RJD New Team: बिहार की नेतृत्व में बांकीपुर उपचुनाव का नतीजा सिर्फ एक सीट का फैसला नहीं था. इस चुनाव ने विपक्ष की नेतृत्व में भी नई बहस छेड़ दी है. भाजपा लगभग 30 साल बाद अपनी मजबूत सीट हार गई, लेकिन उससे ज्यादा चिंता अगर किसी दल को है तो वह है राष्ट्रीय जनता दल (RJD).
वजह यह है कि विपक्ष का सबसे बड़ा चेहरा बनने की लड़ाई अब सिर्फ तेजस्वी यादव और NDA के बीच नहीं रह गई है. जन सुराज के संस्थापक प्रशांत किशोर अब सीधे उसी नेतृत्वक स्पेस में दस्तक दे चुके हैं, जिस पर अब तक RJD का दबदबा माना जाता था. ऐसे में सवाल उठ रहा है कि क्या इसी दबाव की वजह से तेजस्वी यादव ने पूरी पार्टी को नए सिरे से खड़ा करने का फैसला लिया है?
बांकीपुर की हार ने क्यों बढ़ा दी RJD की टेंशन?
बांकीपुर विधानसभा सीट 1995 से भाजपा का गढ़ रही थी. इसलिए भाजपा की हार बड़ी समाचार बनी. लेकिन इस चुनाव का दूसरा पहलू ज्यादा अहम है.
जन सुराज के संस्थापक प्रशांत किशोर पहली बार विधानसभा पहुंच गए. इसका सीधा मतलब है कि अब उनके पास सिर्फ सड़क की नेतृत्व नहीं, बल्कि सदन का भी मंच होगा. दूसरी ओर RJD की उम्मीदवार रेखा गुप्ता तीसरे नंबर पर पहुंच गईं और जमानत तक नहीं बचा सकीं.
यही वह संकेत है जिसने RJD की चिंता बढ़ा दी है. क्योंकि बिहार में अब तक खुद को सबसे मजबूत विपक्ष मानने वाली पार्टी पहली बार विपक्ष के भीतर ही चुनौती महसूस कर रही है.
आखिर क्यों कहा जा रहा है कि विपक्ष का समीकरण बदल रहा है?
2025 विधानसभा चुनाव में जन सुराज का प्रदर्शन बेहद खराब रहा था. पार्टी ने 238 सीटों पर उम्मीदवार उतारे, लेकिन एक भी सीट नहीं जीत सकी. अधिकांश उम्मीदवारों की जमानत जब्त हो गई.
इसके बावजूद
पार्टी के भीतर भी सब कुछ ठीक नहीं
हाल के दिनों में RJD के भीतर कई घटनाओं ने संगठन पर सवाल खड़े किए हैं.
नेताओं के बीच बयानबाजी सामने आई. भाई वीरेंद्र और शक्ति सिंह के बीच सार्वजनिक तकरार चर्चा में रही. राज्यसभा चुनाव के दौरान पार्टी के एक विधायक के NDA के साथ जाने की चर्चा भी हुई. ऐसे घटनाक्रमों ने यह संकेत दिया कि संगठन के भीतर असंतोष मौजूद है. संभव है कि नई टीम के जरिए तेजस्वी यादव इन संदेशों को भी बदलना चाहते हों.
क्या सिर्फ वोट शेयर के भरोसे चुनाव जीता जा सकता है?
RJD लंबे समय से इस बात पर भरोसा करती रही है कि उसका सामाजिक समीकरण और वोट शेयर सबसे मजबूत है. लेकिन बदलती नेतृत्व में सिर्फ जातीय समीकरण काफी नहीं माने जा रहे. युवा मतदाता लगातार सक्रिय नेतृत्व, सड़क पर संघर्ष और लगातार मौजूदगी भी देख रहा है. यही वह क्षेत्र है जहां प्रशांत किशोर अपनी नेतृत्वक पहचान बनाने की कोशिश कर रहे हैं.
आगे की लड़ाई किसकी होगी?
अगले विधानसभा चुनाव में अभी समय है. इसलिए किसी निष्कर्ष पर पहुंचना जल्दबाजी होगी. RJD आज भी बिहार का सबसे बड़ा विपक्षी दल है. उसके पास सबसे बड़ा संगठन, सबसे ज्यादा विधायक और मजबूत सामाजिक आधार है. लेकिन बांकीपुर उपचुनाव ने यह जरूर बता दिया कि विपक्ष के भीतर अब एक नई प्रतिस्पर्धा शुरू हो चुकी है.
अगर तेजस्वी यादव अपनी नई टीम के जरिए संगठन को फिर से सक्रिय नहीं कर पाए, जनता के बीच लगातार मौजूदगी नहीं बनाई और आंदोलनों की नेतृत्व में वापसी नहीं की, तो जन सुराज विपक्ष की नेतृत्व में अपनी जगह और मजबूत कर सकती है.
यही वजह है कि नेतृत्वक गलियारों में RJD के संगठनात्मक पुनर्गठन को सिर्फ एक प्रशासनिक फैसला नहीं, बल्कि जन सुराज की चुनौती का नेतृत्वक जवाब माना जा रहा है.
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