अंतरराष्ट्रीय व्यापार को लंबे समय तक वस्तुओं और सेवाओं के आदान-प्रदान, बाजार विस्तार और रोजगार सृजन के माध्यम के रूप में देखा जाता रहा है. लेकिन आज व्यापार केवल वित्तीय स्थिति का विषय नहीं है. यह देशों के बीच रणनीतिक प्रभाव स्थापित करने का एक महत्वपूर्ण साधन भी बन गया है.
21 अक्टूबर 2026 को प्रकाशित द इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने हिंदुस्तान-अमेरिका व्यापार समझौते को अंतिम रूप देने के संबंध में कहा कि 99 प्रतिशत काम पूरा हो चुका है.
उन्होंने स्पष्ट किया कि कुछ मुद्दे अब भी बाकी हैं और दोनों पक्षों को समझौते की भाषा तथा शर्तों पर पूरी सहमति बनानी होगी. इसका अर्थ है कि समझौता करीब जरूर है, लेकिन अभी अंतिम रूप से संपन्न नहीं हुआ है.
यह घटनाक्रम एक बड़े सवाल को जन्म देता है- जब दो बड़ी वित्तीय स्थितिएं व्यापार समझौते पर बातचीत करती हैं, तो क्या वे केवल सामान खरीदने और बेचने की शर्तें तय कर रही होती हैं, या अपने रणनीतिक हितों की भी सौदेबाजी कर रही होती हैं?
इसी सवाल को समझने के लिए आयोजित वेबिनार ‘Trade Wars & Power Plays: India, the USA and the Geopolitics of Tariffs’ में विदेश नीति विश्लेषक प्रो. सामंथा और अर्थशास्त्री प्रो. अक्षिता ने विद्यार्थियों को व्यापार, वित्तीय स्थिति और भू-नेतृत्व के आपसी संबंधों से परिचित कराया.
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