Marhaura Sugar Mill: सारण की मढ़ौरा चीनी मिल करीब तीन दशक से बंद है. कभी इस इलाके की वित्तीय स्थिति और रोजगार का बड़ा आधार रही यह मिल अब एक बार फिर चर्चा में है. फर्क इतना है कि पहले इसे बंद होने से बचाने और दोबारा शुरू कराने की मांग होती थी, अब इसे मढ़ौरा से बाहर ले जाकर नई जगह मिल स्थापित करने की चर्चा ने स्थानीय लोगों को नाराज कर दिया है. रविवार को मिल परिसर में हुई बैठक में लोगों ने साफ कहा कि मिल शुरू करनी है तो मढ़ौरा में ही की जाए.
अभी का हंगामा क्या है
मढ़ौरा की बंद चीनी मिल को लेकर एक बार फिर स्थानीय स्तर पर हलचल तेज हो गयी है. रविवार को बंद मिल परिसर में युवाओं, स्थानीय जनप्रतिनिधियों और सामाजिक लोगों की बैठक हुई. बैठक में तरैया के रामकोला फार्म हाउस में चीनी मिल स्थापित करने की कथित प्रशासनी पहल को लेकर आपत्ति जतायी गयी.
कौन और क्यों कर रहे विरोध
मढ़ौरा में हुई बैठक में स्थानीय युवाओं, सामाजिक कार्यकर्ताओं, जनप्रतिनिधियों और नेतृत्वक नेताओं ने हिस्सा लिया. बैठक का संचालन राजद व्यवसायी प्रकोष्ठ के नेता विष्णु गुप्ता ने किया. कांग्रेस नेता लालबाबू गिरी, नीरज कुमार सिंह, आदित्य कुमार, अतुल प्रताप सिंह, मनोज गुप्ता, युवराज भास्कर, उप मुखिया अजीत कुमार सिंह, बीडीसी मोहन साह समेत कई लोग मौजूद रहे.
विरोध करने वालों की मुख्य दलील यह है कि मढ़ौरा में पहले से मौजूद औद्योगिक परिसर को छोड़कर किसी दूसरे इलाके में नई चीनी मिल लगाना स्थानीय हित में नहीं होगा. उनका कहना है कि मिल दोबारा चलने पर आसपास के किसानों के लिए गन्ना एक बार फिर नकदी फसल बन सकता है और स्थानीय स्तर पर रोजगार के अवसर पैदा हो सकते हैं.
लोगों ने प्रशासन से मांग की है कि मिल के भविष्य को लेकर कोई भी फैसला लेने से पहले मढ़ौरा के लोगों की राय और यहां उपलब्ध जमीन व पुराने ढांचे को ध्यान में रखा जाए.
बैठक में यह भी चेतावनी दी गयी कि यदि जल्द कोई सकारात्मक पहल नहीं हुई, तो स्थानीय लोग चरणबद्ध आंदोलन शुरू करेंगे.
ऐसा पहली बार नहीं है जब मढ़ौरा मिल पर नेतृत्व गरमायी हो
मढ़ौरा चीनी मिल को दोबारा शुरू करने की मांग कई वर्षों से नेतृत्वक मुद्दा रही है. चुनावी दौर में मिल को लेकर वादे और आश्वासन भी सामने आते रहे हैं.
नवंबर 2025 में बिहार प्रशासन ने बंद चीनी मिलों को फिर से शुरू करने और राज्य में चीनी उद्योग के विस्तार की दिशा में कदम उठाने की बात कही थी. उस समय मढ़ौरा समेत बंद मिलों के पुनर्जीवन की उम्मीद फिर जगी थी.
यही वजह है कि अब तरैया में नयी मिल की चर्चा ने स्थानीय स्तर पर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि जब मढ़ौरा की पुरानी मिल को फिर से शुरू करने की उम्मीद बनी थी, तो नयी जगह पर मिल लगाने की जरूरत क्यों महसूस हुई.
चीनी मिल का पूरा इतिहास जानिए
मढ़ौरा की औद्योगिक कहानी केवल एक चीनी मिल की कहानी नहीं है. कभी यहां चीनी मिल के साथ मॉर्टन फैक्ट्री, सारण इंजीनियरिंग और डिस्टिलरी जैसी औद्योगिक इकाइयां भी थीं. इन संस्थानों ने मढ़ौरा को सारण के प्रमुख औद्योगिक इलाकों में शामिल किया था.
मढ़ौरा की चीनी मिल लंबे समय तक आसपास के किसानों और मजदूरों के लिए रोजगार और आय का प्रमुख माध्यम रही. मिल के आसपास गन्ने की खेती का बड़ा नेटवर्क था. इसलिए मिल की गतिविधियों का असर केवल फैक्ट्री परिसर तक सीमित नहीं था, बल्कि आसपास के गांवों की वित्तीय स्थिति तक पहुंचता था.
कब शुरू हुई थी मढ़ौरा चीनी मिल
मढ़ौरा चीनी मिल की स्थापना 1904 में कानपुर शुगर वर्क्स द्वारा किए जाने का उल्लेख मिलता है. इसे बिहार की शुरुआती और महत्वपूर्ण चीनी मिलों में गिना जाता है.
बाद के वर्षों में मिल का प्रबंधन ब्रिटिश इंडिया कॉरपोरेशन के हाथों में भी रहा. आजादी के बाद भी लंबे समय तक यह इकाई उत्पादन और रोजगार के लिहाज से महत्वपूर्ण बनी रही.
मिल का इतिहास इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि मढ़ौरा का औद्योगिक विकास एक ही कारखाने के इर्द-गिर्द नहीं हुआ था. यहां अलग-अलग उद्योगों के कारण रोजगार और व्यापार का पूरा तंत्र विकसित हुआ था.
बंद होने के बाद क्या हुआ
मिल के बंद होने का असर केवल फैक्ट्री की चारदीवारी तक सीमित नहीं रहा. इसके साथ जुड़े रोजगार, गन्ने की खेती और स्थानीय कारोबार पर भी असर पड़ा.
समय बीतने के साथ मिल परिसर की मशीनरी और इमारतों की स्थिति खराब होती गयी. कभी जहां औद्योगिक गतिविधियां होती थीं, वहां धीरे-धीरे वीरानी छा गयी.
मढ़ौरा की औद्योगिक पहचान को झटका केवल चीनी मिल बंद होने से नहीं लगा. मॉर्टन फैक्ट्री, सारण इंजीनियरिंग और डिस्टिलरी जैसी अन्य औद्योगिक इकाइयों के बंद होने से भी इस क्षेत्र की पुरानी औद्योगिक व्यवस्था कमजोर होती गयी. मढ़ौरा की औद्योगिक विरासत के खत्म होने पर प्रकाशित रिपोर्टों में इन इकाइयों का एक साथ उल्लेख मिलता है.
बंद होने के बाद की नेतृत्व क्या रही
मढ़ौरा चीनी मिल चुनावी नेतृत्व में लगातार मुद्दा बनी रही. स्थानीय स्तर पर नेता और सामाजिक संगठन समय-समय पर इसे दोबारा शुरू कराने की मांग उठाते रहे हैं.
2015 के विधानसभा चुनाव के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मढ़ौरा में चुनावी सभा की थी. उस सभा में उन्होंने पुराने औद्योगिक ढांचे, चीनी कारखानों और रोजगार का मुद्दा उठाया था. उन्होंने बिहार में उद्योगों को फिर से खड़ा करने और युवाओं को रोजगार देने की बात कही थी.
इसके बाद भी मिल शुरू नहीं हो सकी. 2024 में प्रधानमंत्री के सारण दौरे के समय स्थानीय लोगों ने एक बार फिर 2015 में मढ़ौरा में कही गयी बातों को याद किया और मिल के पुनर्जीवन की उम्मीद जतायी थी.
2015 में मढ़ौरा पहुंचे थे पीएम मोदी, क्या कहा था
25 अक्टूबर 2015 को मढ़ौरा में चुनावी सभा के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इलाके के पुराने चीनी उद्योग और रोजगार का जिक्र किया था. उन्होंने कहा था कि कभी यहां के चीनी कारखाने किसानों और युवाओं की आर्थिक स्थिति से जुड़े थे.
पीएम ने बिहार में बिजली, पानी, सड़क, पढ़ाई, कमाई और दवाई को विकास के प्रमुख आधार बताते हुए उद्योगों को दोबारा शुरू करने की जरूरत पर जोर दिया था. मढ़ौरा के संदर्भ में उन्होंने उद्योगों को फिर से शुरू करने के लिए कमेटी बनाने और युवाओं को रोजगार देने की बात कही थी.
उस वक्त स्थानीय लोगों में उम्मीद जगी थी कि मढ़ौरा की बंद औद्योगिक इकाइयों का दौर फिर लौट सकता है. लेकिन वर्षों बाद भी चीनी मिल की चिमनी से उत्पादन का धुआं नहीं उठा.
2007 के बाद भी नहीं बदली तस्वीर
मिल को दोबारा शुरू करने की सबसे चर्चित कोशिशों में से एक 2007 के आसपास हुई थी. उस समय किसानों को फिर से गन्ने की खेती के लिए तैयार किया गया. रिपोर्टों के अनुसार करीब 5 हजार एकड़ क्षेत्र में गन्ने की खेती भी हुई, लेकिन मिल के नहीं चलने से किसानों को भारी नुकसान उठाना पड़ा.
इस घटना ने स्थानीय लोगों के बीच मिल के पुनर्जीवन को लेकर भरोसे को भी झटका दिया. इसके बाद भी चुनाव-दर-चुनाव यह मुद्दा सामने आता रहा.
क्यों चाहते हैं लोग कि मिल मढ़ौरा में ही खुले
स्थानीय लोगों की मांग के पीछे तीन बड़े तर्क हैं.
पहला, मढ़ौरा की औद्योगिक पहचान इसी मिल और पुराने उद्योगों से जुड़ी रही है.
दूसरा, यहां पहले से बड़ा औद्योगिक परिसर और उससे जुड़ी जमीन उपलब्ध है, जिसका इस्तेमाल पुनर्जीवन में किया जा सकता है.
तीसरा, मिल शुरू होने पर आसपास के गन्ना किसानों को स्थानीय बाजार मिल सकता है और रोजगार के अवसर पैदा हो सकते हैं.
यही वजह है कि रविवार की बैठक में मौजूद लोगों ने नयी जगह पर मिल स्थापित करने की बजाय मढ़ौरा की पुरानी इकाई को फिर से खड़ा करने की मांग की.
अब आगे क्या होगा
फिलहाल मढ़ौरा में स्थानीय स्तर पर विरोध की आवाज तेज हो गयी है. बैठक में आंदोलन की चेतावनी भी दी गयी है. दूसरी तरफ राज्य प्रशासन की चीनी उद्योग से जुड़ी योजनाओं और नई मिलों को बढ़ावा देने की प्रक्रिया भी आगे बढ़ रही है.
ऐसे में मढ़ौरा के लिए सबसे बड़ा सवाल यही है कि आने वाले दिनों में प्रशासन पुरानी मिल के पुनर्जीवन को प्राथमिकता देती है या क्षेत्र में नयी जगह पर चीनी उद्योग स्थापित करने की दिशा में आगे बढ़ती है.
करीब तीन दशक से बंद पड़ी मढ़ौरा चीनी मिल की कहानी इसलिए भी अलग है, क्योंकि इसके बंद होने पर भी लोगों ने आवाज उठायी और अब इसे फिर से शुरू करने की कोशिशों के बीच भी लोग सड़क पर उतरने की बात कर रहे हैं. यानी मढ़ौरा की इस मिल के लिए हालात कुछ ऐसे बन गये हैं कि बंद रहे तो सवाल, खुले तो जगह को लेकर विवाद.
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