शुरुआत में उठाए गए सवाल पर लौटते हैं. क्या हिंदुस्तान का स्पोर्ट्स सिस्टम उस रफ्तार से आगे बढ़ रहा है, जिसकी उससे उम्मीद की जा रही है? मौजूदा आंकड़े इसका पूरी तरह हां में जवाब नहीं देते. हिंदुस्तान का स्पोर्ट्स सिस्टम पहले से मजबूत हुआ है. कई स्पोर्ट्सों में विश्वस्तरीय खिलाड़ी तैयार हुए हैं और 21 गोल्ड इसकी बड़ी मिसाल हैं. लेकिन 107 से 85 पदकों तक की गिरावट, गोल्ड की संख्या में कमी और लगातार दो एशियन गेम्स में चौथे स्थान पर बने रहना यह बताता है कि अभी हिंदुस्तान को लंबी छलांग लगाने के लिए काफी काम करना बाकी है. यानी समस्या प्रतिभा की कमी से ज्यादा प्रतिभा को लगातार चैंपियन बनाने, अलग-अलग स्पोर्ट्सों में गहराई तैयार करने और तैयारी को ज्यादा प्रभावी बनाने की है. अब अगला लक्ष्य सिर्फ 85 से 86 पदक करना नहीं होना चाहिए एशियन गेम्स 2026 का सबसे बड़ा सबक यही है कि हिंदुस्तान को पदकों के जश्न और प्रदर्शन की समीक्षा, दोनों को साथ लेकर चलना होगा. 85 पदक शानदार उपलब्धि हैं. 21 गोल्ड के लिए खिलाड़ियों को बधाई मिलनी ही चाहिए. लेकिन हांगझोउ के 107 पदकों से इस बार के 85 तक पहुंचने का आंकड़ा भी उतना ही महत्वपूर्ण है. खासकर तब, जब पिछले तीन वर्षों में एशियन गेम्स की तैयारी पर करीब ₹800 करोड़ खर्च हुए हैं. अगला लक्ष्य सिर्फ 85 से 86 पदक करना नहीं होना चाहिए. लक्ष्य ऐसा सिस्टम तैयार करना होना चाहिए, जिसमें एक खिलाड़ी के अनुपलब्ध होने पर उसकी जिम्मेदारी संभालने वाला दूसरा खिलाड़ी तैयार हो, एक पीढ़ी के बाद अगली पीढ़ी पहले से मजबूत हो और हर बड़े टूर्नामेंट के बाद सिर्फ पदकों की संख्या नहीं, बल्कि तैयारी की गुणवत्ता भी बेहतर दिखाई दे. 85 पदकों पर जश्न मनाइए. खिलाड़ियों को सलाम कीजिए. उनकी मेहनत का सम्मान कीजिए. लेकिन इसी जश्न के बीच सिस्टम से यह सवाल भी पूछिए. 107 से 85 तक आने के बाद हमने क्या सीखा और अगली बार 85 से आगे जाने के लिए अभी से क्या बदल रहा है? The post Asian Games Opinion: 800 करोड़ खर्च, फिर भी दक्षिण कोरिया से क्यों पीछे हिंदुस्तान? 140 करोड़ वाले देश के स्पोर्ट्स सिस्टम से कौन पूछेगा सवाल appeared first on Naya Vichar.

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AI vs Accountants: अकाउंटिंग टेस्ट में AI ने 12 प्रोफेशनल्स को पछाड़ा, क्या अब CA की नौकरी पर भी आएगी आफत?

AI Accounting Test: आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) के तेजी से बढ़ते इस्तेमाल के बीच अकाउंटिंग प्रोफेशन को लेकर भी नई बहस शुरू हो गई है. AI रिक्रूटिंग कंपनी Mercor की एक नई स्टडी में Claude Opus 5 ने कुछ जटिल अकाउंटिंग टास्क में अनुभवी प्रोफेशनल अकाउंटेंट्स से बेहतर प्रदर्शन किया है. Mercor ने इस तुलना के लिए 12 लाइसेंस्ड CPA को शामिल किया. इन सभी के पास औसतन करीब साढ़े पांच साल का अकाउंटिंग अनुभव था. उन्हें महीने के अंत में होने वाले अकाउंटिंग काम से जुड़े चार टास्क दिए गए, जो वास्तविक कामकाजी परिस्थितियों पर आधारित थे. इनमें कंपनी की फाइलों से सही आंकड़े ढूंढना, गणना करना और नतीजे टेबल के रूप में तैयार करना शामिल था. अमेरिका के CPA को हिंदुस्तान के CA से ऐसे समझें CPA यानी अमेरिका में अकाउंटिंग का पेशेवर लाइसेंस हासिल करने वाले लोग. इसे आसान भाषा में ऐसे समझ सकते हैं कि हिंदुस्तान में CA (चार्टर्ड अकाउंटेंट) होते हैं, उसी तरह अमेरिका में CPA (Certified Public Accountant) होते हैं. दोनों की भूमिका काफी हद तक मिलती-जुलती है, हालांकि दोनों की पढ़ाई, परीक्षा और लाइसेंस के नियम अलग हैं. 10 मिनट से कम समय में 100% स्कोर इस टेस्ट का नतीजा AI की मौजूदा क्षमता को दिखाता है. Claude Opus 5 ने किए गए सभी 20 प्रयासों में 100% स्कोर हासिल किया. उसने हर टास्क को 10 मिनट से भी कम समय में पूरा किया. वहीं, टेस्ट देने वाले लोगों की सटीकता अलग-अलग प्रयासों में 0 से करीब 90% के बीच रही और उनका औसत स्कोर करीब 37% था. ज्यादातर लोगों को टेस्ट पूरा करने में 30 से 180 मिनट का समय लगा. यानी साफ निर्देशों और तय तरीके से किए जाने वाले कामों में AI ने शानदार प्रदर्शन किया, लेकिन अकाउंटिंग के हर तरह के काम को लगातार और भरोसेमंद तरीके से करना अभी भी चुनौती है. क्या सच में CA की नौकरी खतरे में है? CA की नौकरी सिर्फ आंकड़े ढूंढने और गणना करने तक सीमित नहीं है. असल अकाउंटिंग काम में क्लाइंट से बात करना, सही सवाल पूछना, कारोबार की पूरी स्थिति समझना, नतीजों की जांच करना और उसके आधार पर फैसला लेना भी जरूरी होता है. इनमें से कई चीजें इस टेस्ट का हिस्सा ही नहीं थीं. इसलिए 100% स्कोर को पूरी CA या अकाउंटेंट की नौकरी के बराबर मानना सही नहीं होगा. हालांकि, यह जरूर संकेत देता है कि अकाउंटिंग के कई दोहराए जाने वाले और तय तरीके से किए जाने वाले काम AI तेजी से संभाल सकता है. AI से बदल सकता है अकाउंटिंग का काम आने वाले समय में डेटा खोजना, शुरुआती गणना और कुछ तय तरीके वाले अकाउंटिंग टास्क AI संभाल सकता है. वहीं अकाउंटेंट्स को नतीजों की जांच, क्लाइंट से बातचीत, कारोबार की स्थिति समझने और अपने अनुभव के आधार पर फैसला लेने जैसे कामों पर ज्यादा ध्यान देना पड़ सकता है. इसलिए इस स्टडी को “AI ने अकाउंटेंट्स की नौकरी खत्म कर दी” के तौर पर देखने के बजाय यह समझना ज्यादा सही होगा कि अकाउंटिंग के कुछ कामों में AI की रफ्तार और सटीकता तेजी से बढ़ रही है. ये भी पढ़ें: Weekly Top Jobs: शिक्षक से पुलिस और रेलवे तक, देखें इस हफ्ते की ये प्रशासनी भर्तियां The post AI vs Accountants: अकाउंटिंग टेस्ट में AI ने 12 प्रोफेशनल्स को पछाड़ा, क्या अब CA की नौकरी पर भी आएगी आफत? appeared first on Naya Vichar.

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