उत्तर प्रदेश की 10 राज्यसभा सीटों के लिए हो रहे चुनाव में समाजवादी पार्टी (सपा) ने दो उम्मीदवार उतारे हैं. प्रोफेसर रामगोपाल यादव को एक और कार्यकाल के लिए मौका देने के साथ ही सपा ने एक नए चेहरे पर भी दांव लगाया है. यह नया चेहरा हैं धनराज परिमल नाथवानी. युवा उद्योगपति धनराज परिमल नाथवानी का नाम इसलिए भी चौंकाने वाला है, क्योंकि वे रामगोपाल की तरह सपा के पारंपरिक नेतृत्वक चेहरे नहीं हैं.
धनराज लंबे समय से कॉरपोरेट जगत से जुड़े हैं. सपा प्रमुख अखिलेश यादव का धनराज को चुनाव मैदान में उतारने का फैसला एक और वजह से चौंकाता है. धनराज के पिता हिंदुस्तानीय जनता पार्टी (बीजेपी) की अगुवाई वाले राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) के समर्थन से राज्यसभा सांसद हैं. ऐसे में सवाल उठता है कि अखिलेश यादव ने ऐसे समय में धनराज नाथवानी पर दांव क्यों लगाया, जब यूपी चुनाव करीब हैं. साथ ही जानेंगे कि गुजरात के औद्योगिक घराने से आने वाले नाथवानी का झारखंड कनेक्शन क्या है.
कौन हैं धनराज नाथवानी?
धनराज परिमल नाथवानी सिर्फ एक नेतृत्वक परिवार से नहीं आते. वे कॉरपोरेट और स्पोर्ट्स प्रशासन में भी सक्रिय रहे हैं. मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक, वह रिलायंस इंडस्ट्रीज में ग्रुप प्रेसिडेंट हैं और रिलायंस न्यू एनर्जी लिमिटेड समेत समूह की कुछ कंपनियों में डायरेक्टर (निदेशक) की भूमिका निभा चुके हैं.
धनराज नाथवानी का करियर कॉरपोरेट सेक्टर के साथ-साथ स्पोर्ट्स प्रशासन से भी जुड़ा रहा है. वह गुजरात क्रिकेट एसोसिएशन से जुड़े हैं और संगठन के AGM सदस्यों में उनका नाम दर्ज है. GCA की आधिकारिक वेबसाइट के मुताबिक यह संस्था गुजरात में क्रिकेट के विकास और संचालन की जिम्मेदारी संभालती है और BCCI की स्थायी सदस्य है.
झारखंड से क्या है धनराज का कनेक्शन?
धनराज नाथवानी का सीधा नेतृत्वक प्रतिनिधित्व झारखंड से नहीं रहा है. उनका झारखंड कनेक्शन मुख्य रूप से उनके पिता परिमल नाथवानी के जरिए बनता है. उनके पिता परिमल नाथवानी इसी साल (18 जून 2026) झारखंड से निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर राज्यसभा पहुंचे. राज्यसभा चुनाव में परिमल को एनडीए का समर्थन मिला था. राज्यसभा से जुड़े दस्तावेजों में भी नाथवानी ने झारखंड से अपने जुड़ाव और राज्य के विकास से जुड़े मुद्दों का उल्लेख किया है.
अखिलेश ने धनराज नाथवानी को ही क्यों चुना?
यूपी विधानसभा चुनाव की दहलीज पर खड़ा है. नेतृत्वक दलों की रणनीति ऐसे संभावित चेहरों को राज्यसभा भेजकर एडजस्ट करने की होती है, जिनके असंतुष्ट होने की आशंका ज्यादा रहती है. ऐसे नेताओं को साधने के लिए, संतुष्ट करने के लिए पार्टियां राज्यसभा और विधानपरिषद सीटों का इस्तेमाल करती हैं. लेकिन अखिलेश यादव ने अलग ही राह ले ली. अखिलेश ने सपा के टिकट पर नाथवानी को उतारा, जो सपा की सियासत में एक्टिव भी नहीं थे. सपा प्रमुख के इस दांव के पीछे क्या रणनीति है? इसे चार पॉइंट में समझा जा सकता है.1
1- क्रॉस वोटिंग से बचने की रणनीति
सपा को पिछले राज्यसभा चुनाव में क्रॉस वोटिंग के कारण एक सीट पर हार का सामना करना पड़ा था. पार्टी ने इसके पीछे खरीद-फरोख्त का आरोप लगाते हुए बीजेपी को कठघरे में खड़ा किया था. नाथवानी औद्योगिक जगत से आते हैं. अखिलेश यादव ने इस बार नाथवानी पर दांव लगाया है, तो सपा की एक रणनीति खरीद-फरोख्त की कोशिशों को विफल करने की भी हो सकती है.
2- नाथवानी को उतार बीजेपी को फंसाया
अखिलेश यादव ने नाथवानी को उतारकर बीजेपी को फंसा दिया है. नाथवानी के पिता खुद बीजेपी के समर्थन से ही राज्यसभा में हैं. ऐसे में बीजेपी के लिए उनके खिलाफ आक्रामक प्रचार, सपा को घेर विधानसभा चुनाव के लिए माहौल बना पाना आसान नहीं होगा.
3- युवा चेहरा
दिल्ली के जंतर-मंतर पर जेनजी प्रोटेस्ट के बाद हर दल का फोकस युवाओं पर हैं. संसद और विधानसभा में युवाओं का प्रतिनिधित्व बढ़ाने की मांग भी जोर पकड़ रही है. ऐसे में 1986 में जन्में नाथवानी युवाओं को जोड़ने की रणनीति में भी सपा के लिए कारगर साबित हो सकते हैं.
4- फाइनेंशियल सपोर्ट सिस्टम और गुजरात कनेक्शन
औद्योगिक घराने से आने वाले नाथवानी चुनावी मौसम में सपा के फाइनेंशियल सपोर्ट सिस्टम के लिए भी महत्वपूर्ण साबित हो सकते हैं. बीजेपी के चुनाव कैंपेन का राज्य दर राज्य गुजरात मॉडल आधार रहा है. नाथवानी कार्ड के जरिये अखिलेश की रणनीति इसे काउंटर करने की भी हो सकती है.
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