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जब बेरमो में मजदूर सभा के लिए टमटम और भोपू मंगाया जाता था, जानें शफीक खान की कहानी

बेरमो: कोयलांचल की श्रमिक नेतृत्व में स्व शफीक खान का नाम सादगी, ईमानदारी और मजदूरों के अधिकारों के संघर्ष के लिए याद किया जाता है. 1950 के दशक में गया में रिक्शा मजदूरों के बीच काम करने से शुरू हुआ उनका सफर बेरमो के कोयला मजदूरों की नेतृत्व तक पहुंचा. उन्होंने ट्रेड यूनियन आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभायी और मजदूरों के हितों को लेकर लगातार आवाज उठायी.

एक साधारण कृषक परिवार में जन्मे शफीक खान के पिता कैफू खान अंग्रेजी हुकूमत में सिपाही थे. बताया जाता है कि पिता ने ही उन्हें मजदूरों के हितों के लिए संघर्ष करने की राह दिखाई. वर्ष 1950 में गया कॉलेज में दाखिला लेने के बाद उनकी मित्रता मसूद मल्लिक, रविशंकर और ब्रह्मानंद जैसे प्रगतिशील विचारों वाले छात्र नेताओं से हुई. इसके बाद वह छात्र संगठन एआइएसएफ से जुड़े और वर्ष 1951 में हिंदुस्तानीय कम्युनिस्ट पार्टी (भाकपा) के सदस्य बने.

शफीक खान की इच्छा वकील बनने की थी, लेकिन जल्द ही गया में उनकी पहचान रिक्शा मजदूरों के नेता के रूप में बनने लगी. वर्ष 1953 में उन्हें कोयला मजदूरों के बीच काम करने के लिए गिरिडीह भेजा गया. यहां उनकी मुलाकात पूर्व केंद्रीय मंत्री चतुरानन मिश्र से हुई. वर्ष 1954 में वह गिरिडीह से बेरमो आ गये. कोल वर्कर्स यूनियन के संस्थापक सदस्यों में शामिल अलीजान मियां उन्हें बेरमो लेकर आये थे.

मजदूर धौड़े में रहकर मजदूरों के बीच किया काम

बेरमो आने के बाद शफीक खान ने चार नंबर इलाके में स्वतंत्र रूप से कोयला मजदूरों के बीच काम शुरू किया. उस समय दर्शन गोप, तिलक तेली, प्रेम सरदार, अंजोरी सरदार और शंकर समेत कई मजदूर उन्हें अपने धौड़े में रहने के लिए जगह देते थे. मजदूरों के बीच उनकी पकड़ धीरे-धीरे मजबूत होने लगी.

जब शफीक खान मजदूर सभा को संबोधित करते थे, तो संडेबाजार के बदरु मियां का टमटम और गिरिडीह से भोपू मंगाया जाता था. इन सभाओं के जरिये वह मजदूरों की समस्याओं और उनके अधिकारों को लेकर अपनी बात रखते थे.

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वर्ष 1956 में बेरमो सीम में एक आमसभा के दौरान लठैतों ने उन पर हमला कर दिया था. उस समय मजदूरों ने एकजुट होकर उन्हें सुरक्षित बाहर निकाला. इसी तरह, 1960 के दशक में कथारा में एटक और भाकपा की एक सभा के दौरान भी टकराव की घटना हुई थी. सभा में मुख्य वक्ता केंद्रीय मंत्री चतुरानन मिश्र थे. बताया जाता है कि सभा के दौरान कांग्रेसियों के हमले के बीच शफीक खान पार्टी का झंडा लगा डंडा लेकर हमलावरों का मुकाबला करने लगे.

उस दौर में चार नंबर इलाके में इंटक और सोशलिस्ट संगठनों का भी प्रभाव था. ऐसे माहौल में शफीक खान ने एटक और भाकपा की नेतृत्व के माध्यम से मजदूरों के बीच अपनी पहचान बनायी.

धनबाद जेल में एके राय से हुई थी मुलाकात

शफीक खान की पहली जेल यात्रा 1960 के दशक में धनबाद के सुदामडीह कोलियरी में मजदूर आंदोलन का नेतृत्व करने के दौरान हुई. जेल में ही उनकी मुलाकात मासस नेता एके राय से हुई. इसके बाद दोनों के बीच मित्रता हुई.

वर्ष 1971 में धनबाद में कोल वर्कर्स यूनियन के सम्मेलन के दौरान एटक ने नीतिगत निर्णय के तहत कोल वर्कर्स यूनियन का नाम बदलकर यूनाइटेड कोल वर्कर्स यूनियन कर दिया. बेरमो में रहते हुए शफीक खान की बिंदेश्वरी सिंह, महेंद्र कुमार हिंदुस्तानी, दंदू तेली, गणेश मरार, हनुमुखी और मजीद मियां समेत कई लोगों से मित्रता रही.

वेतन समझौते में भी दिया मजदूरों के हित में सुझाव

कोयला मजदूरों के वेतन और सेवा शर्तों से जुड़े मामलों में भी शफीक खान सक्रिय रहे. वर्ष 1962 में हिंदुस्तान प्रशासन ने कोयला खनन उद्योग के लिए पहली बार सेंट्रल वेजबोर्ड का गठन किया था. कमेटी विभिन्न स्थानों पर जाकर संबंधित पक्षों से विचार और सुझाव ले रही थी. इस दौरान शफीक खान ने कोयला मजदूरों के हित में अपने सुझाव दिये.

वर्ष 1979 से शुरू हुए वेजबोर्ड-दो से लेकर वेजबोर्ड-सात के शुरुआती आधे दौर तक वह संयुक्त द्विपक्षीय समिति कोल इंडस्ट्री (जेबीसीसीआइ) की बैठकों में शामिल होते रहे. इन बैठकों के माध्यम से कोयला मजदूरों के वेतन और सेवा शर्तों से जुड़े मुद्दों पर उनकी भागीदारी रही.

भाकपा के टिकट पर बेरमो विधानसभा से लड़ते रहे चुनाव

शफीक खान चार नंबर स्थित मजदूर धौड़े में छत्तीसगढ़ी कोयला मजदूरों के बीच रहते थे. श्रमिक नेतृत्व के साथ उनकी सक्रियता चुनावी नेतृत्व में भी रही. वह हिंदुस्तानीय कम्युनिस्ट पार्टी के टिकट पर बेरमो विधानसभा सीट से लगातार चुनाव लड़ते रहे, हालांकि उन्हें चुनावी सफलता नहीं मिली.

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शफीक खान का नेतृत्वक सफर उस दौर की याद दिलाता है, जब ट्रेड यूनियन आंदोलन केवल वेतन और सुविधाओं तक सीमित नहीं था, बल्कि मजदूरों के अधिकार, सामाजिक एकजुटता और कामकाजी परिस्थितियों से जुड़े सवाल भी उसके केंद्र में थे. बेरमो के कोयला मजदूरों के बीच उनका लंबा जुड़ाव उन्हें क्षेत्र की श्रमिक नेतृत्व की एक उल्लेखनीय शख्सियत बनाता है.

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विनोद झा
संपादक नया विचार

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