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क्या वंदे मातरम् को बनाया जा सकता था राष्ट्रगान? जन गण मन पर अंतिम फैसला आखिर कैसे हुआ?

Vande Mataram vs National Anthem : आजादी के समय हिंदुस्तान के सामने सिर्फ देश चलाने की चुनौती नहीं थी, बल्कि अपनी राष्ट्रीय पहचान तय करने का सवाल भी था. वंदे मातरम् अंग्रेजों के खिलाफ आंदोलन की आवाज बन चुका था, जबकि जन गण मन नए हिंदुस्तान के राष्ट्रगान के लिए सामने था. दोनों के पीछे इतिहास, भावनाएं और अपनी अलग ताकत थी. फिर ऐसा क्या हुआ कि एक राष्ट्रगान बना और दूसरे को राष्ट्रगीत का दर्जा मिला?

वंदे मातरम् कैसे बना आजादी की लड़ाई की आवाज

वंदे मातरम् की रचना बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय ने की थी. जिसका पहली बार प्रकाशन 1875 में हुआ. बाद में इसे उनके उपन्यास आनंदमठ में 1896 में शामिल किया गया. इसी साल हिंदुस्तानीय राष्ट्रीय कांग्रेस के कलकत्ता अधिवेशन में इसे पहली बार गाया गया और धीरे-धीरे यह स्वतंत्रता आंदोलन का हिस्सा बन गया.

1905 में लॉर्ड कर्जन ने बंगाल का विभाजन किया तो इसके खिलाफ देशभर में विरोध शुरू हुआ. स्वदेशी आंदोलन के दौरान वंदे मातरम् अंग्रेजी शासन के खिलाफ आंदोलन का प्रमुख नारा और गीत बनकर उभरा. सभाओं और जुलूसों में इसकी गूंज सुनाई देने लगी और यह नेतृत्वक चेतना का प्रतीक बन गया.

महात्मा गांधी भी वंदे मातरम् के राष्ट्रीय और ऐतिहासिक महत्व को समझते थे. हालांकि, समय के साथ इसके कुछ हिस्सों को लेकर आपत्तियां सामने आईं. खासकर बाद के अंतरों में धार्मिक प्रतीकों और देवी की कल्पना के इस्तेमाल को लेकर मुस्लिम नेताओं के एक हिस्से ने सवाल उठाए.

1937 में क्यों शुरू हुआ विवाद

1937 तक वंदे मातरम् राष्ट्रीय आंदोलन का बेहद लोकप्रिय गीत बन चुका था. लेकिन कांग्रेस के सामने यह सवाल आया कि क्या पूरे गीत को हर राष्ट्रीय अवसर पर इस्तेमाल किया जाना चाहिए.

जवाहरलाल नेहरू ने भी इस मुद्दे पर संतुलित रुख अपनाया. उनका मानना था कि वंदे मातरम् राष्ट्रीय आंदोलन और राष्ट्रीय जीवन का इतना महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुका है कि उसे पूरी तरह हटाया नहीं जा सकता. साथ ही, गीत के बाद के हिस्सों में मौजूद धार्मिक कल्पना को लेकर उनकी चिंता थी, जिसे हिंदुस्तान के सभी समुदाय समान रूप से स्वीकार नहीं कर सकते थे.

इसलिए रास्ता निकाला गया कि राष्ट्रीय कार्यक्रमों में वंदे मातरम् के शुरुआती हिस्से को प्राथमिकता दी जाए. यानी उद्देश्य वंदे मातरम् को खत्म करना नहीं, बल्कि उसे ऐसा राष्ट्रीय प्रतीक बनाए रखना था जिसे अलग-अलग समुदाय सहजता से स्वीकार कर सकें.

जन गण मन की कहानी

रवींद्रनाथ टैगोर की रचना जन गण मन पहली बार 27 दिसंबर 1911 को हिंदुस्तानीय राष्ट्रीय कांग्रेस के कलकत्ता अधिवेशन में गाई गई. स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान इसका भी महत्वपूर्ण स्थान बना.

वंदे मातरम् जहां स्वतंत्रता संघर्ष और ब्रिटिश शासन के खिलाफ प्रतिरोध की भावना से जुड़ा था, वहीं जन गण मन में हिंदुस्तान की व्यापक राष्ट्रीय पहचान और एकता की भावना दिखाई देती थी. आजादी के बाद यह अंतर और महत्वपूर्ण हो गया.

अब सवाल सिर्फ यह नहीं था कि कौन सा गीत लोगों को ज्यादा भावुक करता है. राष्ट्रगान ऐसा होना था जिसे प्रशासनी समारोहों, सैन्य बैंड और विदेशों में हिंदुस्तानीय प्रतिनिधित्व के दौरान भी आसानी से प्रस्तुत किया जा सके. इसी कसौटी पर जन गण मन को ज्यादा उपयुक्त माना गया.

क्या नेहरू वंदे मातरम् के खिलाफ थे?

नेहरू वंदे मातरम् के ऐतिहासिक महत्व को अच्छी तरह समझते थे. वे जानते थे कि स्वतंत्रता आंदोलन में इसकी भूमिका को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता. लेकिन राष्ट्रगान के लिए उनकी प्राथमिकता अलग थी.

उनका मानना था कि राष्ट्रगान की धुन ऐसी होनी चाहिए जिसे ऑर्केस्ट्रा और मिलिट्री बैंड आसानी से प्रस्तुत कर सकें. इसे प्रशासनी समारोहों के साथ-साथ विदेशों में भी प्रभावी ढंग से प्रस्तुत किया जाना था. इस कसौटी पर उन्हें जन गण मन ज्यादा उपयुक्त लगा.

इसलिए वंदे मातरम् को राष्ट्रगान न चुने जाने की पूरी कहानी सिर्फ धार्मिक विवाद तक सीमित नहीं थी. धार्मिक स्वीकार्यता के साथ-साथ धुन, आधिकारिक प्रस्तुति और सैन्य बैंड के लिए उपयुक्तता जैसे मुद्दे भी महत्वपूर्ण थे.

आजादी की रात भी दोनों गीत साथ थे

15 अगस्त 1947 की आधी रात हिंदुस्तान आजाद होने वाला था. दिलचस्प बात यह है कि आजादी के समारोह को लेकर जवाहरलाल नेहरू के सुझावों में वंदे मातरम् और जन गण मन दोनों मौजूद थे.

नेहरू ने राजेंद्र प्रसाद को लिखे एक पत्र में आजादी की रात संविधान सभा की बैठक में वंदे मातरम् के पहले अंतरे को शामिल करने का सुझाव दिया था. इसके साथ जन गण मन और सारे जहां से अच्छा को भी कार्यक्रम में जगह देने की बात थी.

यानी आजाद हिंदुस्तान की पहली रात ही इन दोनों गीतों को राष्ट्रीय स्मृति में साथ रखा गया. लेकिन अब सवाल था कि औपचारिक राष्ट्रगान कौन होगा.

24 जनवरी 1950 को आया ऐतिहासिक फैसला

1948 में राष्ट्रगान को लेकर विचार करते समय वंदे मातरम् के ऐतिहासिक महत्व को स्वीकार किया गया, लेकिन जन गण मन को आधिकारिक प्रस्तुतियों के लिए अधिक उपयुक्त माना गया. 1949 में भी संविधान सभा में राष्ट्रगान को लेकर चर्चा हुई और कुछ सदस्य वंदे मातरम् को राष्ट्रगान बनाने के पक्ष में थे.

आखिरकार 24 जनवरी 1950 को, हिंदुस्तान के गणराज्य बनने से ठीक दो दिन पहले, संविधान सभा की बैठक हुई. डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने घोषणा की कि जन गण मन हिंदुस्तान का राष्ट्रगान होगा.

इसके साथ ही उन्होंने वंदे मातरम् को लेकर भी महत्वपूर्ण घोषणा की. उन्होंने कहा कि स्वतंत्रता संग्राम में इसकी महत्वपूर्ण भूमिका रही है और इसे जन गण मन के समान सम्मान और समान दर्जा दिया जाएगा.

इस तरह हिंदुस्तान ने अपने इतिहास के महत्वपूर्ण गीत को किनारे नहीं किया. जन गण मन राष्ट्रगान बना और वंदे मातरम् को राष्ट्रगीत के रूप में सम्मानित स्थान मिला.

24 जनवरी 1950 को दोनों गीत गाए गए

24 जनवरी 1950 की संविधान सभा की कार्यवाही का खास पहलू यह था कि सदस्यों ने खड़े होकर जन गण मन गाया. इसके बाद वंदे मातरम् भी गाया गया.

यानी जिस गीत ने आजादी के आंदोलन में लोगों की आवाज को ताकत दी थी और जिस गीत को नए हिंदुस्तान के राष्ट्रगान के रूप में चुना गया था, दोनों को एक ही दिन संविधान सभा में सम्मान मिला.

क्या वंदे मातरम् राष्ट्रगान बन सकता था?

वंदे मातरम् को लेकर गंभीर चर्चा हुई थी और उसके पक्ष में मजबूत समर्थन भी मौजूद था. लेकिन अंतिम फैसला सिर्फ इस आधार पर नहीं हुआ कि कौन सा गीत स्वतंत्रता आंदोलन में ज्यादा लोकप्रिय रहा.

धार्मिक कल्पनाओं को लेकर आपत्तियां, व्यापक राष्ट्रीय स्वीकार्यता, धुन, आधिकारिक समारोहों में प्रस्तुति और सैन्य बैंड के लिए उपयुक्तता जैसे कई पहलू सामने थे. इसलिए यह कहना कि वंदे मातरम् राष्ट्रगान बनने की दौड़ में हार गया, पूरी तस्वीर नहीं बताता.

वंदे मातरम् उस संघर्ष की याद बनकर रहा जिसने देश को आजादी तक पहुंचाया, जबकि जन गण मन आजाद हिंदुस्तान की औपचारिक राष्ट्रीय आवाज बना. एक ने गुलामी के खिलाफ लड़ रहे हिंदुस्तान को आवाज दी, दूसरे ने आजाद हिंदुस्तान की पहचान को.

24 जनवरी 1950 को संविधान सभा ने इसी इतिहास को एक साथ रखने का रास्ता चुना. जन गण मन को राष्ट्रगान बनाया गया और वंदे मातरम् को राष्ट्रगीत के रूप में समान सम्मान और दर्जा दिया गया.

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वंदे मातरम् के अपमान पर सजा का प्रावधान

2026 के संसद मानसून सत्र में राष्ट्रीय गौरव अपमान निवारण (संशोधन) अधिनियम पारित किया गया. इसके बाद अब वंदे मातरम् का दर्जा जन गण मन की तरह ही हो गया है. अगर कोई व्यक्ति वंदे मातरम् गाए जा रहे किसी सभा में बाधा डालता है या इसका अपमान करता है, तो उसे 3 साल तक की जेल हो सकती है. वहीं इसे बार-बार दोहराए जाने पर कम से कम 1 साल की सख्त जेल की सजा का प्रावधान है.

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विनोद झा
संपादक नया विचार

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