7 अगस्त को मक्का में पाकिस्तान, सऊदी अरब और तुर्की के बीच हुआ रक्षा समझौता केवल तीन देशों की सैन्य साझेदारी नहीं है. इसे पश्चिम एशिया में बदलते शक्ति-संतुलन के संकेत के रूप में भी देखा जा रहा है.
रक्षा विशेषज्ञ आयशा सिद्दीका ने इस समझौते को अमेरिकी सैन्य मौजूदगी घटने के बाद बन रहे नए क्षेत्रीय सुरक्षा ढांचे से जोड़ा है.
अगर इस घटनाक्रम को पाकिस्तान के नजरिए से देखें, तो इसके पांच बड़े रणनीतिक मायने निकलते हैं.
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1. अमेरिका के बाद खाली होती जगह में पाकिस्तान की वापसी
पाकिस्तान लंबे समय से पश्चिम एशिया की सुरक्षा नेतृत्व में भूमिका तलाशता रहा है. लेकिन अमेरिकी प्रभुत्व वाले सुरक्षा ढांचे में उसकी भूमिका सीमित होती गई थी. अब यदि अमेरिका वास्तव में मध्य पूर्व में अपना सैन्य ‘फुटप्रिंट’ घटाता है, तो क्षेत्रीय शक्तियों के लिए अपनी सुरक्षा व्यवस्था खुद बनाने की जरूरत बढ़ेगी.
यहीं पाकिस्तान के लिए अवसर पैदा होता है.
आयशा सिद्दीका के मुताबिक, यह परिस्थिति पाकिस्तान को उस पुराने दौर की याद दिलाती है जब अमेरिका और ब्रिटेन की भूमिका के बीच पाकिस्तान ने मध्य पूर्व की सुरक्षा व्यवस्था में सैन्य भूमिका तलाशनी शुरू की थी. पाकिस्तान CENTO और उससे पहले METO जैसे सुरक्षा ढांचों का हिस्सा रह चुका है.
पाकिस्तान के लिए संदेश; अमेरिकी छतरी के नीचे सहयोगी बने रहने के बजाय अब वह क्षेत्रीय सुरक्षा का एक स्वतंत्र स्तंभ बनने की कोशिश कर सकता है.
2. न्यूक्लियर पाकिस्तान की ‘रणनीतिक उपयोगिता’ बढ़ सकती है
इस समझौते का सबसे महत्वपूर्ण पहलू पाकिस्तान की परमाणु क्षमता है.
सऊदी अरब लंबे समय से ईरान की परमाणु क्षमता को लेकर चिंतित रहा है. दूसरी ओर पाकिस्तान दुनिया की उन गिनी-चुनी मुस्लिम सैन्य शक्तियों में है, जिसके पास परमाणु हथियार हैं. तुर्की के पास परमाणु हथियार नहीं हैं, लेकिन उसके पास विकसित सैन्य-तकनीकी क्षमता और रक्षा उत्पादन का आधार है.
ऐसे में पाकिस्तान की भूमिका केवल सैनिकों या हथियारों तक सीमित नहीं रह सकती. वह सऊदी अरब के लिए strategic deterrence architecture का हिस्सा बन सकता है.
सिद्दीका के विश्लेषण में पाकिस्तान की परमाणु क्षमता और तुर्की की तकनीकी क्षमता को सऊदी वित्तीय ताकत के साथ जोड़कर देखने की बात सामने आती है.
यानी पाकिस्तान की सबसे बड़ी ताकत, उसकी परमाणु क्षमता, मध्य पूर्व की नई सुरक्षा व्यवस्था में उसकी bargaining power बढ़ा सकती है.
3. पाकिस्तान-तुर्की रक्षा साझेदारी का नया विस्तार
इस समझौते से पाकिस्तान और तुर्की के बीच पहले से मौजूद रक्षा संबंधों को भी नया मंच मिल सकता है.
पाकिस्तान के पास पश्चिमी और पूर्वी दोनों तरह के सैन्य प्लेटफॉर्म संचालित करने का अनुभव है. तुर्की के पास रक्षा उत्पादन और तकनीकी विकास की मजबूत क्षमता है. ऐसे में दोनों की क्षमताओं को सऊदी अरब की वित्तीय ताकत के साथ जोड़ने की संभावना रक्षा उद्योग के लिए महत्वपूर्ण हो सकती है.
विशेषज्ञ के मुताबिक, भविष्य में indigenous defence capability विकसित करने, तकनीक और सैन्य ज्ञान साझा करने तथा तीनों देशों के लिए रक्षा उत्पाद तैयार करने की दिशा में सहयोग बढ़ सकता है.
पाकिस्तान के लिए यह सिर्फ सैन्य सहयोग नहीं, बल्कि defence-industrial diplomacy का अवसर भी है.
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4. पाकिस्तान फिर बन सकता है ‘ब्रिज पावर’
इस समझौते का एक दिलचस्प पहलू यह है कि पाकिस्तान के एक साथ कई ध्रुवों से रिश्ते हैं.
वह सऊदी अरब का सुरक्षा साझेदार है, तुर्की के साथ उसके मजबूत रक्षा संबंध हैं और ईरान उसका पड़ोसी है. ऐसे में पाकिस्तान भविष्य में रियाद और तेहरान के बीच संवाद का एक माध्यम बनने की कोशिश कर सकता है.
सिद्दीका के विश्लेषण में कहा गया है कि अमेरिकी मौजूदगी कम होने के बाद क्षेत्रीय संवाद का केंद्र वॉशिंगटन से हटकर रियाद और अन्य क्षेत्रीय राजधानियों की ओर जा सकता है. ऐसी स्थिति में पाकिस्तान के लिए अपनी भौगोलिक और नेतृत्वक स्थिति को कूटनीतिक पूंजी में बदलने का अवसर पैदा होता है.
यही वह भूमिका है जिसे पाकिस्तान लंबे समय से तलाशता रहा है- South Asia और West Asia के बीच strategic bridge.
5. हिंदुस्तान के लिए सीधा सैन्य खतरा नहीं, लेकिन नया geopolitical equation
इस समझौते को हिंदुस्तान-पाकिस्तान के संदर्भ में सीधे ‘सऊदी अरब हिंदुस्तान के खिलाफ खड़ा हो गया’ कहना अतिशयोक्ति होगी.
सिद्दीका भी इस बात पर जोर देती हैं कि सऊदी अरब और हिंदुस्तान के आर्थिक तथा कूटनीतिक संबंध काफी गहरे हैं. हिंदुस्तान और सऊदी अरब के बीच व्यापार और निवेश के हित इस समीकरण को जटिल बनाते हैं. इसलिए पाकिस्तान और हिंदुस्तान के बीच किसी संघर्ष की स्थिति में सऊदी अरब का स्वतः पाकिस्तान के पक्ष में सैन्य हस्तक्षेप करना तय नहीं माना जा सकता.
लेकिन पाकिस्तान के नजरिए से महत्वपूर्ण बात यह है कि उसकी strategic relevance बढ़ रही है.
यदि अमेरिका की भूमिका घटती है और पश्चिम एशिया में क्षेत्रीय सुरक्षा ढांचा मजबूत होता है, तो पाकिस्तान अपनी सैन्य क्षमता, परमाणु deterrence और तुर्की के साथ रक्षा सहयोग के आधार पर खुद को एक महत्वपूर्ण regional security provider के रूप में पेश कर सकता है.
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