Ex Maoists Daughter Become Engineer: बचपन से आपके हाथ में कलम पकड़ाई गई है और आप बड़े होकर लिखना पढ़ना शुरू कर देते हैं, ये सुनने में बहुत नॉर्मल लगता है. लेकिन अगर सोचिए कि आपका बचपन बम, गोली और बंदूकों के बीच बीता हो. क्या फिर भी ऐसा मुमकिन है कि आप कलम की मदद से मिसाल पेश कर सकें. कुछ ऐसा ही किया है महाराष्ट्र की बेटी अरविंदा बरसगड़े ने, जिनके पिता महज चार महीने की उम्र में माओवादी संगठन ‘सिरोंचा दलम’ से जुड़ गए. ऐसे में अरविंदा बरसगड़े का बचपन गढ़चिरौली में गोलियों और धमाकों की गूंज के बीच बीता. लेकिन अरविंदा ने सिविल इंजीनियरिंग में डिप्लोमा पूरा किया और अब हेदरी गांव स्थित ‘लायड्स मेटल्स’ एंड एनर्जी में बतौर ट्रेनी काम कर रही हैं.
पिता बने माओवादी तो बदली पूरे परिवार की जिंदगी
अरविंदा के पिता राजबाबू (उर्फ किरण या समय्या) शुरू से ही माओवादी नहीं थे. वे नारायणपुर गांव के पंचायत में चपरासी के रूप में काम करते थे. हालांकि, कर (Tax) और सामाजिक अपमान बढ़ने के कारण, उन्होंने 2005 में सिरोंचा दलम में शामिल होन का फैसला लिया है. ये फैसला मजबूरी में लिया गया था लेकिन इसने राजबाबू और उसके परिवार की जिंदगी बदल दी. आइए, जानते हैं अरविंदा की सक्सेस स्टोरी.
2010 में पिता ने पुलिस के सामने किया सरेंडर
2010 में राबाबू ने माओवादी संगठन छोड़ने का मन बनाया और पुलिस के सामने आत्मसमर्पण कर दिया. तब से परिवार पुलिस मुख्यालय के पास रहने लगा. ऐसे में अरविंदा ने अपनी पढ़ाई लिखाई जारी रखी और हाई स्कूल पास कर लिया.
इंजीनियरिंग की दुनिया में रखा कदम
अरविंदा ने 12वीं की पढ़ाई के बाद गढ़चिरौली के प्रशासनी पॉलिटेक्निक से 2025 में सिविल इंजीनियरिंग में डिप्लोमा पूरा किया. अरविंदा को पढ़ाई के लिए सुरक्षित माहौल मिले इसके लिए वहां की स्थानीय पुलिस ने भी योगदान दिया. अब वो ‘लायड्स मेटल्स’ एंड एनर्जी में बतौर ट्रेनी काम कर रही हैं. दिलचस्प बात ये है कि अब वो आगे BTech की डिग्री हासिल करना चाहती हैं.
ट्रेनी के रूप में हुई थी करियर की शुरुआत
दिसंबर 2025 में अरविंदा ने हेदरी गांव में ही ‘एलटी गोंडवाना स्किल हब’ में ट्रेनी के रूप में काम शुरू किया था. अरविंदा का सपना है कि वो आत्मनिर्भर बनें और अपने गांव के युवाओं को स्किल ट्रेनिंग दें.
गढ़चिरौली जिले में माओवादी संगठन लगभग खत्म हो चुकी है
गढ़चिरौली महाराष्ट्र के प्रमुख जिलों में से एक है. चंद्रपुर से इस जिले को 1982 में अलग किया गया था. इस जिले को महाराष्ट्र का ग्रीन जोन भी कहा जाता है, क्योंकि यहां का लगभग 70 प्रतिशत हिस्सा वन क्षेत्रों से घिरा हुआ है. पहले इस जिले में माओवादी संगठन का प्रभाव था, जोकि समय के साथ लगभग खत्म हो चुका है. एक आम जानकारी के अनुसार, यहां अब तक कुल 819 माओवादी पुलिस के सामने आत्मसमर्पण कर चुके हैं.
ये भी पढ़ें: पंजाब यूनिवर्सिटी में ABVP की जीत, अंकित बिधान बने अध्यक्ष
The post बम-बारूद के बीच बचपन, कलम ने बदली जिंदगी, पूर्व नक्सली की बेटी ने इंजीनियर बन रचा इतिहास appeared first on Naya Vichar.
