मधुपुर. शहर समेत आसपास के ग्रामीण इलाकों में मंगलवार को शब-ए-बारात अकीदत के साथ मनाया गया. इस्लामिक कैलेंडर के आठवें महीने शाबान की 15वीं (शब) रात को मनाया जाता है. शब-ए-बारात को लेकर शहर के विभिन्न मस्जिद को आकर्षक विद्युत लाइट से सजाया गया था. मौलाना अजमल नुरी ने कहा कि पैगंबर-ए-इस्लाम ने फरमाया कि रजब अल्लाह का महीना है और शाबान मेरा. रमजान मेरी उम्मात का महीना है. इस रात में इबादत करने वालों के गुनाह माफ हो जाते हैं. शब-ए-बारात एक फारसी शब्द है, जो दो शब्दों से मिलकर बना है. शब यानी रात और बारात यानी मुक्ति (छुटकारा) मतलब गुनाहों से छुटकारे की रात. ये रात उन खास रातों में एक होती है, जिसमें अल्लाह अपने बंदों की दुआएं कुबूल करता है. इस्लामिक धार्मिक मान्यता के अनुसार इस रात को क्षमा के रूप में देखा जाता है. जब मुसलमान अपने गुनाहों की माफी मांगते हैं और आने वाले पवित्र माह रमजान के लिए खुद को रूहानी तौर पर तैयार करते हैं. इस अवसर पर विशेष रूप से हलवा व अन्य मीठे व्यंजन बनाकर रिश्तेदारों और गरीबों में बांटें जाते है. मस्जिदों, कब्रिस्तानों व दरगाहों की साफ-सफाई की जाती है. शब-ए-बारात बेहद फजीलत वाली रात अल्लाह से दया (रहम) और अपने पापों (गुनाहों) की माफी मांगने की रात मानी जाती है. उन्होंने कहा कि मुसलमानों को शब-ए-बारात की रात अल्लाह का जिक्र, कुरआन की तिलावत, अस्तग्फार व नमाज पढ़ने में गुजारनी चाहिए. इस रात की इबादत और अगले दिन का रोजा अल्लाह को बहुत पसंद है. मुसलमानों को शब-ए-बारात की रात को खासकर नौजवानों को बिना किसी हुड़दंग और शोर शराबे के मनाना चाहिए. इस रात को मुसलमान मस्जिदों, घरों में इबादत करते हैं और अल्लाह से अपने गुनाहों की माफी मांगते हैं. इस दिन केवल अल्लाह की ही इबादत नहीं की जाती है, बल्कि जो अल्लाह को प्यारे हो चुके हैं, उनकी कब्र पर जाकर रातभर दुआ किया जाता है. कब्रिस्तानों को रोशनी से सजाया जाता है. दुनिया को अलविदा कह गए अपनों के लिए माफी की दुआ मांगी जाती है.
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