“‘स्टेज पर उस वक्त कोई बड़ा कलाकार नहीं था. कुछ लोग काम कर रहे थे. शाम को नाटक होना था. स्टेज की तैयारी चल रही थी. तभी नाना ने झाड़ू उठा ली. झाड़ू को उन्होंने ऐसे पकड़ा जैसे तलवार हो. कमर के पास खींचकर, पूरे तेवर के साथ उसे हवा में लहराया और जोर से बोले-“क्या समझ रखे हो तुम लोग अपने आप को? मेरे जैसे भद्दी शक्ल वाले भी एक दिन हीरो बनकर आएंगे. मैं बताऊंगा.” सदाशिव भाई भी वहीं थे. उन्होंने तालियां बजाईं और कहा-शाबाश! शाबाश! जियो!”
नाना पाटेकर को समझना हो, तो शायद उनकी फिल्मों से पहले उनके नाटकों तक जाना पड़ेगा. उस नाना तक, जो बड़े पर्दे का सितारा बनने से बहुत पहले स्टेज की धूल में अपना संसार तलाश रहा था. उस नाना तक, जिसे मैंने पहली बार पृथ्वी थिएटर में देखा था.
मैं(तापस चक्रवर्ती) एक रंगकर्मी झारखंड से हूं. थिएटर मेरे लिए शौक नहीं, एक तरह की बेचैनी थी. रंगमंच की दुनिया में बड़े कलाकारों को देखने, उनसे मिलने और उनके आसपास कुछ वक्त बिताने की एक अलग ही लालसा होती थी. इसी लालसा ने मुझे झारखंड से मुंबई खींच लिया था.
उस समय पृथ्वी थिएटर आज जैसा चमकता हुआ ठिकाना नहीं था. वहां पहुंचकर लगता था कि थिएटर किसी इमारत का नाम नहीं, बल्कि उन लोगों का नाम है जो उसके लिए अपना सब कुछ छोड़ सकते हैं. मैं विनोद कुमार और रंगायन की टीम के साथ आया था. पृथ्वी पर अपना नाटक किया था. शायद 1981-82 की बात होगी.
नाटक के बाद मैं वापस चला गया, लेकिन पृथ्वी मेरे भीतर रह गया.
1982 में मैंने यहां नौकरी शुरू कर दी थी. मगर मन बार-बार मुंबई की उसी जगह पर लौटता था. छुट्टी मिलती, कोई बहाना मिलता और मैं पृथ्वी पहुंच जाता. वहां कोई मेरा इंतजार नहीं कर रहा था. न कोई बड़ा काम था, न कोई पहचान. बस नाटक देखने का जुनून था और उन लोगों के करीब बैठने की इच्छा, जिनसे मैं सीखना चाहता था.
हंगल साहब जैसे लोग वहां थे. उनके अनुभव सुन लेना भी मेरे लिए किसी पुरस्कार से कम नहीं था. शफी इनामदार जैसे कलाकार थे. सदाशिव अमरापुरकर जैसे लोग थे. और उसी दुनिया में एक नाम धीरे-धीरे अपनी जगह बना रहा था- नाना पाटेकर.
नाना उस वक्त आज वाले नाना नहीं थे. वह स्टार नहीं थे. मगर उनमें एक चीज तब भी पूरी ताकत से मौजूद थी- थिएटर का जुनून.
मेरी उनसे पहली मुलाकात भी किसी फिल्मी दृश्य जैसी नहीं थी. कोई औपचारिक परिचय नहीं. कोई हाथ मिलाना नहीं. मैं वहां खाना खा रहा था. टेबल-कुर्सी का इंतजाम नहीं था. खड़े-खड़े खाना होता था. बाहर एक छोटी सी खाने की जगह थी. आठ रुपये में पूरा खाना मिल जाता था. पास ही हरे रामा हरे कृष्णा मंदिर था. हम पैदल चले जाते थे.
वहीं किसी चाईबासा के लड़के के जरिए मेरी नाना से मुलाकात कराई गई.
नाना ने खाते-खाते पहला सवाल पूछा- “क्या करता है?”
मैंने कहा- “नौकरी.”
उन्होंने तुरंत पूछा- “फिर काहे को आया मरने?”
मैंने कहा- “आपको देखने.”
बस. इतना सुनते ही उन्होंने मुझे अपने अंदाज में जवाब दिया- “इतना मारूंगा ना, बिहार जाकर रुकेगा.”
उनकी बात में एक अजीब सा अपनापन था. वह आपको पहली मुलाकात में ही सहज कर देते थे. उनकी भाषा में कोई बनावट नहीं थी.
मैंने उनसे कहा कि मैं इतनी दूर सिर्फ इसलिए आता हूं क्योंकि मुझे थिएटर का नशा है.
उन्होंने कहा था- “मैं महान-वहान कुछ नहीं हूं.”
यही नाना थे.
बाद में मैंने उनसे कहा कि मैं भी स्टेज के लिए ऐसा ही पागल हूं. सैकड़ों किलोमीटर से सिर्फ नाटक देखने और आप जैसे कलाकारों से मिलने चला आता हूं. उन्होंने शायद ज्यादा कुछ नहीं कहा, लेकिन वह मुलाकात मेरे भीतर रह गई.
आज पीछे मुड़कर देखता हूं तो लगता है कि उस दौर में पृथ्वी थिएटर एक तरह की यूनिवर्सिटी था. वहां कोई डिग्री नहीं मिलती थी, लेकिन जिंदगी भर के सबक मिल जाते थे.
मैं कहता हूं- स्कूल नहीं, वह यूनिवर्सिटी थे.
और नाना?
नाना उस यूनिवर्सिटी के उन विद्यार्थियों में थे, जो पढ़ने के साथ-साथ पूरी इमारत की नींव भी मजबूत कर रहे थे.
मैं खुद किसी नाटक का कलाकार नहीं होता था, फिर भी स्टेज पर मौजूद रहता था. रस्सी पकड़नी हो, लाइट लगानी हो, कोई ऊपर चढ़ा हो तो नीचे से सहारा देना हो, सामान हटाना हो, पर्दा खींचना हो- जो काम मिला, कर लिया. पृथ्वी में काम करने वाले हर आदमी से धीरे-धीरे पहचान होने लगी.
उस वक्त पृथ्वी का टिकट भी आज की तरह महंगा नहीं था. तीस रुपये.
हां, तीस रुपये.
मेरे लिए वह तीस रुपये सिर्फ टिकट के पैसे नहीं थे. वह उस दुनिया में दाखिल होने की कीमत थे, जहां मैं अपने से बड़े कलाकारों को काम करते देख सकता था. जहां शाम को नाटक होना है, उससे पहले घंटों तैयारी चलती थी. कोई स्टार नहीं, कोई छोटा-बड़ा नहीं. जो काम सामने आया, वह कर दिया.
और नाना भी उसी दुनिया के आदमी थे.
रुकिएगा, यहां एक बात फिर से कहनी जरूरी है.
सज्जाद को कौन भूल सकता है?
नाना के शुरुआती थिएटर किरदारों में से एक सज्जाद था. आज जब नाना का नाम लेते ही फिल्मों के बड़े-बड़े किरदार आंखों के सामने घूम जाते हैं, तब कभी-कभी यह याद करना जरूरी है कि यह आदमी पहले स्टेज पर अपने किरदार के साथ जीता था.
नाना को मैंने सिर्फ गुस्से में नहीं देखा. उनके भीतर गुस्सा था, लेकिन वह गुस्सा सिर्फ उनका स्वभाव नहीं था. उन्हें लगता था कि समाज में कुछ गलत हो रहा है तो उसे गलत कहना चाहिए. देश की मिट्टी में कोई गलत जगह गड्ढा खोद दे, तो वह तिलमिला उठते थे. आसपास कुछ गलत होता, तो भीतर से बेचैन हो जाते.
शायद इसलिए दुनिया ने उन्हें गुस्सैल नाना के रूप में ज्यादा याद किया.
लेकिन सच यह भी है कि उनके जैसा मजाकिया आदमी मिलना मुश्किल था.
वह एकदम गंभीर चेहरा बनाकर एक शब्द बोलते और सामने वाला हंसते-हंसते लोटपोट हो जाता.
मुझे उनकी एक तस्वीर आज भी याद है.
स्टेज पर उस वक्त कोई बड़ा कलाकार नहीं था. कुछ लोग काम कर रहे थे. शाम को नाटक होना था. स्टेज की तैयारी चल रही थी.
तभी नाना ने झाड़ू उठा ली.
झाड़ू को उन्होंने ऐसे पकड़ा जैसे तलवार हो. कमर के पास खींचकर, पूरे तेवर के साथ उसे हवा में लहराया और जोर से बोले-
“क्या समझ रखे हो तुम लोग अपने आप को? मेरे जैसे भद्दी शक्ल वाले भी एक दिन हीरो बनकर आएंगे. मैं बताऊंगा.”
बस एक बार सुना था मैंने.
लेकिन वह आवाज आज तक कान में है.
सदाशिव भाई भी वहीं थे. उन्होंने तालियां बजाईं और कहा- “शाबाश! शाबाश! जियो!”
उस वक्त शायद किसी ने नहीं सोचा होगा कि जिस आदमी के हाथ में झाड़ू है, जो स्टेज के बीच खड़े होकर खुद को “भद्दी शक्ल वाला” कहकर मजाक कर रहा है, वही आदमी आने वाले वक्त में हिंदी सिनेमा के सबसे अलग चेहरों में गिना जाएगा.
नाना ने उस दिन मजाक में जो कहा था, उसमें शायद अपने ऊपर भरोसा भी छिपा था.
हीरो बनने का सपना था.
लेकिन वह सपना सिर्फ चेहरे का नहीं था. वह उस आदमी का सपना था जिसने थिएटर को अपना नशा कहा था.
मैंने उन्हें फिल्मों के बड़े सेट पर नहीं, थिएटर की धूल में देखा था. इसलिए मेरे लिए नाना का सबसे बड़ा परिचय उनका कोई फिल्मी किरदार नहीं है.
मेरे लिए नाना वह आदमी हैं जो तीस रुपये का टिकट लेकर आने वाले दर्शक और स्टेज पर खड़े कलाकार के बीच की दूरी मिटा देता था.
वह नाना हैं जो बड़े होने के बाद भी स्टेज के आदमी रहे.
और शायद इसी वजह से जब आज उन्हें याद करता हूं तो फिल्मों के पोस्टर नहीं दिखते.
पृथ्वी थिएटर दिखता है.
आठ रुपये का खाना दिखता है.
हाथ में झाड़ू लिए वह आदमी दिखता है.
और एक आवाज सुनाई देती है-
“मैं… स्टेज का एडिक्ट हूं.”
शायद यही नाना थे.
स्कूल नहीं, यूनिवर्सिटी.
और हम जैसे लोगों के लिए, उस यूनिवर्सिटी की सबसे यादगार कक्षा.
आपका शिष्य – एक रंगकर्मी
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