जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने यह आदेश बिहार के पुनर्गठन और उसके बाद झारखंड के गठन से जुड़े करीब 25 साल पुराने कर्मचारियों के बकाया मामले में दिया. मामला बिहार पुनर्गठन अधिनियम, 2000 के बाद पांच अंतर-राज्यीय प्रशासनी निगमों के कर्मचारियों और श्रमिकों के बकाया तथा अन्य सेवा संबंधी दावों से जुड़ा है.
इन पांच निगमों के कर्मचारियों से जुड़ा है मामला
मामला बिहार राज्य निर्माण निगम लिमिटेड, बिहार राज्य औद्योगिक विकास निगम लिमिटेड, बिहार राज्य इलेक्ट्रॉनिक विकास निगम लिमिटेड, बिहार राज्य वन विकास निगम लिमिटेड और बिहार राज्य पंचायती राज वित्त निगम लिमिटेड के कर्मचारियों और श्रमिकों से संबंधित है.
झारखंड के अलग राज्य बनने के बाद इन निगमों की देनदारियों और कर्मचारियों के सेवा संबंधी दावों को लेकर विवाद उत्पन्न हुआ था. इस मामले की सुनवाई पहले भी सुप्रीम कोर्ट में हुई थी.
दिहाड़ी मजदूरों के बकाये की गणना पर कोर्ट की टिप्पणी
सुप्रीम कोर्ट ने दिहाड़ी मजदूरों के बकाये की गणना के लिए 1992 से 42.50 रुपये प्रतिदिन की एक समान दर अपनाने की राज्य की गणना को स्वीकार नहीं किया.
अदालत ने कहा कि केवल इस आधार पर कि संबंधित कर्मचारी दिहाड़ी मजदूर थे, उनकी सेवा के अलग-अलग समय में लागू मजदूरी को नजरअंदाज करके बकाये की गणना नहीं की जा सकती. कोर्ट ने कहा कि लंबे समय तक 42.50 रुपये प्रतिदिन की एक समान दर को आधार बनाकर बकाये की गणना करना उचित और न्यायसंगत नहीं माना जा सकता.
EPF और वेतन के बकाये पर ब्याज का भी आदेश
सुप्रीम कोर्ट ने बिहार और झारखंड को देरी से किए गए EPF भुगतान पर 12 प्रतिशत सालाना साधारण ब्याज देने का निर्देश दिया है. वहीं, देरी से दिए गए वेतन, मजदूरी और अन्य मौद्रिक बकाये पर 6 प्रतिशत सालाना साधारण ब्याज देने को कहा है.
यह ब्याज उस तारीख से देय होगा, जिस दिन संबंधित राशि का भुगतान होना था और वास्तविक भुगतान की तारीख तक लागू रहेगा.
पहले भुगतान पा चुके कर्मचारियों को भी मिलेगा 1 लाख
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि जिन पात्र दिहाड़ी कर्मचारियों और श्रमिकों को उनका बकाया पहले ही दिया जा चुका है, उन्हें भी संबंधित अवधि में काम करने की स्थिति में 1 लाख रुपये और लागू ब्याज मिलेगा. यह राशि उन्हें पहले मिल चुकी रकम के अतिरिक्त होगी.
लापता या सत्यापन से बचे कर्मचारियों के लिए 12 महीने
अदालत ने कहा कि ऐसे कर्मचारी या श्रमिक, जिनका पता नहीं चल पाया है या जिनका सत्यापन नहीं हुआ है, अथवा उनके कानूनी उत्तराधिकारी, संबंधित निगम के नोडल अधिकारी के पास संपर्क कर सकते हैं.
ऐसे लोगों को आदेश की तारीख से 12 महीने के भीतर जरूरी दस्तावेजों के साथ अपना दावा पेश करने की अनुमति दी गई है. सत्यापन के बाद जो राशि देय होगी, उसका भुगतान कानून के अनुसार किया जाएगा.
बिहार और झारखंड को चार सप्ताह में जानकारी सार्वजनिक करने का निर्देश
सुप्रीम कोर्ट ने दोनों राज्यों को कर्मचारियों और श्रमिकों से संबंधित अद्यतन जानकारी सार्वजनिक करने का भी निर्देश दिया है. इसमें उन कर्मचारियों की जानकारी शामिल होगी, जिन्हें बकाया का भुगतान हो चुका है या जिनकी देनदारी समाप्त हो चुकी है, साथ ही उन लोगों की जानकारी भी होगी जिनके दावे अभी लंबित हैं.
भुगतान किए जा चुके दावों के संबंध में नाम, पद, सेवा अवधि, देय राशि, भुगतान की गई राशि और भुगतान की तारीख जैसी जानकारी प्रकाशित करनी होगी. लंबित दावों के मामले में उनके लंबित रहने का कारण और आवश्यक दस्तावेजों या प्रक्रिया की जानकारी भी देनी होगी.
अदालत ने दोनों राज्यों को यह जानकारी अपनी संबंधित आधिकारिक वेबसाइटों पर चार सप्ताह के भीतर प्रकाशित करने और बाद में सत्यापन तथा भुगतान की स्थिति के अनुसार उसे अपडेट करने का निर्देश दिया है.
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